एचएसबीसी म्युचुअल फंड के सीईओ कैलाश कुलकर्णी ने नई दिल्ली में पुनीत वाधवा के साथ साक्षात्कार में कहा कि नए निवेशकों को सेंसेक्स या निफ्टी को ट्रैक करने वाले किसी आसान इंडेक्स फंड के जरिये बाजार में निवेश शुरू करना चाहिए। साथ ही, उन्हें तब तक किसी भी अनोखी इंडेक्स रणनीति या जटिल योजनाओं से दूर रहना चाहिए, जब तक वे उन्हें पूरी तरह से समझ न लें। उनसे बातचीत के अंश:
भू-राजनीति और व्यापारिक तनावों के कारण बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। इन चिंताओं को देखते हुए क्या अब 12 महीने का नजरिया रखने वाले निवेशकों के लिए मूल्यांकन काफी आकर्षक हैं?
कैलेंडर वर्ष 2025 उतार-चढ़ाव भरा रहा। लगभग आठ महीनों तक बाजार कमजोर रहे, जिसके बाद हाल के महीनों में उनमें सुधार देखने को मिला। मिड और स्मॉल कैप में ज्यादा अनिश्चितता रही और कुल मिलाकर साल के अंत में भी वे गिरावट का शिकार रहे। वैश्विक स्तर पर कई बाजारों ने अच्छा प्रदर्शन किया-जैसे कोरिया, जापान, ताइवान, ब्राजील और अन्य। इस पृष्ठभूमि में भारत का सापेक्ष मूल्यांकन प्रीमियम पिछली अवधियों की तुलना में कुछ कम हुआ है, जिससे संभवतः समझदार निवेशक एक बार फिर भारत की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
मजबूत घरेलू मांग और कंपनियों की बेहतर होती बैलेंस शीट के कारण भारत के मैक्रो और माइक्रो फंडामेंटल्स मजबूत बने हुए हैं। लेकिन अल्पावधि में वैश्विक अनिश्चितताएं निवेशकों की जोखिम क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं और निवेशक अपना निवेश बढ़ाने से पहले हालात के सामान्य होने का इंतजार करना पसंद कर सकते हैं।
विदेशी निवेशक इन अल्पकालिक चिंताओं को नजरअंदाज कर भारत में दीर्घावधि निवेश क्यों नहीं कर सकते?
यह कहना सही नहीं है कि विदेशी निवेशक भारत में निवेश नहीं कर रहे हैं। उनमें से कई वास्तव में भारत को लेकर दीर्घावधि दृष्टिकोण रखते हैं और निवेश जारी रखे हुए हैं। हालांकि, उन्हें अल्पावधि की अस्थिरता, जोखिमों और विभिन्न बाजारों में सापेक्ष मूल्य का प्रबंधन भी करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, कुछ निवेशक वैश्विक अनिश्चितताओं से जूझने के बजाय अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों पर लगभग 4 प्रतिशत की सुरक्षित कमाई को प्राथमिकता दे सकते हैं। इसलिए, मुद्दा विदेशी निवेश न आने का नहीं है, बल्कि यह है कि हम बड़े पूंजी निवेश चाहेंगे। एक बार जब वैश्विक अनिश्चितताएं कम हो जाएंगी, जैसा कि हमने मार्च की शुरुआत तक देखना शुरू कर दिया था तो निवेश फिर से सुधर सकता है।
क्या रिटेल निवेशकों का निवेश निकासी का कोई दबाव है?
सचमुच नहीं। रिटेल निवेशकों ने शायद नया निवेश कम कर दिया हो, लेकिन वे पैसे निकाल नहीं रहे हैं। यह एक अहम फर्क है। इसकी तुलना 10–15 साल पहले से करें, जब बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से लोग घबराकर शेयर बेच देते थे। आज वह रवैया काफी हद तक खत्म हो चुका है। भारतीय रिटेल निवेशक अब काफी समझदार हो गए हैं।
क्या मूल्यांकन से जुड़ी चिंताओं और दुनिया की अनिश्चितताओं से निवेश के मौके घट रहे हैं?
इसके उलट, भारत में मौके बढ़ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह है आईपीओ में तेजी आना। कैलेंडर वर्ष 2025 में रिकॉर्ड संख्या में आईपीओ आए। इनमें से कई कंपनियां ऐसे क्षेत्र में काम करती हैं जहां कोई बड़ी लार्जकैप कंपनी नहीं है, सिर्फ मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियां हैं। इससे निवेशकों के लिए मौकों का दायरा बढ़ जाता है। भले ही बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से कुछ आईपीओ में थोड़े समय के लिए देरी हो जाए, लेकिन निवेश मजबूत बना हुआ है।
पिछले एक दशक में एक और बड़ा बदलाव कॉरपोरेट प्रशासन में आया है। अब मालिक यह बात समझते हैं कि अच्छे प्रशासन और पारदर्शिता से बेहतर मूल्यांकन में मदद मिलती है।