Retirement Funds: रिटायरमेंट और बच्चों के भविष्य से जुड़े म्युचुअल फंड्स में निवेश करने वालों के लिए राहत की खबर है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इन स्कीम्स को बंद करने का अपना फैसला वापस ले लिया है, जिससे अब इनमें निवेश का सिलसिला जारी रहेगा। इन दोनों में रिटायरमेंट योजनाएं बड़ी कैटेगरी हैं, जिनका एसेट अंडर मैनजमेंट (AUM) 28 फरवरी 2026 तक 32,229 करोड़ रुपये था। ऐसे में निवेश से पहले इन योजनाओं के फायदे, नुकसान और आपके लिए उनकी उपयुक्तता को समझना बेहद जरूरी हो जाता है।
रिटायरमेंट स्कीम्स सॉल्यूशन-ओरिएंटेड म्युचुअल फंड्स होती हैं, जिन्हें लंबे समय के रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए बनाया गया है। इनमें आमतौर पर 5 साल का अनिवार्य लॉक-इन होता है या रिटायरमेंट तक निवेश रखना होता है- जो भी पहले हो। नेक्सएज कैपिटल के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर (CIO) गौरव कुलश्रेष्ठ कहते हैं, “ये फंड आमतौर पर इक्विटी और डेट का मिश्रण होते हैं, ताकि समय के साथ ग्रोथ और पूंजी की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके।”
भारत में ज्यादातर रिटायरमेंट फंड्स फिलहाल हाइब्रिड फंड्स की तरह काम करते हैं, जहां इक्विटी और डेट का आवंटन पहले से तय दायरे (बैंड) के भीतर बदलता रहता है। फंड मैनेजर बाजार की स्थिति के अनुसार इस आवंटन में बदलाव करते हैं। कुछ स्कीम्स में रिटायरमेंट नजदीक आने पर पोर्टफोलियो कम जोखिम वाला और ज्यादा डेट-ओरिएंटेड हो जाता है।
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रिटायरमेंट स्कीम्स और डाइवर्सिफाइड इक्विटी स्कीम्स के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि रिटायरमेंट स्कीम्स में निवेश अपेक्षाकृत स्थिर (sticky capital) होता है। लॉक-इन अवधि के कारण फंड मैनेजर पर रिडेम्प्शन (निकासी) का दबाव कम रहता है।
सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के प्रोडक्ट हेड और फाउंडिंग टीम के सदस्य विनायक मगोत्रा कहते हैं, “डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स जहां मुख्य रूप से ज्यादा रिटर्न देने पर केंद्रित होते हैं, वहीं रिटायरमेंट स्कीम्स का मकसद जोखिम को संतुलित करते हुए एक स्थिर कॉर्पस बनाना होता है।”
इन फंड्स का एक बड़ा फायदा यह है कि ये निवेशकों में व्यवहारिक अनुशासन (behavioural discipline) लाते हैं। प्रभुदास लीलाधर एएमसी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट आर्चित दोषी बताते हैं, “कानूनी लॉक-इन अवधि रिटेल निवेशकों को बाजार में गिरावट के दौरान घबराकर बेचने से रोकती है।” इससे कंपाउंडिंग बिना किसी रुकावट के काम कर पाती है और शॉर्ट टर्म उतार-चढ़ाव का असर कम होता है।
स्थिर निवेश (sticky capital) फंड मैनेजरों को कैश ड्रैग कम करने में भी मदद करता है और उन्हें कम लिक्विड लेकिन उच्च विश्वास (high-conviction) वाले लंबे समय के निवेश करने का मौका देता है, बिना इस चिंता के कि बाजार में गिरावट के दौरान अचानक निकासी हो जाएगी।
दोशी के अनुसार, “फंड मैनेजर लंबी अवधि के वैल्यू निवेश के जरिए इलिक्विडिटी प्रीमियम हासिल कर पाते हैं, जिससे अल्फा (अतिरिक्त रिटर्न) बढ़ाने में मदद मिलती है।”
कुछ फंड्स पोर्टफोलियो में सोना शामिल करके मल्टी-एसेट डाइवर्सिफिकेशन भी प्रदान करते हैं, जिससे गंभीर मैक्रो-आर्थिक झटकों के दौरान निवेश को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
दोशी कहते हैं, “कुछ नोटिफाईड रिटायरमेंट फंड्स में निवेश करने पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की कर छूट (deduction) का लाभ भी मिलता है।”
इनमें इक्विटी एक्सपोजर होने के कारण ये लंबे समय में महंगाई (inflation) को मात देने की क्षमता रखते हैं। मगोत्रा के अनुसार, “स्ट्रक्चर्ड एसेट एलोकेशन निवेशकों को इक्विटी और डेट के बीच बदलाव को एक्टिव रूप से मैनेज करने की जरूरत को कम कर देता है।”
निवेशकों को खुद से पोर्टफोलियो रीबैलेंस करने या एसेट एलोकेशन मैनेज करने की जरूरत नहीं होती। आने वाले समय में ऐसे और फंड्स के लाइफ-साइकल फंड्स जैसे बनने की उम्मीद है, जो ग्लाइड पाथ का पालन करते हुए रिटायरमेंट नजदीक आने पर अपने आप इक्विटी से डेट की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। कुलश्रेष्ठ के अनुसार, “लाइफ-साइकल आधारित स्ट्रक्चर की ओर सेबी का यह कदम एक महत्वपूर्ण बदलाव है।”
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इन फंड्स की सबसे बड़ी कमी इनका लॉक-इन है, जो पांच साल या रिटायरमेंट तक (जो भी पहले हो) लागू रहता है। इससे निवेशकों की लचीलापन (flexibility) कम हो जाती है और लिक्विडिटी तक पहुंच सीमित हो जाती है।
आनंद राठी वेल्थ के जॉइंट सीईओ फिरोज अजीज के अनुसार, “निवेशक आपात स्थिति (emergencies) में भी अपने पैसे तक पहुंच नहीं बना सकते।” उनका यह भी कहना है कि इनमें से कई फंड्स का एक्सपेंस रेशियो डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स के मुकाबले ज्यादा होता है। साथ ही, एसेट एलोकेशन का निर्णय निवेशक नहीं, बल्कि फंड मैनेजर करता है।
अजीज के अनुसार, “किसी निवेशक के रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से वह रिटायरमेंट के करीब भी ज्यादा इक्विटी एक्सपोजर रखना चाहता हो, लेकिन इस कैटेगरी के डिजाइन के कारण फंड मैनेजर पोर्टफोलियो को ज्यादा रक्षात्मक (conservative) बना देता है।”
ये फंड्स उन निवेशकों के लिए बेहतर हैं जो अपनी व्यवहारिक कमजोरियों को पहचानते हैं। दोशी के अनुसार, “ये खास तौर पर उन लोगों के लिए बेहतर हैं जो बार-बार खरीद-फरोख्त (churning) करते हैं या बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान घबराकर बेच देते हैं।”
30 और 40 की उम्र के वे लोग, जो “फिल-इट, शट-इट और फॉरगेट-इट” जैसी रणनीति अपनाना चाहते हैं और एसेट एलोकेशन व रिस्क मैनजमेंट की जिम्मेदारी खुद न लेकर किसी एक्सपर्ट को सौंपना पसंद करते हैं, वे इन फंड्स पर विचार कर सकते हैं।
करियर के अंतिम चरण में पहुंच चुके निवेशकों के लिए इन फंड्स के कंजर्वेटिव विकल्प फायदेमंद हो सकते हैं, जो आक्रामक ग्रोथ के बजाय पूंजी की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं।
जिन निवेशकों को ज्यादा लिक्विडिटी (तरलता) की जरूरत होती है, उन्हें इन लॉक-इन वाली योजनाओं से बचना चाहिए।
कुलश्रेष्ठ के अनुसार, “जो अनुभवी निवेशक पहले से ही तय एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी के साथ डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो संभाल रहे हैं, उनके लिए रिटायरमेंट फंड्स बहुत जरूरी नहीं होते।”
रिटायरमेंट म्युचुअल फंड्स में निवेश और निकासी के मामले में ज्यादा लचीलापन होता है और इन्हें समझना भी अपेक्षाकृत आसान है। फिनप्रो वेल्थ के चीफ फाइनेंशियल प्लानर और फाउंडर हर्ष वीरा के अनुसार, “नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) कम लागत वाला उत्पाद है और निवेशकों को 50,000 रुपये तक की अतिरिक्त टैक्स छूट भी देता है।”
यह सैलरीड (नौकरीपेशा) व्यक्तियों और लंबे समय के निवेशकों के लिए बेहतर है, जो रिटायरमेंट के लिए पैसे को लंबे समय तक लॉक-इन रखने में सहज हैं और जिन्हें नियमित लिक्विडिटी की जरूरत नहीं होती।
NPS में पैसा 60 वर्ष की उम्र तक लॉक-इन रहता है और इसका एक हिस्सा अनिवार्य रूप से एन्युटी (annuity) में निवेश करना होता है। रिसर्जेंट इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर ज्योति प्रकाश गाडिया के अनुसार, “निकासी और एग्जिट नियमों के लिहाज से NPS ज्यादा प्रतिबंधात्मक है, जो हर निवेशक के लिए बेहतर नहीं हो सकता।”
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रिटायरमेंट म्युचुअल फंड एक मार्केट-लिंक्ड उत्पाद है। गाडिया के अनुसार, “यह उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो अभी अपने रिटायरमेंट कॉर्पस बनाने के चरण में हैं और इक्विटी व डेट बाजार में निवेश के जरिए समय के साथ अपने पैसे को बढ़ाना चाहते हैं।”
ये फंड्स उन युवा या मध्यम आयु के निवेशकों के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं, जिनके पास रिटायरमेंट तक अभी पर्याप्त समय है। वीरा के अनुसार, “निवेशकों को बाजार के उतार-चढ़ाव को सहने की क्षमता होनी चाहिए।”
रिटायरमेंट फंड्स के मुख्य फायदे हैं—ग्रोथ की संभावना, पारदर्शिता और लचीलापन। वीरा कहते हैं, “ये समय के साथ बड़ा रिटायरमेंट कॉर्पस बनाने में मदद कर सकते हैं और महंगाई को मात दे सकते हैं, लेकिन रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती।”
बीमा कंपनियों द्वारा पेश की जाने वाली डिफर्ड एन्युटी स्कीम्स का मकसद अलग होता है। गाडिया के अनुसार, “इनका मकसद धन बढ़ाना नहीं, बल्कि निश्चित आय प्रदान करना होता है।” ये स्कीम्स रिटायरमेंट के बाद तय और नियमित आय देती हैं, जिसमें बाजार का कोई जोखिम नहीं होता, लेकिन रिटर्न अपेक्षाकृत कम रहता है। गाडिया कहते हैं, “ये उत्पाद आमतौर पर उन कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए बेहतर होते हैं, जो ज्यादा रिटर्न के बजाय गारंटीड आय को प्राथमिकता देते हैं।”