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Value and Contra Funds: पोर्टफोलियो में कब और कैसे जोड़ें, समझें दोनों की रणनीति, फायदे और जोखिम

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सेबी ने नियमों में संशोधन करते हुए एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को अब वैल्यू फंड (Value Funds) और कॉन्ट्रा फंड (Contra Funds) दोनों लॉन्च करने की अनुमति दे दी है

Last Updated- March 09, 2026 | 4:29 PM IST
Value and Contra Funds
फोटो: एआई जेनरेटेड

Value and Contra Funds: म्युचुअल फंड निवेशकों के लिए एक अहम बदलाव आया है। मार्केट रेगुलेटर सेबी ने नियमों में संशोधन करते हुए एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को अब वैल्यू फंड (Value Funds) और कॉन्ट्रा फंड (Contra Funds) दोनों लॉन्च करने की अनुमति दे दी है। पहले फंड हाउस को इन दोनों में से सिर्फ एक कैटेगरी चुननी पड़ती थी, लेकिन 26 फरवरी 2026 के नए सर्कुलर के बाद यह बाध्यता खत्म हो गई है। हालांकि सेबी ने शर्त रखी है कि दोनों फंडों के पोर्टफोलियो में ओवरलैप 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

वैल्यू फंड्स की इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी

वैल्यू फंड ऐसे शेयरों में निवेश करते हैं जो अपनी असली या उचित कीमत से कम पर ट्रेड कर रहे होते हैं। फंड मैनेजर ऐसे शेयर ढूंढने के लिए कुछ संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कम प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो, कम प्राइस-टू-बुक (P/B) रेशियो और ज्यादा डिविडेंड यील्ड। इन फंडों में आमतौर पर कम वैल्यूएशन वाली कंपनियों के शेयर रखे जाते हैं। उम्मीद होती है कि समय के साथ इन शेयरों की कीमत अपने सही स्तर के करीब पहुंच जाएगी।

क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर पीयूष गुप्ता कहते हैं, “बाजार कभी-कभी अल्पकालिक चिंताओं या अस्थायी आय में सुस्ती जैसी वजहों से कंपनियों का गलत मूल्यांकन कर देता है। समय के साथ जब कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहतर होती है, तो इन शेयरों का दोबारा मूल्यांकन हो सकता है, जिससे पूंजी में बढ़ोतरी की संभावना बनती है।”

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कॉन्ट्रा फंड्स की इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी

इन फंड्स के नाम से ही पता चलता है कि ये विपरीत रणनीति अपनाते हैं। ये ऐसे शेयरों या सेक्टरों में निवेश करते हैं जो फिलहाल बाजार की पसंद में नहीं होते। कॉन्ट्रा फंड आमतौर पर उन सेक्टर्स में निवेश करते हैं जहां चक्रीय मंदी चल रही हो। वे उन कंपनियों को भी चुनते हैं जो अस्थायी नियामकीय या सेक्टर से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रही हों। इसके अलावा ये फंड उन कंपनियों में भी निवेश कर सकते हैं जिनमें पुनर्गठन चल रहा हो या जिनके बारे में बाजार की अल्पकालिक धारणा कमजोर हो।

गुप्ता कहते हैं, “कॉन्ट्रा रणनीति ‘जब दूसरे बेच रहे हों तब खरीदो’ के सिद्धांत पर आधारित होती है। इसका मकसद तब फायदा उठाना होता है जब बाजार की धारणा बदलती है और नजरअंदाज किए गए शेयरों में फिर से सुधार आता है।”

फंड्सइंडिया के सीनियर मैनेजर रिसर्च जिरल मेहता कहते हैं कि यह निवेश शैली बाजार की व्यवहारगत गलत कीमत निर्धारण और चक्र के पलटने के विचार पर आधारित है। उनका कहना है कि लंबे समय में जब मौजूदा समस्याएं कम हो जाती हैं, तो शेयरों की कीमतें सामान्य स्तर पर लौट सकती हैं।

वैल्यू फंड्स में निवेश के फायदे और नुकसान

वैल्यू स्ट्रैटेजी की वजह से ये फंड अक्सर महंगे ग्रोथ शेयरों में निवेश से बचते हैं या उसमें कम निवेश करते हैं। अपनी असली कीमत से कम पर शेयर खरीदने से निवेशकों को एक तरह का सुरक्षा मार्जिन मिलता है, जिससे गिरावट का जोखिम कुछ कम हो सकता है।

इनकी रक्षात्मक प्रकृति के कारण बाजार में गिरावट के दौरान इन फंडों में आमतौर पर नुकसान अपेक्षाकृत कम हो सकता है। अगर किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में पहले से ग्रोथ और मोमेंटम फंड ज्यादा हैं, तो वैल्यू फंड स्टाइल डायवर्सिफिकेशन भी दे सकते हैं। हालांकि निवेशकों को इनके कुछ जोखिमों के बारे में भी पता होना चाहिए। गुप्ता के मुताबिक, “ग्रोथ शेयरों से चलने वाले बुल मार्केट में ये फंड अक्सर लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन कर सकते हैं।”

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वैल्यू निवेश में वैल्यू ट्रैप का जोखिम भी होता है। ऐसे शेयर देखने में सस्ते लगते हैं, लेकिन उनमें स्ट्रक्चलर कमजोरियां होती हैं, जिसके कारण उनकी कीमत कभी पूरी तरह नहीं संभल पाती।

गुप्ता के अनुसार, कभी-कभी वैल्यू की तलाश में फंड का पोर्टफोलियो कुछ खास सेक्टरों की ओर ज्यादा झुक सकता है, जिससे एकाग्रता का जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा कई बार जिन शेयरों में वैल्यू फंड निवेश करते हैं, उन्हें संभलने में काफी लंबा समय भी लग सकता है।

कॉन्ट्रा फंड में निवेश के फायदे और नुकसान

कॉन्ट्रा फंड उन सेक्टरों या कंपनियों में निवेश करते हैं जो फिलहाल बाजार की नजर में कमजोर हैं। अगर इन सेक्टरों या कंपनियों में बाद में सुधार आता है, तो ऐसे फंड अच्छा रिटर्न दे सकते हैं।

गुप्ता के अनुसार, पारंपरिक पोर्टफोलियो में जहां ज्यादातर लार्ज-कैप या ग्रोथ फंड होते हैं, वहां कॉन्ट्रा फंड जोड़ने से डायवर्सिफिकेशन मिल सकता है। निवेशक इनका इस्तेमाल उन थीम्स में निवेश के लिए कर सकते हैं जिन्हें मुख्यधारा के निवेशक नजरअंदाज कर रहे हों।

हालांकि इन फंड्स के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े होते हैं। किसी सेक्टर या कंपनी के बारे में नकारात्मक धारणा बदलने तक इनके प्रदर्शन में काफी उतार-चढ़ाव रह सकता है।

अगर कॉन्ट्रा शेयरों में गलत समय पर निवेश किया जाए, तो रिकवरी आने में लंबा समय लग सकता है। इन फंड्स का प्रदर्शन काफी हद तक फंड मैनेजर की क्षमता पर निर्भर करता है। अगर फंड मैनेजर बदल जाता है, तो प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। वैल्यू फंड की तरह, तेजी वाले व्यापक बुल मार्केट में ये फंड अक्सर पीछे रह सकते हैं।

मनीएड्यूस्कूल के फाउंडर अर्नव पंड्या कहते हैं, “जब पूरा बाजार एक ही दिशा में तेजी से बढ़ता है, तब कॉन्ट्रा निवेश के अवसर कम हो जाते हैं और ऐसे में कॉन्ट्रा फंड का पोर्टफोलियो भी दूसरे फंडों जैसा दिखने लग सकता है।’’

वैल्यू और कॉन्ट्रा: एक जैसे लेकिन एक नहीं

वैल्यू और कॉन्ट्रा फंड की रणनीतियों में कई समानताएं हैं। दोनों का उद्देश्य बाजार की अक्षमताओं (मार्केट इनएफिशिएंसी) से फायदा उठाना होता है। ये ऐसे शेयरों में अवसर तलाशते हैं जो कम वैल्यूएशन पर हो या बाजार में पर्याप्त ध्यान न पा रहे हों।

दोनों ही रणनीतियां इस धारणा पर आधारित होती हैं कि समय के साथ गलत मूल्यांकन सुधर सकता है। इसलिए इनमें आमतौर पर लंबी अवधि के निवेश की जरूरत होती है और तेज मोमेंटम वाले बुल मार्केट में ये फंड कमजोर प्रदर्शन कर सकते हैं।

हालांकि दोनों में कई अंतर भी हैं। गुप्ता के मुताबिक, वैल्यू फंड आमतौर पर मौलिक रूप से मजबूत लेकिन अस्थायी रूप से गलत कीमत वाले शेयर खरीदते हैं। वहीं कॉन्ट्रा फंड ऐसे शेयरों में निवेश करते हैं जो खरीद के समय अलोकप्रिय या कमजोर प्रदर्शन वाले होते हैं।

वैल्यू फंड मुख्य रूप से कम वैल्यूएशन पर ध्यान देते हैं, जबकि कॉन्ट्रा फंड बाजार की धारणा में बदलाव पर दांव लगाते हैं। आमतौर पर कॉन्ट्रा फंड, वैल्यू फंड की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले होते हैं।

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कब बेहतर प्रदर्शन करते हैं?

वैल्यू फंड आमतौर पर तब अच्छा प्रदर्शन करते हैं जब बाजार में रिकवरी शुरू होती है या कम वैल्यूएशन वाला सेक्टर दोबारा अपने औसत स्तर की ओर लौटने लगते हैं। ये फंड तब भी बेहतर कर सकते हैं जब निवेशकों का ध्यान ग्रोथ से हटकर कंपनियों के मजबूत फंडामेंटल पर आने लगता है।

कॉन्ट्रा फंड उस समय अच्छा प्रदर्शन करते हैं जब बाजार में अलोकप्रिय या नजरअंदाज किए गए सेक्टरों में सुधार शुरू होता है। हालांकि जब पूरे बाजार में एक साथ तेजी आती है, तब ये दोनों रणनीतियां अक्सर कमजोर प्रदर्शन कर सकती हैं।

वैल्यू फंड में किसे निवेश करना चाहिए?

जिन निवेशकों का लंबी अवधि का नजरिया है और जिनमें धैर्य ज्यादा है, वे वैल्यू फंड में निवेश पर विचार कर सकते हैं। यह फंड उन लोगों के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं जो अपनी असली कीमत से कम पर कंपनियों में निवेश करने की रणनीति को समझते हैं और कम वैल्यूएशन वाले शेयरों से फायदा उठाना चाहते हैं।

मेहता के अनुसार, जो निवेशक फैक्टर या स्टाइल आधारित पोर्टफोलियो बनाना चाहते हैं और जिनका निवेश का नजरिया सात साल या उससे ज्यादा है, वे इन फंडों को चुन सकते हैं। बशर्ते कि किसी स्टाइल के कमजोर प्रदर्शन के दौरान वे निवेश से बाहर न निकलें।

वहीं जिन निवेशकों को इन फंडों के काम करने के तरीके की अच्छी समझ नहीं है। वे इनके प्रदर्शन से निराश हो सकते हैं, क्योंकि कई बार ये फंड तब भी कमजोर रह सकते हैं जब पूरा बाजार अच्छा कर रहा हो।

सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार के मुताबिक, जो निवेशक जल्दी रिटर्न चाहते हैं या लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन सहन नहीं कर सकते, उन्हें इन फंडों से दूर रहना चाहिए।

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कॉन्ट्रा फंड में किसे निवेश करना चाहिए?

कॉन्ट्रा फंड उन आक्रामक निवेशकों के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं जो भीड़ के विपरीत निवेश करने में सहज हों और अपने निवेश के परिणाम के लिए कई वर्षों तक इंतजार कर सकें। पंड्या के अनुसार, जो निवेशक मानते हैं कि मौजूदा बाजार रुझान लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है, वे कॉन्ट्रा फंड चुन सकते हैं।

जो निवेशक अपना पोर्टफोलियो थोड़ा अलग बनाना चाहते हैं और बाजार जैसे पोर्टफोलियो के खिलाफ एक तरह की हेजिंग चाहते हैं, वे भी इन फंडों में निवेश कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए निवेशकों में ज्यादा जोखिम सहने की क्षमता और लंबी निवेश अवधि होना जरूरी है। वहीं संयमी निवेशक या जो लोग बाजार के स्थापित ट्रेंड और मोमेंटम का ही पालन करना पसंद करते हैं, उन्हें कॉन्ट्रा फंड से दूर रहना चाहिए।

क्या एक होने पर दूसरा जोड़ना चाहिए?

सबसे पहले अपने मौजूदा पोर्टफोलियो का आकलन करें। अगर आपके पास पहले से कोई वैल्यू फंड है, तो कॉन्ट्रा फंड (या इसके उलट) तभी जोड़ें जब इससे पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन बढ़े।

कुमार कहते हैं, “यदि दोनों प्रकार के फंड खरीदने से पोर्टफोलियो में ओवरलैप होता है, तो ऐसा करने से बचें। इसके बजाय, इन दोनों प्रकार के फंडों में से किसी एक को चुनें जिसका बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड हो और निवेश की रणनीति अधिक स्थिर हो। कुमार के मुताबिक निवेशकों को फंड के नाम या कैटेगरी के बजाय उसकी निवेश शैली और पिछले प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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First Published - March 9, 2026 | 4:10 PM IST

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