दिवालिया एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) लागू हुए 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसे पिछले दशक के सबसे बड़े सुधारों में गिना जाता है। यह ऐसे समय पर आई जब देश दोहरी बैलेंस शीट की समस्या से जूझ रहा था। किसी बड़ी बाजार अर्थव्यवस्था में कुछ कंपनियों का नाकाम होना स्वाभाविक है। इसलिए जरूरी है कि कानूनी ढांचा कंपनियों के आसानी से आने और निकलने का रास्ता दे।
इससे आर्थिक जीवंतता सुनिश्चित होती है और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए तेज आर्थिक वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। भारत ने जहां 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ ही खुली अर्थव्यवस्था तैयार कर दी थी मगर कंपनियों के लिए निकलने का सहज रास्ता मौजूद नहीं था।
कंपियों के संकट से निपटने के लिए मौजूद व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी। इसलिए आईबीसी लागू होने से दिवालिया मामलों से निपटने की आधुनिक व्यवस्था मिल गई। पिछले दशक का अनुभव स्पष्ट दिखाता है कि नतीजे बेहतर हुए हैं मगर वांछित स्तर तक नहीं पहुंचे हैं।
भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद ने 2025 तक समाधान प्रक्रिया से गुजरी 1,194 कंपनियों का अध्ययन किया। अध्ययन से पता चला कि समाधान के पांच वर्ष बाद इन कंपनियों की बिक्री औसतन 90 प्रतिशत तक बढ़ गई। उनका पूंजीगत व्यय 100 प्रतिशत से अधिक बढ़ा और कर्मचारियों पर होने वाला खर्च भी 70 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया। इनसे यही पता चलता है कि आईबीसी प्रक्रिया ने मूल व्यवसाय को नया जीवन देने में मदद की।
भारतीय दिवालिया एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक लेनदारों ने समाधान योजनाओं के तहत 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है। जिन करीब 1,300 मामलों में उचित कीमत तय की गई थी, उनमें 94 प्रतिशत से अधिक वसूली हो गई और लेनदारों ने परिसमापन मूल्य का 166.85 प्रतिशत मिल गया। जो दावे स्वीकार किए गए थे, उनकी तुलना में वसूली कम रहनी ही थी।
विशेष रूप से कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रियाओं (सीआईआरपीएस) में से 40 प्रतिशत से अधिक औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) या निष्क्रिय कंपनियों से थीं जिससे औसत प्राप्त मूल्य कम हो गया। जैसे-जैसे पुराने दिवालियापन मामलों का समाधान होता जाएगा औसत वसूली बढ़ने की उम्मीद है।
खास बात है कि कॉरपोरेट दिवालिया समाधान की जिन प्रक्रियाओं में समाधान योजना आईं, उनमें 40 प्रतिशत से ज्यादा औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड से थीं या बंद हो चुकी थीं, जिससे वसूल गई औसत कीमत कम हो गई। जैसे-जैसे पुराने दिवालिया मामले सुलझेंगे, वैसे-वैसे औसत वसूली बढ़ने की उम्मीद है।
मगर आईबीसी ने एक क्षेत्र में निराश किया है और वह है दिवालिया मामलों को सुलझाने में लगने वाला समय। मार्च 2026 तक जिन 1,419 मामलों में समाधान योजनाएं बनीं, उन्होंने औसतन 621 दिन लिए। परिसमापन यानी कंपनी बिकने के साथ खत्म होने वाले लगभग 3,000 मामलों में औसतन 531 दिन लगे, जबकि संहिता का प्रयास है कि 330 दिनों के भीतर ही समाधान हो जाए।
हाल ही में पारित ऋणशोधन और दिवाला संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 का उद्देश्य कानून को मजबूत करना और परिणामों में सुधार करना है। उदाहरण के लिए, अब लेनदारों की समिति (सीओसी) परिसमापन प्रक्रिया के दौरान निगरानी करेगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और शायद वसूली भी बढ़ेगी। अब सीओसी को योजना मंजूर करने के कारण रिकॉर्ड में दर्ज करने होंगे, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और आगे चलकर मुकदमे भी कम हो सकते हैं। इसके अलावा निर्णय देने वाली प्राधिकरण को समाधान योजना 30 दिन के भीतर मंजूर या नामंजूर करनी होगी। देर होने पर उसे कारण लिखना होगा।
ऐसे कई प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन कानून को मजबूत करना परिणामों में सुधार का केवल एक पहलू है और सरकार को समय-समय पर ऐसा करने का श्रेय देना होगा। दूसरा पहलू है क्षमता की कमी। कंपनी कानून से जुड़े मामले संभालने के लिए बनाए गए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) दिवालिया मामलों को भी देख रहे हैं। ऐसे में इन संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है ताकि आईबीसी के तहत न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जा सके। समाधान में एक सीमा से ज्यादा देर हो तो कंपनियों का मूल्य नष्ट हो सकता है और कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो सकता है।