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Editorial: क्रेडिट स्कोर से परे, भारत के खुदरा ऋण बाजार में बड़ा बदलाव

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पिछले पांच वर्षों में कुल ऋण बाजार में पहली बार कर्ज लेने वालों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। हालांकि नए उधारकर्ताओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है

Last Updated- June 04, 2026 | 11:38 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर

इस समाचार पत्र में प्रकाशित खबरों के मुताबिक भारत का खुदरा ऋण बाजार महामारी के पश्चात एक महत्त्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है। ट्रांसयूनियन क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (सिबिल) द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कुल ऋण बाजार में पहली बार कर्ज लेने वालों की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। हालांकि नए उधारकर्ताओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है लेकिन कुल ऋण बाजार कहीं तेजी से बढ़ रहा है।

जैसे-जैसे ऋणदाता जोखिम को लेकर संवेदनशील होते जा रहे हैं, औपचारिक ऋण तक पहुंच धीरे-धीरे उन ग्राहकों की ओर स्थानांतरित हो रही है जिनका पुनर्भुगतान का रिकॉर्ड और क्रेडिट स्कोर साबित है। इससे परिसंपत्ति गुणवत्ता को बेहतर रखने में मदद भी मिली है लेकिन पहली बार के उधारकर्ताओं की घटती हिस्सेदारी से औपचारिक ऋण समावेशन को लेकर चिंताएं उत्पन्न हो रही हैं।

संभावित उधारकर्ताओं का बड़ा हिस्सा अब भी औपचारिक ऋण तंत्र से बाहर है जिससे चुनौती और गंभीर हो जाती है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के ग्रामीण आर्थिक स्थिति और भावना सर्वेक्षण के 11वें दौर में देखा गया कि लगभग 22 फीसदी ग्रामीण परिवार केवल अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हैं।

इसी तरह, नीति आयोग, ट्रांसयूनियन सिबिल और माइक्रोसेव कंसल्टिंग की हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि वित्तीय समावेशन में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद ऋण के लिए पात्र लगभग दो-तिहाई महिलाएं औपचारिक ऋण प्रणाली से बाहर हैं। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में से 17 फीसदी ने किसी भी प्रकार का ऋण नहीं लिया था जबकि 8 फीसदी अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर थे।

अनौपचारिक वित्त पर निर्भरता विशेष रूप से सूक्ष्म उद्यमों में अधिक स्पष्ट रही,जहां 12 फीसदी ने अनौपचारिक ऋणदाताओं से उधार लिया। भारत में औपचारिक ऋण तक पहुंच की इन खाइयों के साथ-साथ प्रवेश स्तर के उधार लेने की प्रकृति भी बदल रही है। परंपरागत रूप से, दोपहिया ऋण, कृषि ऋण और छोटे व्यक्तिगत ऋण जैसे उत्पाद औपचारिक वित्तीय प्रणाली में प्रवेश के द्वार का काम करते थे। आज टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का वित्तपोषण खासकर मोबाइल फोन ऋण नये ऋण लेने वाले ग्राहकों यानी एनटीसी के लिए मुख्य प्रवेश बिंदु बनकर उभरा है।

ऋण देने में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए ऋणदाताओं को यह पुनर्विचार करना होगा कि ऋण योग्यता का आकलन कैसे किया जाए। खासकर पहली बार ऋण लेने वालों के लिए।  साल 2024 में राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो के एक अध्ययन में पाया गया कि डिजिटल लेनदेन से प्राप्त वैकल्पिक आंकड़े उन उधारकर्ताओं की ऋण योग्यता का अनुमान लगाने में प्रभावी हैं जिनका कोई ऋण इतिहास नहीं है। कई जगह डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड होता है। जैसे बैंकिंग लेनदेन का इतिहास, डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड, उपयोगिता बिल भुगतान, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) रिकॉर्ड और नकदी प्रवाह के अन्य संकेतक जो पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन करने में मदद कर सकते हैं।

इस संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक का यूनिवर्सल लेंडिंग इंटरफेस (यूएलआई) जिसे 2024 में लॉन्च किया गया था और जो फरवरी 2026 तक 89 ऋणदाताओं को शामिल कर चुका था वह सहमति आधारित सत्यापित वित्तीय जानकारी ऋणदाताओं के बीच साझा करने की सुविधा देकर ऋण आकलन को बदलने की क्षमता रखता है। अधिक नये ग्राहकों और वंचित परिवारों को औपचारिक ऋण प्रणाली में लाना वित्तीय समावेशन को गहराई देने के लिए जरूरी है।

वित्तीय साक्षरता में सुधार, ऋण जागरूकता को मजबूत करना, हाइब्रिड क्षेत्रीय-डिजिटल पहुंच का विस्तार करना और वैकल्पिक ऋण आकलन तंत्र अपनाकर, ऋणदाता औपचारिक वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में प्रवेश को तेज कर सकते हैं। क्रेडिट स्कोर जोखिम का आकलन करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है लेकिन भारत के वित्तीय समावेशन के अगले चरण में केवल क्रेडिट स्कोर से आगे देखना होगा ताकि उन लोगों की पुनर्भुगतान क्षमता को पहचाना जा सके जिन्हें औपचारिक रूप से उधार लेने का अवसर कभी नहीं मिला और अनौपचारिक उधारी को कम किया जा सके।

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First Published - June 4, 2026 | 11:38 PM IST

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