जब भी भारत में कोई कंपनी तेजी से उभरती है तब लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि पहले थोड़ी देर रुककर उसके प्रदर्शन को देखा जाए। ज्यादातर मामलों में, ये कंपनियां आर्थिक सुधारों के नए अवसरों का लाभ उठाकर अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं और तरक्की करती हैं। लेकिन अक्सर भारत में उद्यमिता वाले उत्साह और जोश की गति इतनी तेज होती है कि कॉरपोरेट शासन के ठोस नियम पीछे रह जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप सुर्खियों में छा जाने वाले विवाद पैदा होते हैं।
इस रुझान को दो बातें परिभाषित करती हैं। पहली, यह रुझान इस सदी के दूसरे दशक में जोर पकड़ने लगा जो वास्तव में निजी उद्यमिता के लिए उत्साह के वर्ष थे। दूसरी, यह आंशिक रूप से सरकार और नियामकीय संस्थाओं की उपयुक्त कार्यप्रणाली में कमी या लेखा परीक्षकों और कॉरपोरेट बोर्ड की असफलता को दर्शाता है। यही रुझान हमने सत्यम कंप्यूटर्स, सहारा, रैनबैक्सी, किंगफिशर एयरलाइंस, नीरव मोदी, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस (आईएलऐंडएफएस), बैजूस, येस बैंक और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज जैसी कंपनियों के मामलों में भी देखा।
इस सूची में नया नाम है 9 साल पुरानी कंपनी, पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड का जिसका लाइसेंस पिछले महीने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा रद्द कर दिया है। पेटीएम ब्रांड, मोबाइल वॉलेट का निर्विवाद मानक है। सिर्फ एक दशक पहले, विजय शेखर शर्मा की प्रवर्तक कंपनी वन97 कम्युनिकेशन की छत्रछाया में पेटीएम ने देश भर का ध्यान आकर्षित किया, जब उन्होंने अपने पेटीएम वॉलेट की खूबियों का प्रचार बड़े-बड़े अखबारों में किया। दिलचस्प बात है कि यह विज्ञापन उसी सुबह अखबार में दिखे जब सरकार ने अचानक नोटबंदी की घोषणा की।
शर्मा की इस तरह की तीव्र प्रतिक्रिया ने उनके उद्यमी गुणों को प्रदर्शित किया। उन्होंने न केवल उस चुनौतीपूर्ण समय में बल्कि वर्ष 2022 तक भी सफलता की ऊंचाइयों को छुआ जब मोबाइल वॉलेट इंटरऑपरेबिलिटी ने फोनपे, गूगल पे और अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियों को पर्याप्त उपयोगकर्ताओं का आधार दिलाया। हालांकि फोनपे और गूगल पे ने जल्द ही यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) मंच पर पेटीएम को पीछे छोड़ दिया, फिर भी पेटीएम वह शब्द बन गया है, जिसका उपयोग देश के लोग तुरंत ऑनलाइन भुगतान के लिए करते हैं।
पेटीएम पेमेंट्स बैंक की स्थापना मूल रूप से मोबाइल वॉलेट के आधार पर एक तरह की बैकवर्ड इंटीग्रेशन रणनीति के तहत की गई थी। लेकिन सिर्फ पांच साल बाद वर्ष 2022 में, आरबीआई ने कंपनी को नए ग्राहकों को जोड़ने से रोक दिया। केंद्रीय बैंक ने यह कहा कि कंपनी के जोखिम प्रबंधन नियम कमजोर हैं, विशेषकर केवाईसी सत्यापन में।
तथ्य यह है कि मूल कंपनी, अगले लगभग चार वर्षों में अपनी प्रक्रिया सुधारने में नाकाम रही। अहम बात यह है कि इस विवाद में कोई पीड़ित पक्ष नहीं था क्योंकि ग्राहकों को अन्य संस्थानों में स्थानांतरित कर दिया गया था। लेकिन वर्ष 2016 से 2022 के बीच मीडिया और सरकार द्वारा प्रवर्तक को मिली वाहवाही के बावजूद इन अनुपालन खामियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
किंगफिशर एयरलाइंस के बरबाद होने जैसी घटनाओं को अक्सर अनुचित सरकारी नीति का परिणाम माना जाता है। जब सरकार ने विमानन कंपनियों को कम ब्याज दर वाले बुनियादी ढांचा वाले ऋण की श्रेणी में शामिल किया, तो इस विमानन कंपनी ने सरकारी बैंकों से बड़ा कर्ज लिया। सिद्धार्थ माल्या को यह कंपनी चलाने की जिम्मेदारी उनके कर्ज में डूबे पिता ने दी थी और उन्होंने इस विफलता को सामान्य व्यावसायिक गलती बता कर खारिज कर दिया।
लेकिन सवाल उठता है कि विमानन कंपनी के बोर्ड में वकील, बैंक अधिकारी, विमानन कंपनी के पूर्व प्रमुख और विजय माल्या के करीबी सहयोगी शामिल थे, तब बिजनेस क्लास सेवाओं को इकनॉमी क्लास किराये पर देने जैसी रणनीति को कैसे मंजूरी मिली।
आईएलऐंडएफएस के मामले में भी बोर्ड की जिम्मेदारी पर सवाल उठ सकते हैं। कंपनी ने एनरॉन जैसी शैली में अपनी कई सहायक कंपनियों पर कर्ज बढ़ाकर नुकसान छिपाने की कोशिश की और लंबे समय की परियोजनाओं के लिए अल्पकालिक कर्ज का सहारा लिया। वर्ष 2018 के अंत में जब बड़े पैमाने पर चूक की बात सामने आई तब सरकार ने तेजी से बोर्ड को भंग कर नए सदस्यों की नियुक्ति की ताकि कंपनी में सुधार किए जा सके।
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों जैसे कि आईएलऐंडएफएस पर ढीली निगरानी स्पष्ट रूप से विफल रही हालांकि पहले सहारा के ‘पैरा-बैंकिंग’ मॉडल के पतन को चेतावनी संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए था। हालांकि नियामकीय निगरानी, ऑडिट एवं रेटिंग मानकों को उसी वक्त से सख्त किया गया है लेकिन भारत की एक बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी में दिखे इस संकट ने महीनों तक ऋण तंत्र को प्रभावित किया।
आईएलऐंडएफएस या नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में हेरफेर से सबंधित को-लोकेशन विवाद यह दिखाता है कि प्रतिष्ठित संस्थानों को कम निगरानी के साथ सुरक्षित मान लेना कितना जोखिम भरा हो सकता है।
एनएसई के मामले में, प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के एक रहस्यमय हिमालयी योगी के साथ संवेदनशील जानकारी साझा करने के चौंकाने वाले खुलासे उन संस्थानों में शासन के मानकों की एक परेशान करने वाली तस्वीर पेश करते हैं, जिन्हें कथित तौर पर पेशेवर तरीके से चलाया जाता है। लेकिन जहां ये संकट, घरेलू कारोबार की प्रणाली को प्रभावित करते हैं, वहीं सत्यम, रैनबैक्सी और बैजूस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। सत्यम के बोर्ड में हार्वर्ड और सिलिकॉन वैली के लोग जुड़े थे लेकिन वे सभी इस तथ्य से पूरी तरह अनजान रहे कि फंड चुपचाप निकाला जा रहा था।
रैनबैक्सी जैसी कंपनी को एक मशहूर व्यापारिक परिवार के दो भाइयों ने चलाया और इस कंपनी को अनुसंधान में उपलब्धियों और अमेरिका में निर्यात के लिए खूब सराहा गया। इस कंपनी की तारीफ और बढ़ी जब जापान की दाइची सैंक्यो ने 4.6 अरब डॉलर के करार के साथ इसमें बहुल हिस्सेदारी हासिल की। उस वक्त तक यह घरेलू दवा उद्योग का सबसे बड़ा सौदा था। छह साल बाद, एक व्हिसलब्लोअर ने बेहद गंभीर स्तर की धोखाधड़ी का खुलासा किया और इसके मुताबिक कंपनी में खराब निर्माण प्रक्रिया, नकली दवाएं और तरह-तरह के संदिग्ध काम चल रहे थे।
‘द ट्रुथ पिल’नाम की किताब में भारत के औषधि नियामक की चयनात्मक संकीर्ण सोच का भयावह ब्योरा पेश किया गया। दाइची के निवेश करने से पहले ही रैनबैक्सी की जांच अमेरिकी फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) द्वारा की जा रही थी लेकिन इस तथ्य को जापानी साझेदारों के सामने छुपा दिया गया।
वहीं भारत का पहला यूनिकॉर्न बैजूस, कोविड के दौरान बेपरवाह तरीके से संपत्तियों का अधिग्रहण करता रहा और अब यह कर्ज में डूबा हुआ है। इसके ऊपर अमेरिकी अदालत में ऋण और धन छुपाने के मामले में मुकदमा चल रहा है और भारत में भी इस पर ग्राहकों को गुमराह करने के आरोप लगे हैं। सवाल उठता है कि इस कंपनी की निगरानी कौन कर रहा था? यह तर्क दिया जा सकता है कि व्यापारिक घपले दुनिया भर में होते हैं और अमेरिका में भी इनकी कमी नहीं है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत, जो हमेशा विदेशी निवेश के लिए उत्साह दिखाता है वास्तव में ऐसे घोटालों का बोझ सबसे कम उठा सकता है। भारत के उद्यमियों में चाहे कितनी भी प्रतिभा क्यों न हो, कॉरपोरेट शासन भारत की सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है।