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Editorial: ईंधन की आत्मनिर्भरता

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भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल से संकट पैदा होने का खतरा नया नहीं है। ऐसा पहले भी हो चुका है

Last Updated- March 25, 2026 | 10:00 PM IST
crude oil

अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के साथ दुश्मनी खत्म करने के लिए 15 बिंदुओं वाला एक एजेंडा भेजा है। इसे लेकर तेल और गैस बाजारों ने आशावादी प्रतिक्रिया दी है। इस खबर के सामने आने के बाद ईरान के अधिकारियों ने जो बयान दिए हैं उसने इन उम्मीदों में और इजाफा किया है। उन्होंने कहा है कि वे गैर दुश्मन मुल्कों के जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने देंगे बशर्ते वे ईरान से संपर्क बनाए रखें और इसकी इजाजत हासिल करें।

यह समझना आसान है कि इन संकेतों को खाड़ी में हफ्तों से जारी संकट के अंत और जीवाश्म ईंधन बाजार में सामान्य हालात की वापसी के रूप में देखा जा रहा लेकिन अमेरिका ईरान और इजरायल से जुड़े सभी पक्षों के अप्रत्याशित स्वभाव को देखते हुए यह अपेक्षा करना शायद कुछ ज्यादा ही होगा। ठोस ढंग से कहें तो भारत को आने वाले समय में आयातित ऊर्जा के लिए अपेक्षा से अधिक कीमतें चुकानी पड़ सकती हैं।

कारोबारी मार्गों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का एक असर यह हुआ है कि कुछ बाजार जो पहले वैश्विक स्वरूप में थे मसलन कच्चे तेल का बाजार आदि, अब उनकी क्षेत्रीय कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव नजर आ रहा है। उदाहरण के लिए भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र का तेल मूल्य टेक्सस या उत्तरी सागर के तेल कीमतों की तुलना में कहीं अधिक मायने रखता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, आने वाले कुछ महीनों के बड़े हिस्से में इंडियन बास्केट कच्चे तेल की कीमत पिछले कई महीनों की तुलना में लगभग दोगुनी हो सकती है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि ऐसा होता है तो आम परिवारों और सरकार दोनों की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ेगा।

भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल से संकट पैदा होने का खतरा नया नहीं है। ऐसा पहले भी हो चुका है। हम 2013 में, 1999 में और उससे पहले भी ऐसे हालात झेल चुके हैं। इससे निपटने के लिए अधिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही एकमात्र उपाय है लेकिन उसे तत्काल लागू नहीं किया जा सकता है। हालांकि, वर्तमान सरकार के पास ऐसा करने के लिए एक दशक से अधिक का समय रहा है।

साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से इसे अपेक्षाकृत लंबे समय तक प्रबंधनीय ऊर्जा कीमतों का लाभ मिला। इस अवधि में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कुछ कदम उठाए गए जैसे नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधन का पर्याप्त विकल्प नहीं है, विशेषकर बिजली की बेस लोड आवश्यकता के लिए, और आने वाले कई वर्षों तक भी नहीं होगी। इसलिए तेल और गैस की घरेलू खोज, उत्पादन और प्रसंस्करण बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

दुर्भाग्यवश इस अहम मानक पर सरकार पीछे रह गई है। उत्खनन नीति में कुछ अग्रगामी बदलावों के प्रयासों के बावजूद उत्पादन 2014 के बाद से 30 फीसदी कम हुआ है। यह तब है जबकि घरेलू मांग में लगातार इजाफा हुआ है। 2016 में नई उत्खनन और लाइसेंसिंग नीति की शुरुआत ने न तो उत्पादन में ठोस वृद्धि की और न ही व्यावसायिक रुचि आकर्षित की। उत्पादन साझेदारी को राजस्व साझेदारी से बदल दिया गया, लेकिन इसका अर्थ यह हुआ कि कंपनियों को परियोजना की समय-सीमा में बहुत बाद में राजस्व प्राप्त होता।

इससे उनकी रुचि कम हो गई। नए खुले क्षेत्रों के लिए डेटा कवरेज बहुत कम रहा और मूल्य अस्थिरता बनी रही। इस बीच ब्राजील ने भूवैज्ञानिक डेटा में निवेश करके उत्खनन का स्तर दो से तीन गुना बढ़ा लिया है। भारत को स्पष्ट रूप से अधिक मेहनत करनी होगी और अन्य देशों की सफलताओं से सीखना होगा। यह संकट या कहें संकट का खतरा आत्मनिर्भरता बढ़ाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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First Published - March 25, 2026 | 9:56 PM IST

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