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Editorial: ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध का दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर असर

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पश्चिम एशिया युद्ध के कारण होर्मुज और लाल सागर में व्यापार ठप होने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है

Last Updated- March 29, 2026 | 10:12 PM IST
Iran War Economy
चित्रण: विनय सिन्हा

अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच युद्ध को एक महीना पूरा हो चुका है। अभी तक इसके समाप्त होने के आसार नहीं नजर आते। दोनों पक्षों ने ऐसी शर्तें रखी हैं जिन्हें पूरा करना उन दोनों के लिए लगभग नामुमकिन ही है। अमेरिका की 15 बिंदुओं वाली योजना में ईरान से ऐसी गारंटी मांगी गई है जो उसे शत्रुतापूर्ण क्षेत्र में भविष्य के हमलों से बचाव करने में असमर्थ बना देगी। इसके जवाब में ईरान ने भी शर्तें रखीं, जैसे प्रतिबंध हटाना, नेतृत्व करने वालों की हत्याओं को रोकना और भविष्य में अमेरिकी आक्रामकता के खिलाफ गारंटी देना।

पाकिस्तान, मिस्र, तुर्किये और सऊदी अरब द्वारा समझौता कराने के प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों का अड़ियल रवैया वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी आर्थिक बोझ डालने वाला है। पहले से ही एशियाई देश, जो पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, मुद्रास्फीति के प्रभाव और ईंधन की कमी से उत्पन्न कठिनाइयों को नियंत्रित करने के लिए जूझ रहे हैं, जिसका उनकी अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त पर दीर्घकालिक प्रतिकूल असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, तेल विपणन कंपनियों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को 10 रुपये प्रति लीटर कम करना, भारतीय सरकारी राजस्व को वार्षिक आधार पर 1.2 लाख करोड़ रुपये से 1.7 लाख करोड़ रुपये तक घटा सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए और अधिक कठिनाई सामने है, क्योंकि प्रतिशोधी हमलों की दोबारा शुरुआत और यमन के हूतियों द्वारा इजरायल के खिलाफ अप्रत्याशित आक्रामकता ने एक नया मोर्चा खोल दिया है। यह नया मोर्चा स्वेज नहर और लाल सागर होकर चलने वाले एक अन्य प्रमुख वैश्विक व्यापार मार्ग को खतरे में डाल सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट से समुद्री तेल और गैस व्यापार का एक चौथाई हिस्सा होता है और यह पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन उत्पादकों का मुख्य मार्ग है। अब तक ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में खनन और नाकेबंदी ने तेल की कीमतों को 73 डॉलर प्रति बैरल (बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड) से बढ़ाकर 110-119 डॉलर तक पहुंचा दिया है, साथ ही इसकी भारी कमी भी पैदा की है। पूर्वी एशिया पर इसका विशेष रूप से गंभीर असर पड़ा है क्योंकि 80 से 90 फीसदी कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से आते हैं।

सऊदी अरब ने नाकेबंदी का सामना करने के लिए अपने पूर्व-पश्चिम स्थलीय पाइपलाइन से लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक तेल प्रवाह बढ़ाने की कोशिश की, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ। लेकिन अब वह मार्ग भी खतरे में है।

स्वेज नहर/लाल सागर दुनिया के कंटेनर यातायात का एक-तिहाई हिस्सा संभालता है, और दुनिया पहले ही 2023 और 2024 में हूती व्यवधानों का असर देख चुकी है। जहाजों को अफ्रीका के पश्चिमी तट से नीचे और केप ऑफ गुड होप के चारों ओर लंबा मार्ग लेना पड़ा, जिससे शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम सहित, तेजी से बढ़ गई और वैश्विक मुद्रास्फीति दबाव तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और गहरा गया।

यह लगातार स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की प्रतिक्रियाओं और क्षमताओं का गंभीर रूप से गलत आकलन किया है। ईरान के राजनीतिक और सुरक्षा नेतृत्व की हत्या ने भी उसे आत्मसमर्पण करने के लिए प्रेरित नहीं किया। इसके विपरीत, उसने बार-बार अपने विरोधियों को चकमा देने वाले विभिन्न हथियारों का इस्तेमाल किया है।

दुनिया के सबसे उन्नत हथियारों से एक महीने तक ईरान पर हमले करने के बावजूद, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का अनुमान है कि उसके मिसाइल भंडार और ड्रोन क्षमता का केवल लगभग एक-तिहाई ही नष्ट हुआ है। बाकी की स्थिति को लेकर वे अनिश्चित हैं। एक ऐसा देश जिसने ठीक इसी परिस्थिति के लिए योजना बनाई है और जिसे लंबे युद्ध और कठिनाइयों का अनुभव है, उसके लिए लंबा, असमान और थकाऊ युद्ध कोई नुकसान नहीं माना जाता। लेकिन अमेरिका और इजरायल के लिए सम्मानजनक निकास का रास्ता न मिलने से पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावना लगातार दूर होती जा रही है।

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First Published - March 29, 2026 | 10:10 PM IST

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