अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरुआत को 100 दिन से अधिक वक्त हो गया। इन हमलों को क्रमश: एपिक फ्यूरी और राइजिंग लॉयन का नाम दिया गया था। अब यह युद्ध पहले विश्व युद्ध की लड़ाई के उस हिस्से की तरह हो गया है जहां दोनों ही पक्ष बिना किसी उल्लेखनीय सफलता के लगातार लड़ रहे हैं।
अयातुल्लाह खामनेई सहित कुछ शीर्ष नेताओं के मारे जाने, अहम बुनियादी ढांचे को व्यापक तौर पर नष्ट किए जाने और करीब 3,500 मौतों के बावजूद ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम समाप्त करने और हिजबुल्ला जैसे राजनीतिक साझेदारों को त्यागने की अमेरिका और इजरायल की मांग के समक्ष नहीं झुका है।
यह संघर्ष पूरे पश्चिम एशिया में फैल गया है जहां अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी कतर, बहरीन और यूएई अपने तेल और गैस बुनियादी ढांचे के विनाशकारी नुकसान का सामना कर रहे हैं। पाकिस्तान द्वारा कराई गई युद्ध विराम वार्ता में कोई प्रगति नहीं हुई क्योंकि दोनों पक्ष अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
इस बीच शेष विश्व को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है क्योंकि ईरान और अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के दोनों सिरों को अवरुद्ध कर रखा है। यही वह मार्ग है जहां से दुनिया के कुल कच्चे तेल और गैस का करीब 40 फीसदी आता-जाता है। लड़ाई के पहले जहां इस मार्ग से रोज करीब 100 से अधिक पोत निकलते थे वहीं अब इनकी संख्या घटकर 7 रह गई है। इसके चलते असाधारण वैश्विक तेल संकट उत्पन्न हुआ है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार कर गया है जो 28 फरवरी के 72 डॉलर से बहुत अधिक है।
करीब 146 देशों ने पेट्रोल की कीमतों में 40 से 90 फीसदी की बढ़ोतरी की है। केवल भारत ही ऐसा देश है जिसने महज 7.7 फीसदी का इजाफा किया है। जीवाश्म ईंधन की कमी का असर मूल्य वृद्धि के रूप में सामने है। उदाहरण के लिए भारत में उद्योगों को गैस आपूर्ति सीमित किए जाने के कारण छोटे और मझोले उपक्रमों को बंदी का सामना करना पड़ा है।
इसके चलते प्रवासी श्रमिक अपने गांवों को लौटने को मजबूर हुए हैं। यह कोविड-19 के शुरुआती दिनों की याद दिलाता है। उर्वरक कीमतों में वृद्धि के कारण वैश्विक खाद्य आपूर्ति भी जोखिम में है। प्रमुख वैश्विक बाजार सूचकांकों में गिरावट आई है। अकेले भारत से निवेशकों ने लाखों करोड़ रुपये की निकासी की है और रुपया लगातार कमजोर हुआ है।
दोनों पक्षों ने आकलन में कुछ हद तक गलती की है। अमेरिका की यह मांग ईरान को पूरी तरह अस्वीकार्य है कि वह यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद कर दे और सऊदी अरब को केंद्र बनाकर अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत एक क्षेत्रीय संघ को प्राथमिकता दे। ऐसा खासकर इसलिए है क्योंकि इजरायल परमाणु शक्ति बन चुका है, उसकी क्षेत्रीय खुफिया नेटवर्क तक पहुंच और विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षाएं भी हैं। यही तर्क अमेरिका की उस मांग पर भी लागू होता है जिसमें ईरान से 60 फीसदी शुद्धता तक संवर्धित (जो सैन्य स्तर से नीचे है) यूरेनियम भंडार सौंपने को कहा गया है।
अमेरिका इस सुझाव से सहमत नहीं है कि इन चर्चाओं को होर्मुज स्ट्रेट को तुरंत फिर से खोलने और ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने से अलग रखा जाए। अब तक केवल इजरायल को लाभ हुआ है। उसने लेबनान के 20 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया है और क्रमशः गाजा पट्टी और पश्चिमी किनारे के 60 फीसदी से अधिक हिस्से पर उसका नियंत्रण है। अब लड़ाकों ने एक-दूसरे पर हमले फिर से शुरू कर दिए हैं जो प्रतिशोधी छापामार हमलों के अंतहीन चक्र में बदल गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, जिन्होंने यह लड़ाई शुरू की थी, अब असहाय होकर ईरान और इजरायल से तुरंत गोलीबारी बंद करने की मांग कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने सहयोगी पर नियंत्रण खो चुका है। परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया, जो वैश्विक वित्त और निवेश का जीवंत केंद्र था ठहराव की स्थिति में आ गया है और दुनिया एक ऐसे संकट में धकेल दी गई है जिसका निकट भविष्य में कोई अंत दिखाई नहीं देता।