भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने गत सप्ताह यह निर्णय किया कि 2025-26 की 2.87 लाख करोड़ रुपये की अधिशेष राशि भारत सरकार को लौटा दी जाएगी। रिजर्व बैंक ने यह निर्णय भी लिया कि आकस्मिक जोखिम से बचाव यानी बफर के तहत बैलेंस शीट के 6.5 फीसदी के बराबर रकम (प्रॉविजनिंग) रखी जाएगी। पिछले वर्ष यह 7.5 फीसदी थी।
हालांकि आर्थिक पूंजी ढांचे के तहत रिजर्व बैंक आकस्मिक बचाव को बैलेंस शीट के 4.5 से 7.5 फीसदी के बीच रख सकता है मगर यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्रीय बैंक ने बफर को कम करने का निर्णय क्यों लिया?
यद्यपि अधिशेष अंतरण राशि पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत अधिक है और एक नया रिकॉर्ड भी है, लेकिन इससे सरकार की वित्तीय मुश्किलों में ज्यादा राहत मिलने की संभावना नहीं है। अधिशेष अंतरण अपेक्षाओं के अनुरूप है और सरकार ने पहले ही इसके लिए बजट बना लिया था।
इस वर्ष के बजट अनुमान में रिजर्व बैंक और राष्ट्रीयकृत वित्तीय संस्थानों से लाभांश/अधिशेष की राशि 3.16 लाख करोड़ रुपये रखी गई है। शेष राशि वित्तीय संस्थानों से आने की उम्मीद है। किंतु इस वर्ष सरकार की कुल लाभांश आय काफी कम हो सकती है। तेल कंपनियां आम तौर पर इसमें बड़ा योगदान करती हैं मगर इस वर्ष वे अधिक देने की हालत में नहीं होंगी।
पश्चिम एशिया संकट और इससे कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने बजट की गणनाओं को काफी जटिल बना दिया है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों को हाल ही में तेल बिक्री पर रोजाना 1,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था। पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल की कीमत तीन बार बढ़ने से घाटा कुछ कम हुआ है मगर अभी कुछ और भी करना होगा।
अभी यह पता करना मुश्किल है कि तेल की ऊंची कीमतों से तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति कितनी बिगड़ी है। जून तिमाही के नतीजे ही तस्वीर साफ करेंगे क्योंकि मार्च तिमाही में इसका मामूली असर ही दिखेगा। लेकिन लाभांश ही सरकार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करने वाला एकमात्र कारक नहीं है। सरकार को ईंधन और उर्वरक सब्सिडी जैसे कुछ मदों में भी खर्च काफी बढ़ाना पड़ सकता है। साथ ही राजस्व मोर्चे पर भी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क पहले ही घटा चुकी है, जिससे राजस्व में सालाना लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये की कमी हो सकती है। आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और उत्पादन में कमी का असर कर संग्रह पर भी पड़ेगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस वर्ष मॉनसून सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिसका असर खाद्य उत्पादन पर ही नहीं बल्कि समग्र मांग पर भी पड़ेगा। उपभोग धीमा हुआ तो बजट पर दबाव बढ़ सकता है और राजस्व संग्रह प्रभावित हो सकता है।
सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.3 प्रतिशत पर रोकने का बजट बनाया है, जो अब कठिन प्रतीत होता है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि पश्चिम एशिया संकट कितने समय तक चलता है और सरकार अपनी पूंजीगत व्यय योजना को कैसे आगे बढ़ाती है।
रिजर्व बैंक अधिशेष देकर सरकार की मदद तो कर रहा है मगर उसे अपनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रुपया दबाव में है और डॉलर के मुकाबले 100 की ओर बढ़ रहा है। अर्थशास्त्रियों ने ठीक कहा है कि मुद्रा को यह मनोवैज्ञानिक स्तर पार करने से रोकने पर ही रिजर्व बैंक का जोर नहीं होना चाहिए।
दूसरी बड़ी चुनौती हर हाल में बढ़ती महंगाई दर से जूझने की है। चूंकि मौद्रिक नीति को भविष्य की ओर देखना होता है, इसलिए अगली चार से छह तिमाहियों में महंगाई का अनुमान लगाना और उसके अनुसार नीतियां बदलना मौजूदा परिस्थितियों में बेहद जटिल होगा। बॉन्ड यील्ड पहले ही बढ़ रही हैं क्योंकि बाजार सख्त मौद्रिक नीति और राजकोषीय चूक की आशंका जता रहे हैं।