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Editorial: जजों की कमी और बदहाल इंफ्रास्ट्रक्चर से जूझ रही न्यायिक प्रणाली, सुधार की जरूरत

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भारतीय अदालतों में अभी साढ़े पांच करोड़ मामले लंबित हैं। हालांकि, इस बीच जजों की कमी और खराब बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया है

Last Updated- May 15, 2026 | 9:34 PM IST
Supreme Court
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत की अदालतों में बहुत बड़ी संख्या में लंबित मामले देश की न्यायिक प्रणाली की एक सर्वविदित कमजोरी है। लंबित मामलों की संख्या लगभग 5.5 करोड़ है। इस समस्या का मुख्य कारण अदालतों में कर्मचारियों की भारी कमी बताया जाता है। मुख्य रूप से न्यायाधीशों की, साथ ही स्टेनोग्राफर और क्लर्क जैसे अधीनस्थ कर्मचारियों की भी भारी कमी है।

र्ष 2026 की स्थिति के अनुसार भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 22 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग ने 1987 में ही 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी। न्यायिक दक्षता में बाधा डालने वाले एक अन्य कारक को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह है बुनियादी ढांचा। देश भर में इसकी आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति गठित करने का भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कदम सराहनीय है।

समिति न्याय प्रदान करने की प्रणाली को उन्नत करने के लिए सरकार से लगभग 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपये का बजट अलग से आवंटन कराने की दिशा में काम करेगी।

यह पहली बार नहीं है जब किसी मुख्य न्यायाधीश ने इस समस्या को स्वीकार किया है। वर्ष 2016 में एक न्यायाधीश ने न्यायपालिका को प्रभावित करने वाली रिक्तियों और बुनियादी ढांचे की कमी को गिनाते हुए सार्वजनिक रूप से भावुक होकर अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं। एक अन्य ने निचली अदालतों में सुविधाएं विकसित करने के लिए एक राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना निगम की स्थापना का सुझाव दिया।

सिफारिश देने वाली किसी भी समिति के लिए काम आसान नहीं होगा। सरसरी तौर पर देखने से ही गंभीर भौतिक और डिजिटल कमियां सामने आती हैं, खासकर निचली अदालतों में, जहां मामलों का 85 फीसदी लंबित है। ई-कोर्ट को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद, आधी से भी कम निचली अदालतों में स्टूडियो-आधारित वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा है, और एक तिहाई से भी कम अदालतें न्यायाधीशों को आसन पर कंप्यूटर उपलब्ध करा पाती हैं।

कई अदालती भवनों में साफ शौचालय, पीने का पानी, आरामदायक प्रतीक्षा क्षेत्र या डिजिटल सूचना प्रणाली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उच्च स्तर पर भी स्थिति कुछ खास बेहतर नहीं है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक सुनवाई में, न्यायाधीशों ने पंचाटों के न्यायाधीशों को दी जाने वाली आवास और परिवहन सुविधाओं की कमी पर टिप्पणी की।

विडंबना यह है कि पंचाट, जो न्यायिक प्रक्रिया को गति देने के लिए स्थापित संस्थाएं हैं, वे भी हर तरह की कमियों से जूझ रहे हैं। इनमें से कई अस्थायी या साझा कार्यालयों से काम करते हैं।

उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट और उसका समकक्ष अपील निकाय, दोनों मध्य दिल्ली के एक सरकारी परिसर में तंग, अस्थायी परिसर से काम चला रहे हैं। दूरसंचार विवाद निपटान और अपील पंचाट पास के ही एक होटल से संचालित होता है। यही हाल माल एवं सेवा कर अपील पंचाट के दिल्ली राज्य पीठ का है।

कमियां स्पष्ट हैं और उन्हें दूर करना ही असली चुनौती है। मुख्य न्यायाधीश ने सतही डिजिटलीकरण के बजाय ‘अधिकार-केंद्रित डिजिटल दृष्टिकोण’ अपनाने की बात कही है। यह स्पष्ट नहीं है कि इसमें क्या शामिल होगा, खासकर तब जब नवनिर्मित परिसर भी अपर्याप्त और खराब रखरखाव वाले होते हैं। इस मुद्दे के लिए व्यवस्थागत सुधार और बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, न्यायिक नियुक्तियों में बढ़ते राजनीतिकरण ने सभी स्तरों पर न्यायाधीशों की कमी को और बढ़ा दिया है।

इसके अलावा, निचली और अधीनस्थ अदालतों के कामकाज की निगरानी के लिए कोई व्यवस्था नहीं दिखती, जहां न्यायाधीश अक्सर कई दिनों तक अनुपस्थित रहते हैं। सुविधाओं के उन्नयन पर खर्च करने की राज्यों की अनिच्छा से स्थिति और भी जटिल हो जाती है। केंद्र ‘न्यायिक अवसंरचना के लिए केंद्रीय प्रायोजित योजना’ चलाता है। लेकिन राज्य अक्सर अपना 40 फीसदी हिस्सा देने में विफल रहते हैं।

अधिकांश राज्यों ने न्यायिक अवसंरचना के लिए अपने बजट का 2 फीसदी से भी कम आवंटित किया है। जवाबदेही, साथ ही साथ बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च आज के समय की मांग है। हालांकि, यह देखना होगा कि कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकती हैं या नहीं। 

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First Published - May 15, 2026 | 9:27 PM IST

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