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Editorial: भारतीय रेलवे का एक वित्त वर्ष में दूसरी बार यात्री किराया बढ़ाकर राजस्व में सुधार का प्रयास

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रेलवे द्वारा यात्री किराए में बढ़ोतरी की गई जिससे वित्त वर्ष 2026 में अतिरिक्त आय प्राप्त होगी और परिचालन सुधार के प्रयास किए गए, लेकिन संरचनात्मक चुनौती बनी रहेगी

Last Updated- December 28, 2025 | 9:17 PM IST
Indian Railways
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

इस वित्त वर्ष में रेल यात्री किराये में दूसरी बार बढ़ोतरी की गई है जो 26 दिसंबर से लागू हुई है। यह बढ़ोतरी भारतीय रेल की परिचालन दक्षता में सुधार की मंशा को दर्शाती है। इस कदम के परिणामस्वरूप रेलवे से जुड़े प्रमुख शेयरों में लगभग 10 फीसदी तक की वृद्धि हुई, क्योंकि बेहतर राजस्व की संभावना को लेकर उम्मीदें बढ़ीं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान बढ़ोतरी कोई सार्थक अंतर पैदा करेगी या रेलवे वित्त में गहराई से जमी संरचनात्मक दिक्कतों को दूर कर  पाएगी।

रेलवे ने इस वृद्धि को सामान्य बताया है और इसे यात्रियों पर न्यूनतम बोझ डालने के लिए संतुलित किया गया है। इसी उद्देश्य से, उपनगरीय और मासिक सीजन टिकट तथा 215 किलोमीटर तक की दूरी के लिए सामान्य श्रेणी का किराया पहले जैसा ही रखा गया है। मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में वातानुकूलित तथा गैर-वातानुकूलित श्रेणियों का किराया 2 पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ेगा। साधारण ट्रेनों में गैर-वातानुकूलित यात्रा के लिए 215 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर किराया 1 पैसा प्रति किलोमीटर बढ़ेगा।

रेलवे को उम्मीद है कि ताजा बढ़ोतरी से वित्त वर्ष 2026 में 600 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी, जो इससे पहले की बढ़ोतरी से प्राप्त 1,500 करोड़ रुपये के अतिरिक्त होगी। हालांकि यह अतिरिक्त राजस्व आवश्यक है, लेकिन इससे रेलवे की आय की मूल संरचना में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है, क्योंकि रेलवे की 60 फीसदी से अधिक आय माल भाड़े से आती है। साथ ही, परिचालन अनुपात (परिचालन व्यय बनाम यातायात आय का अनुपात), जो 98 फीसदी के आसपास है, उसमें में भी कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं होगा।

किराया बढ़ोतरी से पहले, यात्री किराए पर होने वाली हानियां जिन्हें मुख्यतः रेलवे की सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के रूप में देखा जाता था, टिकट लागत के 40 फीसदी से अधिक थीं। इस घाटे की भरपाई माल भाड़े से होती है, जो रेलवे के थोक परिवहन पर लगभग एकाधिकार से प्राप्त होता है। विडंबना यह है कि यह क्रॉस-सब्सिडी निजी क्षेत्र के सड़क परिवहन नेटवर्क की निरंतर घटती बाजार हिस्सेदारी पर निर्भर है।

आज रेलवे का माल परिवहन बाजार में 27 फीसदी हिस्सा है और इसका लक्ष्य वित्त वर्ष 2031 तक अपने हिस्से को बढ़ाकर 45 फीसदी करना है। समस्या यह है कि यह लक्ष्य दो कमजोरियों पर आधारित है। पहला, कोयला ढुलाई राजस्व का आधे से अधिक हिस्सा है जो 2015-16 में 45 फीसदी थी। कोयले पर यह बढ़ती निर्भरता अब मध्यम अवधि के जोखिम के रूप में देखी जा रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से संबंधित अकार्बनीकरण लक्ष्यों को गति मिल रही है।

दूसरा, तैयार धातु, रसायन, कृषि उत्पाद आदि जैसे अन्य उच्च-मूल्य वाले सामान की बजाय जिंसों पर ध्यान केंद्रित करने से माल राजस्व सीमित हो गया। पंजाब से बिहार और नवी मुंबई से नोएडा तक दो लगभग पूर्ण समर्पित माल गलियारे, जिनका उद्देश्य उच्च मांग वाले मार्गों पर भीड़भाड़ की समस्याओं को हल करना है, अभी तक रेलवे के माल परिवहन हिस्से में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं ला पाए हैं।

राजस्व के लिए दबावग्रस्त माल क्षेत्र पर निर्भरता ने रेलवे को उसकी कठोर लागत संरचना के कारण एक अस्थिर स्थिति में ला दिया है। राजस्व व्यय का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर जाता है। यह आंकड़ा आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद और बढ़ सकता है। बढ़ती ऋण देनदारी और ईंधन लागत के साथ मिलकर, रेलवे का राजस्व व्यय आंतरिक राजस्व प्राप्तियों का लगभग 99 फीसदी हो जाता है, जिससे पूंजीगत व्यय के लिए लगभग कुछ भी नहीं बचता। 

इससे रेलवे विस्तार, आधुनिकीकरण और सुरक्षा ढांचे पर खर्च के लिए बजटीय सहायता और बढ़ते उधार पर अत्यधिक निर्भर रहता है, जो लंबे समय में अस्थिर है। खुद को विश्वस्तरीय उपयोगिता में बदलने के लिए, रेलवे को अपने वर्तमान मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा, जिसमें सामाजिक दायित्वों और वाणिज्यिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाया जाता है।

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First Published - December 28, 2025 | 9:17 PM IST

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