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Editorial: फेक न्यूज पर कानून या अभिव्यक्ति पर शिकंजा? कर्नाटक विधेयक पर उठे सवाल

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फेक न्यूज पर सख्ती के नाम पर कर्नाटक सरकार का प्रस्तावित कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावित कर सकता है, जिससे व्यापक बहस जरूरी हो गई है।

Last Updated- July 04, 2025 | 10:25 PM IST
Fake News
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

देश में इंटरनेट का प्रसार बढ़ रहा है और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस तथा डीपफेक के इस्तेमाल में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। ऐसे में फर्जी खबरों यानी फेक न्यूज के कारण सामाजिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। उनसे निपटने के लिए हमें सावधानीपूर्वक संतुलन कायम करना होगा। अपेक्षाकृत तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी परिदृश्य में तकनीकी रूप से पिछड़ी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करना निश्चित तौर पर समस्याएं पैदा करेगा। ऐसे में यह आवश्यक है कि भारत में अधिकारी उठाए जाने वाले नियामकीय कदमों को लेकर सतर्क रहें।

दुर्भाग्यवश इन दिनों कर्नाटक में यह सतर्कता नजर नहीं आ रही है। राज्य सरकार ने एक मसौदा विधेयक तैयार किया है जो फर्जी खबरों या अन्य दिक्कतदेह सामग्री तैयार करने पर सात वर्ष तक के कारावास की बात कहता है। यहां समस्या यह है कि फेक यानी ‘फर्जी खबरों’ की परिभाषा तय करने का काम एक विशेष समिति के हवाले कर दिया गया है जिसकी बात विधेयक में की गई है। इस कानून का इरादा समझा जा सकता है लेकिन यह इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे कानून का अत्यधिक इस्तेमाल भी समस्याएं पैदा कर सकता है। कर्नाटक सरकार ने इस बात पर समुचित विचार नहीं किया कि इसका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या असर होगा।

विधेयक एक ऐसी समस्या को प्रदर्शित करता है जो किसी एक राज्य भर की नहीं है। देश में सभी स्तरों पर सरकारी अधिकारी बहुत हद तक अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाने के काम में लगे हुए हैं। केंद्र सरकार ने कई अवसरों पर सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को संशोधित किया है ताकि वह स्वयं को अधिक शक्ति संपन्न बना सके और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अंकुश लगा सके। गत वर्ष सितंबर में बंबई उच्च न्यायालय ने उन बदलावों के एक पहलू को नकार दिया था जिनके जरिये सरकार एक ‘फैक्ट चेक यूनिट’ बना सकती थी जिसके तहत भारतीय इंटरनेट से कोई खबर हटाने का आदेश दिया जा सकता था।  

कानून व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है और उन्होंने भी ऐसे तरीके तलाशने की तेजी दिखाई है जो उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने में मदद करें। कई राज्यों ने फैक्ट चेक यूनिट कायम की हैं परंतु कुछ राज्यों ने तो इससे भी आगे बढ़कर कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र ने तथाकथित ‘अर्बन नक्सल’ के खिलाफ बिल प्रस्तावित किया है। इस शब्द का प्रयोग अक्सर वाम धड़े के असल चरमपंथियों के लिए नहीं ( खुशकिस्मती से इन दिनों यह समस्या समाप्त हो रही है) बल्कि अकादमिक तंत्र में सत्ता से असहमत लोगों के लिए किया जा रहा है। ऐसे कानूनों से अलग भी राज्यों के अधिकारियों और स्थानीय स्तर के अधिकारियों में कानून-व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट को पूरी तरह बंद करने को लेकर लगाव बढ़ता जा रहा है। कई बार तो एकदम निचले स्तर के अधिकारी भी ऐसे आदेश दे देते हैं।

विकास के क्षेत्र में बाधाओं की बात करें तो भारत की सबसे बड़ी दिक्कत अफसरशाही और नियामकीय क्षमता रही है। खासतौर पर राज्य स्तर पर। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लगातार कम होती इस क्षमता को उन प्रणालियों की ओर मोड़ा जा रहा है जो देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रतिबंधित या प्रभावित करने से संबंधित हैं। यह संवैधानिक अनिवार्यता का तो उल्लंघन है ही, देश की आबादी की विकास आकांक्षाओं के साथ भी धोखा है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि देश की सरकारें इस मामले में पीछे हटें और अपने रुख को नए सिरे से परखें। अनुबंध प्रवर्तन में शिथिलता है और जांचों में देरी होती है। क्या फर्जी खबरों या ‘खतरनाक’ अभिव्यक्ति से निपटने के नाम पर नए आपराधिक मामलों और जांचों को जोड़ना आवश्यक और उचित है? केंद्र सरकार का कानूनी ढांचे में अपराधीकरण कम करने का इरादा सराहनीय है। इस सिद्धांत को केवल कानून तक लागू न रखकर सामान्य शासन में भी लागू किया जाना चाहिए।

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First Published - July 4, 2025 | 10:14 PM IST

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