केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस सप्ताह जल जीवन मिशन (जेजेएम) के पुनर्गठन और इसे 2028 तक आगे बढ़ाने की योजना को मंजूरी प्रदान की। रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2019 में जल शक्ति मंत्रालय के तहत शुरू किए गए इस मिशन ने ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप से पानी की पहुंच को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है।
नल-जल कवरेज 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों (कुल का लगभग 17 फीसदी) से बढ़कर आज लगभग 15.8 करोड़ परिवारों तक पहुंच गया है, जो राज्यों द्वारा पहचाने गए 19.36 करोड़ ग्रामीण घरों में से 81 फीसदी से अधिक को कवर करता है।
ऐसे में अगला चरण जिसे जेजेएम 2.0 कहा जा रहा है, एक स्वागत योग्य कदम है। इसमें लगभग 8.69 लाख करोड़ रुपये का विस्तारित परिव्यय होगा। इसमें केंद्रीय सहायता 3.59 लाख करोड़ रुपये होगी, जबकि 2019-20 में 2.08 लाख करोड़ रुपये की ही स्वीकृति दी गई थी।
बात सिर्फ धन की नहीं है, नए सिरे से तैयार डिजाइन इसे नागरिक-केंद्रित उपयोगिता-आधारित सेवा वितरण कार्यक्रम बनाता है। बदलावों में एक प्रस्तावित समान राष्ट्रीय डिजिटल ढांचा ‘सुजलाम भारत’ शामिल है, जो प्रत्येक गांव को एक विशिष्ट सेवा-क्षेत्र पहचान दस्तावेज या आईडी प्रदान करेगा और पूरी पेयजल आपूर्ति श्रृंखला को स्रोत से लेकर नल तक निर्धारित करेगा। इस एकीकृत निगरानी प्रणाली से पारदर्शिता और सेवा निगरानी में सुधार की उम्मीद है।
ग्राम पंचायतों और गांव की जल एवं स्वच्छता समितियों की मजबूत भूमिकाओं के माध्यम से अधिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी ताकि ‘हर घर जल’ की घोषणा के लिए पर्याप्त गांव-स्तरीय संचालन और रखरखाव तंत्र स्थापित हो सके। वहीं ‘जल उत्सव’ जैसी पहलें समुदाय की भागीदारी को गहरा करने, गांव की जल प्रणालियों की समीक्षा करने और पेयजल के लिए सामूहिक जिम्मेदारी को सुदृढ़ करने का प्रयास करती हैं।
मिशन के पहले चरण ने नल कनेक्शनों के तेजी से विस्तार को प्राथमिकता दी, लेकिन टिकाऊ सेवा के मामले में असमानता बनी हुई है। स्वतंत्र आकलन और क्षेत्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि कई गांव अब भी अनियमित जल आपूर्ति, सीमित उपचार क्षमता या खराब रखरखाव वाली अधोसंरचना का सामना कर रहे हैं। संचालन और रखरखाव, जो अक्सर ग्रामीण अधोसंरचना कार्यक्रमों की सबसे कमजोर कड़ी होती है, अब भी स्थानीय संस्थाओं की तकनीकी क्षमता और वित्तीय संसाधनों पर काफी निर्भर हैं।
व्यय की प्रवृत्तियां भी क्रियान्वयन की असमान गति को उजागर करती हैं। यद्यपि 2025-26 के लिए केंद्रीय बजट में मिशन हेतु लगभग 67,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जो इसके पिछले वर्ष के समान ही है, लेकिन वास्तविक खर्च इससे कहीं कम रहा। 2025-26 के संशोधित अनुमान में इसे घटाकर लगभग 17,000 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि 2024-25 में वास्तविक व्यय लगभग 22,615 करोड़ रुपये रहा था।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि क्रियान्वयन में बाधाएं, खरीद में देरी और क्षमता की सीमाएं आवंटित धन के उपयोग की गति को धीमा कर रही हैं। इस संदर्भ में, कार्यक्रम को नए सिरे से शुरू करना और उसका पुनर्गठन पहले की प्रशासनिक और परिचालन चुनौतियों को दूर करने का अवसर माना जा सकता है ताकि सार्वजनिक धन का अधिक कुशल उपयोग हो सके।
समान रूप से महत्त्वपूर्ण चिंता जल की उपलब्धता से भी जुड़ी हुई है। भारत पहले से ही दुनिया के सबसे जल संकट वाले देशों में से एक है, जहां कई क्षेत्रों को गिरते भूजल स्तर और बिगड़ती जल गुणवत्ता का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण जल आपूर्ति में भूजल अब भी केंद्रीय भूमिका निभाता है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ग्रामीण भारत में पेयजल की मांग का 85 फीसदी से अधिक और सिंचाई की मांग का 60 फीसदी से अधिक भूजल स्रोतों से पूरा होता है।
जल-अभाव वाले क्षेत्रों में भूजल पर बढ़ती निर्भरता दीर्घकालिक जल सुरक्षा को कमजोर कर सकती है, जब तक कि इसे सावधानीपूर्वक प्रबंधित न किया जाए। मसलन जल संग्रहण, जलग्रहण क्षेत्र विकास, वर्षा जल संचयन और वैकल्पिक सतही जल स्रोतों में समानांतर निवेश आदि के जरिये।
इन चिंताओं को धन के कुशल उपयोग के जरिये संबोधित करना इस मिशन को सतत विकास लक्ष्य 6.1 को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण बना सकता है, जिसका उद्देश्य 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित और सस्ते पेयजल तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना है, साथ ही भारत की दीर्घकालिक ग्रामीण जल सुरक्षा को मजबूत करना भी।