क्वाड के विदेश मंत्रियों ने मंगलवार की बैठक के बाद जो संयुक्त वक्तव्य जारी किया उसमें यह बात सामने आई कि 19 वर्ष पुराना यह समूह अपनी प्रासंगिकता के लिए जूझ रहा है क्योंकि अमेरिका की विदेश नीति अमेरिका और पश्चिम एशिया के इर्द गिर्द सिमट कर रह गई है। निश्चित तौर पर चारों सदस्य देशों अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा जारी संयुक्त वक्तव्य की भाषा महत्त्वपूर्ण खनिजों, समुद्री निगरानी, बंदरगाह अधोसंरचना और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग का मेहनती एजेंडा पेश करने का वास्तविक प्रयास दर्शाती है ताकि क्वाड की व्यवहार्यता पर उठ रहे संदेह दूर किए जा सकें।
इसे समूह के लिए एक उत्साहजनक संकेत माना जा सकता है। इसके बाद भी ठोस प्रगति नजर नहीं आती। उदाहरण के लिए इस बैठक का एक प्रमुख उद्देश्य इन देशों के नेताओं के शिखर सम्मेलन की तारीख तय करना था, जो 2025 से अनिश्चितकाल के लिए टली हुई है। इस पर सवाल अब भी बरकरार है।
एक तरह से देखें तो हिंद-प्रशांत में चीन की बढ़ती ताकत से मुकाबला करने के लिए बनाए गए क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) पर मंडराती अनिश्चितता बदलती भू-राजनीतिक हकीकत को दर्शाती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है अमेरिका और चीन के बीच द्विपक्षीय तनाव में कमी। इस महीने की शुरुआत में पेइचिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात में यह साफ दिखाई दिया। सितंबर में चिनफिंग की वाशिंगटन यात्रा की योजना भी बनाई गई है।
ताइवान की स्थिति इस घटनाक्रम के केंद्र में है। उसका एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बने रहना हिंद-प्रशांत सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। फिर भी ट्रंप की यात्रा के दौरान चिनफिंग और चीनी प्रेस ने ‘एक चीन’ के सिद्धांत पर जोर दिया, जिसमें दावा किया जाता है कि ताइवान भी चीन का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि ताइवान के लिए अनौपचारिक राजनीतिक और सैन्य समर्थन की उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन व्हाइट हाउस से जो संकेत मिल रहे हैं, वे साफ करते हैं कि दोनों देश इस मामले पर अलग हैं।
अगर इससे क्वाड की मूल महत्ता पर संदेह होता है तो ट्रंप ने हाल ही में रणनीतिक विदेश नीति पर जो विचार दिए हैं. उनसे यह बिंदु स्पष्ट होता है। इसे डोनरो डॉक्ट्रिन कहा गया है जो 1823 की मुनरो डॉक्ट्रिन पर आधारित है और असल में उसी का अपडेट है। यह अमेरिका को पश्चिमी गोलार्ध के प्रमुख सुरक्षा संरक्षक के रूप में स्थापित करता है।
पश्चिम एशिया में युद्ध ने क्वाड देशों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ शुरू हुए अमेरिका, इजरायल के युद्ध ने एशिया–प्रशांत से पश्चिम एशिया की ओर अमेरिकी रक्षा बेड़े में उल्लेखनीय कमी ला दी है। ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका ने अपने महत्त्वपूर्ण गोला–बारूद का आधे से अधिक हिस्सा खर्च कर दिया है। इससे क्वाड सहयोगी विशेषकर जापान को इस बात की चिंता बहुत सता रही है कि दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में अगर चीन ने हमला किया तो अपनी रक्षा के लिए वह अमेरिका पर भरोसा नहीं कर पाएगा।
क्वाड की इस दुविधा में कुछ विडंबना भी है, खासकर ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में। एक दशक तक निश्चेत रहा क्वाड उनके पहले कार्यकाल में ही पुनर्जीवित हुआ। यह 2017 में फिलिपींस में हुए पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान पुनर्जीवित हुआ, जब ट्रंप प्रशासन ने आधिकारिक रूप से अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो–पैसिफिक कमांड कर दिया।
इसी समय भारत और अमेरिका ने कई बुनियादी रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए। राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में इस अनौपचारिक समूह ने पहली बार क्वाड लीडर्स समिट आयोजित किया, जो महामारी के कारण वर्चुअल तरीके से आयोजित किया गया। तब से अब तक छह शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। इनमें से आखिरी 2024 में हुआ। इसकी मेजबानी करने की भारत की योजना अभी तक साकार नहीं हो सकी है। हाल की यात्रा ने भी उस एजेंडे को उल्लेखनीय रूप से आगे नहीं बढ़ाया।