देश के प्रतिभूति बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक अहम मुद्दे को हल करने का प्रयास किया है, जिसने इसके स्वतंत्र कामकाज पर सार्वजनिक भरोसे को धुंधला कर दिया था। अब बंद हो चुकी हिन्डनबर्ग रिसर्च द्वारा पूर्व सेबी अध्यक्ष पर हितों के टकराव के बारे में लगाए गए आरोपों के बाद यह सवाल बना रहा कि क्या नियामक के भीतर सदस्यों के लिए पर्याप्त जांच-पड़ताल और संतुलन मौजूद हैं।
आरोप था कि हितों का टकराव कुछ सूचीबद्ध कंपनियों के खिलाफ पहले दिए गए चेतावनी संकेतों की निष्पक्ष जांच में बाधा बना। यह तथ्य कि वर्तमान सेबी अध्यक्ष ने पद संभालने के कुछ ही हफ्तों के भीतर हितों के टकराव और हितों के खुलासे पर ढांचे का आकलन करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करना आवश्यक समझा, इस बात को दर्शाता है कि प्रचलित जन धारणा को सुधारने की तत्काल आवश्यकता थी।
पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा की अध्यक्षता वाली समिति ने पाया कि बोर्ड सदस्यों के लिए हितों के टकराव पर सेबी की आचार संहिता, 2008 (सेबी संहिता) और सेबी (कर्मचारी सेवा) विनियम, 2001 (ईएसआर) अपर्याप्त हैं और इन्हें मजबूत करने की आवश्यकता है। समिति ने यह भी ध्यान दिया कि कर्मचारियों पर लगाए गए कठोर दायित्वों और सदस्यों के लिए हल्के मानदंडों के बीच तीव्र असमानता है। सदस्यों को सेबी के भेदिया कारोबार मानदंडों के तहत ‘भेदिया’ तक नहीं माना गया और उन्हें बिना किसी प्रतिबंध के शेयरों में व्यापार करने की अनुमति थी।
समिति का मानना था कि वरिष्ठ कर्मचारियों, सदस्यों और अध्यक्षों का प्रभाव और अधिकार अधिक होता है, इसलिए उनके लिए खुलासा मानदंड अधिक कठोर होने चाहिए। इसके अलावा, सेबी संहिता स्वैच्छिक है और अनुपालन न करने पर कोई दंड नहीं है, जबकि ईएसआर लागू करने योग्य है। यहां तक कि परिवार और हितों के टकराव की परिभाषाएं भी सदस्यों और कर्मचारियों के लिए अलग-अलग थीं, और हितों केे खुलासे तथा संभावित टकराव वाले मामलों से अलग रहने के संदर्भ में पारदर्शिता की कमी पाई गई।
यह बात सराहनीय है कि सेबी बोर्ड ने नवंबर 2025 में प्रस्तुत समिति की दर्जनभर सिफारिशों पर शीघ्र कार्रवाई की। 23 मार्च को जारी एक बयान से पता चलता है कि सात सिफारिशें स्वीकार की गईं। इनमें पूर्णकालिक सदस्यों और अध्यक्षों को ‘इनसाइडर’ के रूप में चिह्नित करना, निवेश प्रतिबंधों को कर्मचारियों के अनुरूप बनाना और ‘परिवार’ की परिभाषा का विस्तार करना शामिल है। मौजूदा निवेशों के लिए उन्हें पूर्व अनुमोदन के साथ परिसमापन, फ्रीज या बिक्री का विकल्प दिया गया है।
हालांकि बोर्ड ने कम से कम छह अन्य सिफारिशों में बदलाव करने का निर्णय लिया जिनमें सबसे चिंताजनक बिंदु समिति की वह सलाह थी जिसमें अध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्यों, कार्यकारी निदेशक और मुख्य महाप्रबंधक तथा उनके परिवार और अन्य संबंधों द्वारा किए गए सार्वजनिक प्रकटीकरण का उल्लेख था।
सेबी बोर्ड ने उनकी अचल संपत्ति के विवरण को सार्वजनिक करने का विकल्प चुना, जबकि परिसंपत्तियों और देनदारियों के खुलासे को एक आंतरिक तंत्र तक सीमित कर दिया, संभवतः समिति द्वारा सुझाए गए नए नैतिकता एवं अनुपालन कार्यालय के माध्यम से। और यद्यपि सेबी कर्मचारियों पर निवेश प्रतिबंध उनके जीवनसाथी और आश्रित परिवार के सदस्यों पर लागू होंगे, गैर-सूचीबद्ध प्रतिभूतियों को इस आदेश से बाहर रखा गया है।
यह जानना उपयोगी होगा कि बोर्ड ने समिति की बारीक सिफारिशों को इतने चुनिंदा रूप से स्वीकार करने पर क्या तर्क दिया, लेकिन सार्वजनिक प्रकटीकरण पर उसकी हिचक इस बात का संकेत है कि वह मूल चिंताओं को संबोधित करने में असमर्थ है। सेबी संहिता, जिसे 2023 में अंतिम बार संशोधित किया गया था, एक सुधार हो सकती है, लेकिन यह तब तक ‘स्वैच्छिक’ बना रहेगा जब तक केंद्र इसे लागू करने के लिए विनियम अधिसूचित नहीं करता और बोर्ड सदस्यों के हितों के टकराव पर एक निगरानी तंत्र नहीं बनाता।
सरकार को इस मोर्चे पर शीघ्रता से आगे बढ़ना चाहिए और शायद इस प्रक्रिया में सेबी को अपनी कुछ सीमित निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, ताकि भारत के फलते-फूलते पूंजी बाजारों की नियामक निष्पक्षता में वास्तव में विश्वास बहाल हो सके।