भारत का पहला अत्यंत गरीबी-मुक्त राज्य घोषित होने से लेकर कारोबार सुगमता में पहले पायदान की रैंक हासिल करने तक, केरल ने पिछले 10 वर्षों में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां दर्ज की हैं। राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने शाइन जेकब द्वारा भेजे गए सवालों पर अपनी लिखित प्रतिक्रिया देते हुए सरकार की उपलब्धियों और आगामी चुनावों को लेकर अपने विचार साझा किए।
पिछले 10 वर्षों में औद्योगिक मोर्चे पर आपकी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धता क्या रही है?
पिछले एक दशक में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार का मुख्य लक्ष्य रहा है कि सामाजिक कल्याण के साथ-साथ विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्र को भी तेजी से आगे बढ़ाया जाए। हमारा मानना है कि असली औद्योगिक विकास तभी संभव है जब उसका तालमेल सामाजिक प्रगति के साथ हो। हमने सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाकर अंतरराष्ट्रीय मानक स्तर तक पहुंचाया
है। खास योजनाओं और स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयासों से केरल देश का पहला राज्य बना जिसने अत्यधिक गरीबी को खत्म करते हुए 64,006 परिवारों को गरीबी से बाहर किया है। नीति आयोग के अनुसार, बहुआयामी गरीबी सूचकांक ने देश में सबसे कम गरीबी दर (0.7 फीसदी) वाले राज्यों में केरल की पहचान की है जो केरल के समावेशी विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
संपूर्ण विकास को बढ़ावा देने के लिए ही हमने बड़े पैमाने पर अपने बुनियादी ढांचे को विकसित किया। पहले जिन परियोजनाओं को असंभव माना जाता था उन्हें भी सफलतापूर्वक पूरा किया गया है जैसे कि गेल पाइपलाइन, एडामॉन-कोच्चि पावर हाईवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार और यह सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण ही हकीकत बना है। साथ ही, हमने राज्य के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की 17,749 किलोमीटर सड़कों को बेहतर बनाया और विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह का निर्माण किया गया।
केरल तेजी से ज्ञान अर्थव्यवस्था (नॉलेज इकनॉमी) बनने की राह पर आगे की ओर बढ़ रहा है। के-एफओएन परियोजना के जरिये इंटरनेट को आम लोगों का बुनियादी अधिकार बनाया गया है, जिससे 1 लाख से ज्यादा सबस्क्राइबर जुड़ चुके हैं। आईटी निर्यात और स्टार्टअप तंत्र भी वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़े हैं और राज्य में 7,000 से ज्यादा स्टार्टअप काम कर रहे हैं। राज्य में ‘वर्ष के उद्यमी’ पहल के तहत 3 लाख से ज्यादा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) शुरू किए गए हैं और 7.5 लाख से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हुए। इसके अलावा के-स्विफ्ट एकल मंजूरी तंत्र के जरिये उद्योग शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाया गया।
नीति आयोग के मुताबिक केरल राजकोषीय प्रबंधन के लिहाज से सबसे कमजोर राज्यों में शामिल है। इस पर आप क्या कहेंगे?
नीति आयोग का आकलन एक ऐसे राजकोषीय सूचकांक पर आधारित है, जो उन राज्यों को कमतर बताते हैं जो सामाजिक क्षेत्र पर ज्यादा खर्च करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस सूचकांक में ऊपर रहने वाले कई राज्य सामाजिक मानकों में पीछे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि राजकोषीय घाटा कम करने या कम खर्च करने से वास्तव में क्या हासिल होता है। केरल को ‘कर्ज के जाल’ में फंसा हुआ या कमजोर वित्तीय प्रबंधन वाला राज्य बताना गलत और भ्रामक है।
यह केंद्र सरकार की दमनकारी नीतियों को छिपाने की कोशिश भी हो सकती है। पिछले पांच वर्षों में राज्य की अपनी कर आय लगभग 1.8 गुना बढ़ी है जो वर्ष 2020-21 में करीब 47,661 करोड़ रुपये थी जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर लगभग 83,731 करोड़ रुपये हो गई। वहीं, बिना कर वाली आय 2.6 गुना बढ़कर 7,327 करोड़ रुपये से 18,761 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
राज्य की अपनी आय से खर्च चलाने की क्षमता भी बढ़ी है। वर्ष 2023-24 में राज्य ने अपनी कुल खर्च का लगभग 64 प्रतिशत अपनी आय से पूरा किया और वर्ष 2024-25 में यह करीब 60 प्रतिशत रहा। यह आंकड़े देश के औसत से बेहतर हैं, इसलिए इन्हें कमजोर प्रबंधन नहीं कहा जा सकता।
राज्य का कर्ज-राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) अनुपात भी नियंत्रण में है। कुल राज्य उत्पादन के मुकाबले कर्ज का अनुपात वर्ष 2020-21 में 38.47 प्रतिशत था, जो महामारी के समय बढ़ गया था। लेकिन अब यह घटकर वर्ष 2024-25 में 34.87 प्रतिशत हो गया है। साथ ही, सार्वजनिक कर्ज पर ब्याज की दर, राज्य की आर्थिक वृद्धि दर से कम है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कर्ज अभी भी संभालने योग्य है।
हाल में स्थानीय निकाय के चुनावों में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की लहर देखी गई। क्या विधान सभा चुनाव के नतीजे इससे अलग होंगे?
स्थानीय निकाय चुनाव और विधान सभा चुनाव के मुद्दे और परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। लेकिन जब बात विधान सभा चुनाव की आती है तब तो केरल की जनता पूरे राज्य के विकास, अच्छी शासन व्यवस्था और भविष्य की स्पष्ट योजना को ध्यान में रखकर मतदान करती है। एलडीएफ सरकार ने अपने वादों को पूरा करने का मजबूत रिकॉर्ड बनाया है।
पिछले कार्यकाल में 600 में से 580 वादे पूरे किए गए और इस कार्यकाल में किए गए 900 वादों को भी योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। सरकार ने अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा अधिकार और पूंजी स्थानीय निकायों को दिया है। पिछले 10 वर्षों में लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये स्थानीय संस्थाओं को दिए गए। इन्हीं स्थानीय निकायों के माध्यम से ‘लाइफ मिशन’ जैसी योजना लागू की गई जिसके तहत 5 लाख से ज्यादा बेघर लोगों को घर दिए गए।
हाल में भाजपा की वोट हिस्सेदारी बढ़ी है। क्या यह एलडीएफ और यूडीएफ के लिए चिंता की बात है?
केरल की पहचान धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिक सोच और सांप्रदायिक सौहार्द की मजबूत नींव पर बनी है। एलडीएफ हमेशा से संघ परिवार की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहा है। यह सही है कि दक्षिणपंथी ताकतें बड़े संसाधनों का इस्तेमाल कर रही हैं और लोगों को बांटने के लिए गलत बातें फैला रही हैं, लेकिन केरल का
धर्मनिरपेक्ष ढांचा काफी मजबूत है। इसलिए चिंता डर की वजह से नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए सतर्क रहने की है। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों की विचारधारा में फर्क है। कांग्रेस और यूडीएफ ने कई बार समझौता करने वाली नीति अपनाई है और दोनों दल कभी-कभी ‘नरम हिंदुत्व’ का रुख दिखाते हैं, जिससे स्वाभाविक रूप से उनके कुछ नेताओं का झुकाव भाजपा की ओर हो जाता है। लेकिन एलडीएफ सांप्रदायिक राजनीति, चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक, के खिलाफ मजबूती से खड़ा है।