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उत्तरमेरूर: लोकतंत्र का 1100 साल पुराना गवाह, जहां चोल काल में मटके से चुने जाते थे प्रतिनिधि

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तमिलनाडु का उत्तरमेरूर चोल काल के 1,100 साल पुराने शिलालेखों के जरिए भारत की प्राचीन और परिष्कृत लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली 'कुडुवोलई' का जीवंत प्रमाण पेश करता है

Last Updated- April 20, 2026 | 11:04 PM IST
Uthiramerur
उत्तरमेरूर में वैकुंठ पेरुमल मंदिर के सामने से टीवीके का एक प्रचार वाहन गुजरता है, जहां कुडावोलाई स्थानीय स्वशासन प्रणाली के शिलालेख मिले थे। | फोटो: शाइन जेकब

चेन्नई से लगभग 95 किलोमीटर दूर स्थित उत्तरमेरूर, पहली नजर में उत्तरी तमिलनाडु के उपजाऊ मैदानों में फैले अन्य क्षेत्र जैसा ही दिखता है। सड़क के दोनों ओर धान के खेत, जहां हाल ही में कटाई की गई है और बीच-बीच में गन्ने के खेतों की हरियाली आंखों को सुकून देती है और वहां एक पारंपरिक तमिल ग्रामीण परिवेश का एहसास होता है।

हालांकि, कस्बे में प्रवेश करते ही शांति भंग हो जाती है, जहां राजनीतिक ऊर्जा से भरा माहौल नजर आता है। कस्बे में प्रवेश करते ही विभिन्न दलों की रैलियां दिखाई देने लगीं। एक ऑटो रिक्शा मतदाताओं से द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के चुनाव चिह्न उदय सूर्य (उगता सूरज) को वोट देने का आग्रह कर रहा था। वहीं, अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम के उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रहा एक अन्य ऑटो रिक्शा अपने प्रतिद्वंद्वी वाहन के ठीक पीछे चल रहा था-चुनाव के समय भारतीय कस्बों में यह एक आम दृश्य है।

फिर भी, कांचीपुरम जिले के उत्तरमेरूर विधानसभा क्षेत्र का पूरे देश के लिए कुछ खास महत्त्व है। यहां तक कि 1,100 साल पहले भी लोग यहां मतदान करते थे और स्थानीय स्वशासन की एक विकसित प्रणाली मौजूद थी। इसे विश्व में लोकतंत्र का उद्गम स्थल माना जा सकता है। यह 13वीं शताब्दी में इंगलैंड के बहुचर्चित मैग्ना कार्टा से बहुत पहले की बात है, जिसे पश्चिम में अक्सर आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों की नींव माना जाता है

उत्तरमेरूर के वैकुंठ पेरुमल मंदिर में मिले शिलालेखों के अनुसार, इस क्षेत्र में 10वीं शताब्दी में चोल काल के दौरान स्थानीय स्वशासन की एक विस्तृत संरचना मौजूद थी। इसे कुडुवोलई प्रणाली के नाम से जाना जाता था। तमिल में कुडम का अर्थ बर्तन और ओलाई का अर्थ ताड़ का पत्ता होता है। यह चुनावी प्रणाली प्राचीन तमिलनाडु के ब्रह्मदेय गांवों में प्रचलित थी।

जैसे ही कोई वैकुंठ पेरुमल मंदिर में प्रवेश करता है, चौकीदार दयालन (द्रविड़ विचारधारा के कारण उन्होंने अपना पहला नाम नहीं बताया) दौड़ता हुआ आता है। जब राष्ट्रीय मीडिया से परिचय कराया गया, तो उसने कहा, ‘आप नरेंद्र मोदी के कहने पर आए हैं, है ना?’

पिछले छह वर्षों में, मोदी ने अपने भाषणों में यहां के शिलालेखों का कई बार उल्लेख किया, मानो वह इस समृद्ध इतिहास के एक तरह से प्रचारक बन गए हों। चाहे जनवरी 2023 में नए संसद भवन के निर्माण के लिए शिलान्यास समारोह हो, ‘मन की बात’ के दौरान हो या हाल ही में नवंबर 2025 में अयोध्या के राम मंदिर में धर्म ध्वज फहराने के दौरान, मोदी ने अपने भाषणों के माध्यम से आधुनिक चुनावों के नियमों और कुडुवोलई प्रणाली के बीच समानताएं दर्शाने पर जोर दिया।

दरअसल, इसे प्रचारित करने वाले मोदी अकेले राजनीतिक नेता नहीं थे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी 1980 के दशक में अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ तमिलनाडु के दौरे के समय इस स्थान पर आए थे और कहा जाता है कि इन शिलालेखों से प्रेरित होकर उन्होंने भारत में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने का निर्णय लिया था। वर्ष 2024 की गणतंत्र दिवस परेड में प्रस्तुत तमिलनाडु की झांकी में भी कुडुवोलई प्रणाली को दर्शाया गया था।

जवाब देने से पहले ही, दयालन ने मंदिर के मंडप के चारों ओर खुदे हुए शिलालेखों को दिखाते हुए कहा, ‘यह 920 ईस्वी सन् का है। ग्रामीण एक आम जगह पर इकट्ठा होते थे और ताड़ के पत्ते पर अपने पसंदीदा प्रतिनिधि का नाम लिखकर एक बर्तन में डाल देते थे। एक तटस्थ लड़का उस बर्तन से विजेताओं के नाम चुनता था।’

जब वह यह सब समझा रहे थे, तभी मंदिर के पास वाली सड़क से द्रमुक की एक और घोषणा सुनाई दी। पचास वर्षीय दयालन, जो विजय की फिल्मों के प्रशंसक हैं, ने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की, ‘पिछले दो चुनावों से यह द्रमुक का गढ़ रहा है। हालांकि, इस बार पट्टाली मक्कल काची (भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा) और टीवीके कड़ी टक्कर दे रहे हैं। जो भी सत्ता में आए, उसे उत्तरमेरूर के इतिहास को अधिक महत्त्व देना चाहिए।’

उत्तरमेरूर में 24 लाख से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें ज्यादातर किसान और कृषि श्रमिक हैं। मंदिर के बाहर चिप्स की दुकान चलाने वाले जी तमिझमणि ने बिना किसी झिझक के कहा, ‘द्रमुक जीतेगी। शहर के लोगों के लिए यातायात की समस्या सबसे बड़ी चिंता है। बाईपास सड़क का निर्माण तेजी से होना चाहिए और हमें बेहतर कनेक्टिविटी की जरूरत है।’

हालांकि, किसान उनके विचारों से सहमत नहीं दिखते हैं, उनमें से कुछ प्रत्यक्ष खरीद केंद्रों पर होने वाली गड़बड़ियों और भंडारण सुविधाओं की कमी की आलोचना कर रहे हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड द्वारा उनके धान के खेत में मुलाकात करने पर वेदपालयम गांव के वीजी मणि ने कहा, ‘हम प्रति एकड़ 25,000 रुपये से अधिक खर्च करते हैं, और सभी खर्चों के बाद, हमारी मेहनत को भी ध्यान में रखते हुए, हमें प्रति एकड़ केवल 10,000 रुपये का राजस्व मिलता है। बहुत सारे बिचौलिये और अधिकारी हमें लूट रहे हैं।’

हालांकि, तमिलनाडु का लोकतंत्र और मतदान प्रणाली से जुड़ा इतिहास केवल उत्तरमेरूर तक ही सीमित नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार तंजावुर जिले के सेंतलाई और तिरुनेलवेली जिले के मनूर जैसे स्थानों पर भी इसी तरह के शिलालेख मिले हैं। हालांकि एथेंस जैसे विश्व के अन्य हिस्सों में भी लोकतंत्र के प्रमाण मिले हैं, लेकिन यह तमिलनाडु के शिलालेखों जितना विकसित नहीं था।

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First Published - April 20, 2026 | 10:29 PM IST

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