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400 IPO लाइन में! क्या IPO में पैसा लगाना अभी सही है? पैंटोमैथ कैपिटल के चेयरमैन ने बताया

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भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद मजबूत घरेलू नकदी और लंबी IPO कतार से बाजार में उम्मीद

Last Updated- March 23, 2026 | 8:47 AM IST
Mahavir Lunawat, MD of Pantomath Capital

बाजार में भारी उतार-चढ़ाव और सौदों की गतिविधियों में स्पष्ट कमी के बीच पैंटोमैथ कैपिटल के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक महावीर लुणावत का मानना है कि भारत के पूंजी बाजार चक्रीय मंदी के बजाय संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहे हैं। घरेलू स्तर पर नकदी रिकॉर्ड स्तर पर है और सार्वजनिक पेशकशों (आईपीओ) की मजबूत कतार मौजूद है। मुंबई में समी मोडक को दिए साक्षात्कार में लुणावत ने कहा कि मौजूदा चरण दीर्घकालिक पूंजी निर्माण में बाधा डाले बगैर मूल्यांकन को फिर से तय कर सकता है। मुख्य अंश:

मौजूदा उतार-चढ़ाव घरेलू इक्विटी पूंजी बाजारों को किस तरह प्रभावित कर रहा है?

उतार-चढ़ाव में यह बढ़ोतरी चिंता का विषय है, लेकिन दो-तीन मूलभूत कारक भारतीय बाजार को केवल चक्रीय होने के बजाय संरचनात्मक रूप से लचीला बनाते हैं। पहला है, भारत का आबादी लाभ – एक बड़ी, युवा आबादी और विशाल घरेलू बाजार। दूसरा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, विमानन, रेयर अर्थ और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे नई पीढ़ी के उद्योगों में मजबूत बढोतरी। साथ ही, इंजीनियरिंग और विनिर्माण जैसे पारंपरिक सेक्टर भी लगातार स्थिर रूप से बढ़ रहे हैं क्योंकि भारत बड़ा घरेलू बाजार होने के साथ-साथ विश्वसनीय वैश्विक साझेदार भी है। ये सभी मिलकर मजबूत मांग और सुदृढ़ उपभोग का परिदृश्य बनाते हैं।

आज एक और अहम अंतर यह है कि लगभग 6-8 लाख करोड़ डॉलर की धनराशि अभी भी इक्विटी में नहीं लगी हुई है। बचत को औपचारिक रूप देने और पूंजी बाजारों में निवेश करने से नकदी का बड़ा भंडार तैयार हो गया है। पहले, बाजार के चक्र विदेशी निवेश पर बहुत अधिक निर्भर थे। आज, मजबूत घरेलू नकदी ने चक्रों को छोटा कर दिया है। कई वर्षों तक चलनी वाली तेजी या मंदी के दौर के बजाय अब हम एक वर्ष के भीतर कई चक्र देखते हैं। एक बार उतार-चढ़ाव कम हो जाने पर उपलब्ध नकदी निजी और सार्वजनिक दोनों बाजारों में पूंजी निर्माण में तीव्र उछाल ला सकती है।

लेकिन बाज़ार में गिरावट के साथ आईपीओ के मूल्यांकन में भी बदलाव की जरूरत है। क्या इश्यू लाने वाले अपनी उम्मीदों को फिर से समायोजित करने के लिए तैयार हैं?

मूल्यांकन बाज़ार की स्थितियों के अनुरूप होते हैं। अगर कोई सेक्टक सेकंडरी बाजार में एक निश्चित मल्टीपल पर कारोबार करता है, तो आईपीओ मूल्य में बहुत अधिक बदलाव नहीं हो सकता। इस समय 230 से अधिक आईपीओ दस्तावेज मंजूरी के विभिन्न चरणों में हैं। अगले छह से आठ महीनों में लगभग 150 और आईपीओ आवेदन हो सकते हैं यानी लगभग 400 कंपनियां इस प्रक्रिया में होंगी। जैसे-जैसे बाजार स्थिर होंगे, जारीकर्ता मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मूल्यांकन में बदलाव करेंगे। जब नकदी उपलब्ध होती है और कंपनियों के पास वृद्धि योजनाएं होती हैं तो मांग-आपूर्ति के समीकरण के हिसाब से मूल्य निर्धारण स्वाभाविक रूप से होता है।

क्या दाखिल किए गए सभी आईपीओ अंततः बाजार में आते हैं?

ऐतिहासिक रूप से तो नहीं। पिछले पांच वर्षों में लगभग एक चौथाई आईपीओ लिस्टिंग में तब्दील नहीं हुए। इसके कई कारण हैं। बाजार चक्र छोटे होते जा रहे हैं। कई बार, जारीकर्ता और निवेशकों के बीच मूल्यांकन में अंतर होता है। दूसरे मामलों में प्रक्रिया के दौरान उस सेक्टर का समीकरण बदल जाता है, जो शुरुआत में आकर्षक लगता है लेकिन वह आईपीओ के लॉन्च होने तक शायद उतना आकर्षक नहीं रह जाता। हमने नवीकरणीय ऊर्जा और रसायन जैसे क्षेत्रों में यह देखा है, जहां महामारी के बाद निवेशकों का उत्साह कम हो गया है। जैसे-जैसे चक्र छोटे होते जाते हैं, निवेशकों की रुचि तेजी से बदल सकती है।

तो आप मानते हैं कि मौजूदा उतार-चढ़ाव व्यापक बाजार की रफ्तार में बाधा नहीं डालेंगे?

जी हां। संरचनात्मक कारक अभी भी बरकरार हैं। उतार-चढ़ाव अस्थायी रूप से रफ्तार को धीमा कर सकता है, लेकिन यह मध्यम से दीर्घकालिक दिशा को बाधित नहीं करेगी। सोने, चांदी, रियल एस्टेट और कमोडिटीज सहित सभी परिसंपत्ति वर्गों में अनिश्चितता दिखाई दे रही है। कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होने और भू-राजनीतिक तनाव कम होने पर निवेशक वापस लौटेंगे। भारत अपेक्षाकृत स्थिर अर्थव्यवस्था है और वैश्विक अनिश्चितता के कारण अधिक पूंजी भारत जैसे बाजारों की ओर आकर्षित हो सकती है।

हालिया उतार-चढ़ाव के कारण क्या आपको खुदरा या घरेलू निवेश में कमी दिख रही है?

अभी तक तो निवेश स्थिर बना हुआ है। निवेशक यह समझते हैं कि अनिश्चितता केवल इक्विटी तक ही सीमित नहीं है बल्कि सभी परिसंपत्ति वर्गों में है। नियामक और उद्योग की पहलों के कारण वित्तीय जागरूकता में भी सुधार हुआ है। आज भी भारत में म्युचुअल फंड की पहुंच केवल 5 से 7 फीसदी है जबकि विकसित बाजारों में यह 60 से 65 फीसदी है। भले ही कुछ निवेशक निवेश रोक दें, नए निवेशक इस नकारात्मक प्रभाव को संतुलित कर सकते हैं। हमें घरेलू धन के प्रवाह में कोई प्रणालीगत जोखिम नहीं दिखता।

क्या इस साल फोनपे, जेप्टो या फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों के अरबों डॉलर के आईपीओ देखने को मिलेंगे?

इस साल हमें बड़े आईपीओ मिल सकते हैं। उतार-चढ़ाव भरे दौर में निवेशक स्थापित, बड़े कारोबार वाली कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं, जो अधिक भरोसा और स्थिरता प्रदान करती हैं। भारत में उद्यमशीलता के आधार को देखते हुए मध्यम आकार के आईपीओ की संख्या अधिक रहेगी। लेकिन मूल्य के लिहाज से इस साल बड़े आईपीओ का योगदान ज्यादा हो सकता है।

हाल ही में सूचीबद्ध आईपीओ का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। क्या लिस्टिंग के बाद कमजोर प्रदर्शन खुदरा निवेशकों के विश्वास पर असर डाल सकता है?

खुदरा निवेशकों की भागीदारी कम रही है। हालांकि, पिछले दो वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग 55 फीसदी आईपीओ लिस्टिंग के बाद प्रीमियम पर कारोबार करते रहे। इसकी तुलना में, इसी अवधि के दौरान सेकंडरी बाजार में 80 फीसदी से अधिक शेयरों का कारोबार उनके पिछले 12 महीनों के औसत से नीचे रहा।

आईपीओ से प्राप्त धनराशि का उपयोग विस्तार या वर्किंग कैपिटल के लिए किया जाता है। कंपनियों को पूंजी का उपयोग करने और वित्तीय स्थिति में वृद्धि दिखाने में आमतौर पर चार से पांच तिमाही या उससे अधिक समय लगता है। आईपीओ का मूल्यांकन केवल लिस्टिंग लाभ के आधार पर करना उचित नहीं है। जैसे-जैसे बाजार परिपक्व होते हैं, लिस्टिंग के बाद होने वाले लाभ में कमी की संभावना होती है और आईपीओ अधिक स्थिर दायरे में कारोबार कर सकते हैं।

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First Published - March 23, 2026 | 8:47 AM IST

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