साल 1905 में वर्धा के एक व्यापारी बछराज बजाज ने महाराष्ट्र में एक सूत कताई का कारखाना लगाया था। यह मामूली शुरुआत थी मगर अगली सदी में जो कुछ हुआ, वह भारतीय व्यापार की सबसे यादगार कहानियों में से एक बन गया। इस दौरान यह पारिवारिक उद्यम 14 लाख करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण वाले विशाल समूह में तब्दील हो गया लेकिन उसने इस विचार को कभी नहीं छोड़ा कि व्यापार का उद्देश्य हमेशा कुछ बड़ा होना चाहिए।
जिस समूह की नींव बछराज ने रखी थी और जिसे बाद में जमनालाल बजाज ने आकार और पहचान दी, वह इस साल 100 साल का हो गया है। आज इस समूह का कारोबार वाहन, ऋण, बीमा, इलेक्ट्रिकल और स्टील जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है।
जमनलाल बजाज सिर्फ एक उद्योगपति नहीं थे। गांधी उन्हें अपना पांचवां पुत्र मानते थे और लगभग दो दशक तक वर्धा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र में से एक बना रहा। 1931 से लेकर आजादी तक, गांधी वर्धा में अपने पारिवारिक घर ‘बजाजवाड़ी’ में रहे। भारत छोड़ो आंदोलन का पहला मसौदा वहीं लिखा गया था।
जमनालाल ने राष्ट्रीय आंदोलन के एक बड़े हिस्से को आर्थिक सहायता दी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के रूप में कार्य किया और खादी तथा ग्रामीण उत्थान से लेकर छुआछूत उन्मूलन तक विभिन्न कार्यों में सहयोग किया। उनकी पत्नी, जानकीदेवी बजाज जिन्हें बाद में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था, विनोबा भावे के साथ पदयात्राएं कीं और ग्रामीण समुदायों के बीच काफी काम किया। उन्होंने एक ऐसे परिवार का पालन-पोषण किया जिसने विरासत में व्यवसाय ही नहीं बल्कि नैतिक ढांचा भी पाया।
जिस विचार ने इस परिवार को आकार दिया वह था ‘न्यास’। गांधीजी का मानना था कि धन पर किसी का पूर्ण स्वामित्व नहीं होना चाहिए बल्कि वह समाज की भलाई के लिए एक न्यास के रूप में रखा जाना चाहिए। यह विचार आज भी बजाज परिवार के धन और जिम्मेदारी के नजरिये के केंद्र में है।
नीरज बजाज ने अपने दादा जमनलाल बजाज द्वारा व्यवसाय और स्वामित्व के नजरिये के बारे में कहा कि वह यह नहीं मानते थे कि पैसा मेरा है बल्कि उनका मानना था यह लोगों के लिए है। मैं एक न्यासी हूं मालिक नहीं। यह दर्शन समूह के व्यापार निर्णयों में भी दिखा। लाइसेंस राज के दौरान जब बजाज स्कूटर के लिए खरीदारों को एक दशक तक का इंतजार करना पड़ता था तब भी कंपनी ने भारी मांग के बावजूद कीमतों में तेज वृद्धि से परहेज किया। एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग ने भी कहा था कि एकाधिकार की स्थिति में रहने के बावजूद बजाज ने कोई फायदा नहीं उठाया।
साल 1942 में जमनलाल की मृत्यु के बाद, उनके बड़े बेटे कमल नयन बजाज ने नव स्वतंत्र भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में समूह का नेतृत्व किया। उन्होंने वाहन, इलेक्ट्रिकल, स्टील और पर्यटन के क्षेत्र में कारोबार का विस्तार किया। छोटे बेटे रामकृष्ण बजाज संस्था-निर्माण और नैतिक व्यावसायिक प्रथाओं से निकटता से जुड़े, जिसमें उचित व्यापार व्यवहार परिषद और एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना में मदद करना शामिल था।
विस्तार का अगला चरण राहुल बजाज के नेतृत्व में हुआ। उन्होंने बजाज ऑटो को भारत के सबसे लोकप्रिय औद्योगिक ब्रांडों में से एक बना दिया और भारत के कारोबारी जगत में सबसे मुखर उद्योगपतियों में से एक के रूप में उभरे।
आज बजाज ऑटो का बाजार पूंजीकरण 3 लाख करोड़ रुपये के करीब है और यह दुनिया की सबसे मूल्यवान दोपहिया और तिपहिया कंपनी है। बजाज ऑटो 108 देशों में अपने उत्पादों का निर्यात करती है। अफ्रीका सहित उभरते बाजारों में इसकी मजबूत उपस्थिति है। बजाज ऑटो के पल्सर ब्रांड ने भारत के स्पोर्ट्स मोटरसाइकिल सेगमेंट को फिर से परिभाषित करने में मदद की जबकि चेतक को इलेक्ट्रिक स्कूटर के रूप में पुनर्जीवित कर देश के सबसे प्रसिद्ध ब्रांडों में से एक में ईवी का दौर शुरू किया। कंपनी अब अपने अगले बड़े परिवर्तन की तैयारी कर रही है, जो है इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल।
एलएलएम लिक्विडिटी संकट के दौरान केटीएम का समर्थन करने और शेयरधारकों को उदार भुगतान बनाए रखने के बाद भी बजाज ऑटो 18,000 करोड़ रुपये से अधिक का अधिशेष नकदी बनाए रखा था। विनिर्माण के साथ-साथ, समूह ने चुपचाप भारत के सबसे बड़े वित्तीय सेवा इकाई में से एक बजाज फाइनैंस का निर्माण किया है।
बजाज फाइनैंस का बाजार पूंजीकरण लगभग 6 लाख करोड़ रुपये है। इसकी मूल कंपनी बजाज फिनसर्व का बाजार पूंजीकरण लगभग 3 लाख करोड़ रुपये है। इसने ऋण, बीमा और धन प्रबंधन में समूह की उपस्थिति का विस्तार किया है।
बजाज फिनसर्व के चेयरमैन संजीव बजाज ने कहा, ‘उन्हें कर्ज लेने वालों को औपचारिक प्रणाली में लाने से उनका क्रेडिट स्कोर विकसित होता है।’ ऋण, बीमा और धन प्रबंधन के माध्यम से समूह की पहुंच देश भर के कई परिवारों तक है।
हालांकि ये दोनों ही व्यवसाय बजाज समूह की सफलता के मूल में हैं लेकिन एक ऐसा व्यवसाय भी है जो इन दोनों से भी पहले का है वह है बजाज इलेक्ट्रिकल्स। इसे शुरुआती दौर में ‘रेडियो लैंप वर्क्स’ के नाम से जाना जाता था। 1938 में कमलनयन बजाज द्वारा शुरू किया गया यह व्यवसाय, भले ही शुरुआत में इटली में बने रेडियो लैंप बनाने से शुरू हुआ था लेकिन अब यह कई श्रेणियों और उत्पादों वाली एक विशाल इलेक्ट्रिकल उत्पाद कंपनी के रूप में विकसित हो चुकी है।
हाल के वर्षों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा, कीमतों में गिरावट और लागत में बढ़ोतरी के कारण कंपनी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। मगर कंपनी अपने वितरण को सुव्यवस्थित करने, नए उत्पाद पेश करने ‘नेक्स’ ब्रांड के साथ अपने पोर्टफोलियो को प्रीमियम बनाने और तार एवं केबल जैसे नए क्षेत्रों में विस्तार करने के लिए कदम उठा रही है। एक नई प्रबंधन टीम और एक नई रणनीति के साथ बजाज इलेक्ट्रिकल्स के चेयरमैन शेखर बजाज को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 इस 88 साल पुरानी कंपनी के लिए एक नई शुरुआत साबित होगा।
कुछ ही भारतीय व्यावसायिक परिवारों ने पीढ़ियों तक इतना सामंजस्य बनाए रखा है। बजाज परिवार की तीसरी और चौथी पीढ़ी के सदस्यों वाली पांच-सदस्यीय पारिवारिक परिषद नियमित रूप से व्यवसाय, उत्तराधिकार और स्वामित्व के मामलों पर चर्चा करने के लिए मिलती है। 2018 में अंतिम रूप दिए गए पारिवारिक समझौता ने बाहरी मध्यस्थता की आवश्यकता के बिना स्वामित्व संरचनाओं, न्यासों और पीढ़ीगत बदलाव के जटिल मुद्दों को हल किया।
समूह में परिवार का संयुक्त स्वामित्व है लेकिन परिचालन नेतृत्व वंशानुक्रम के बजाय योग्यता पर आधारित है। नीरज बजाज कहते हैं, ‘आप सिर्फ अपने उपनाम के कारण बॉस नहीं हो सकते। आपको उस पद को अर्जित करना होगा।’
चौथी पीढ़ी में राजीव बजाज के बेटे ऋषभ, संजीव के बच्चे (संजली और सिद्धांत) हैं जो पहले से ही कारोबार की बारीकियां सीख रहे हैं और बोर्डरूम में जाने के बजाय जमीन से जुड़कर काम कर रहे हैं। नीरज ने कहा, ‘कोई भी सीधे बॉस नहीं बनता। उन्हें नीचे से काम करना पड़ता है।’
जैसे-जैसे समूह अपनी दूसरी शताब्दी में प्रवेश कर रहा है, उसका सबसे नया और सबसे महत्त्वाकांक्षी विस्तार स्वास्थ्य सेवा में हो सकता है।
नीरव बजाज के नेतृत्व वाली बजाज इंटीग्रेटेड हेल्थ सिस्टम्स (बीआईएचएस) इस साल के अंत में विभिन्न शहरों में विस्तार के साथ पूर्ण देखभाल-स्वास्थ्य सेवा मॉडल बनाने के लिए 2,000 करोड़ से 2,500 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रही है। इस मॉडल का उद्देश्य पारंपरिक अस्पताल श्रृंखलाओं की तुलना में अस्पतालों, निदान, बीमा और रोगी देखभाल को से एकीकृत करना है। यह कदम समूह के भीतर चल रहे एक व्यापक बदलाव को दर्शाता है।
एक शताब्दी बाद वर्धा अभी भी समूह के नैतिक बल के रूप में कार्य कर रहा है। व्यवसाय बदल गए हैं, पैमाना बदल गया है और इसके आसपास की अर्थव्यवस्था बदल गई है मगर जो बात पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रही है, वह यह विश्वास है कि ‘धन अपने आप में कोई साध्य नहीं, बल्कि एक साधन है।’जमनलाल बजाज ने इसे न्यास कहा। उनके उत्तराधिकारी इसे सहज ज्ञान कहते हैं।