एंडिया पार्टनर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र अब वैश्विक स्तर पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश की जैव-अर्थव्यवस्था (बायोइकॉनमी) वर्ष 2014 में 10 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2026 में 195 अरब डॉलर हो गई है और वर्ष 2033 तक इसके लगभग 300 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
‘इंडिया बायोफार्मा मोमेंट: पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम डेमो बायोटेक’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। वर्ष 2030 तक दुनिया भर में करीब 300 अरब डॉलर के पेटेंट समाप्त होने वाले हैं और दवाओं के विकास की बढ़ती लागत के कारण इस क्षेत्र में बड़े बदलाव हो रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर अनुसंधान और विकास (आरऐंडडी) की लागत प्रति दवा लगभग 2.2 अरब डॉलर तक पहुंच गई है, जबकि एक दवा को बनाने में करीब 100 महीने लगते हैं। ऐसे में भारत एक सस्ता और प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में परीक्षण के लिए मरीजों को शामिल करने की प्रक्रिया 10 गुना तक तेज है। इससे प्रति डॉलर की खर्च के साथ ही 3 से 4 गुना अधिक दवाओं के विकास के प्रयास किए जा सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब केवल जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादक नहीं है बल्कि तेजी से जैव-औषधि नवाचार का एक मजबूत और किफायती केंद्र बन रहा है। वर्तमान में भारत दुनिया की लगभग 20 फीसदी जेनेरिक दवाएं और 60 फीसदी से अधिक टीके की आपूर्ति करता है।
सरकार की नीतियां भी इस बदलाव को मजबूती दे रही हैं। सरकारी पहल जैसे कि 10,000 करोड़ रुपये की बायोफार्मा शक्ति योजना और 1 लाख करोड़ रुपये का अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष इस दिशा में बड़े कदम माने जा रहे हैं। मार्च 2026 में नए दवा और नैदानिक परीक्षण नियमों में किए गए बदलाव जैसे 45 दिन में मंजूरी और पहले से सूचना देने की व्यवस्था से दवाओं को तैयार करने में लगने वाला समय 90 से 120 दिन तक कम होने की उम्मीद है।