Chemical Sector: भारत का केमिकल सेक्टर इस समय काफी अस्थिर दौर से गुजर रहा है। इस सेक्टर की बड़ी कमजोरी यह है कि यह काफी हद तक तेल और गैस से जुड़े कच्चे माल पर निर्भर है। ऐसे में जैसे ही सप्लाई में कोई रुकावट आती है, उसका सीधा असर कीमतों पर दिखता है। अभी भी यही हो रहा है। मिडिल ईस्ट में तनाव और सप्लाई में दिक्कत के कारण कई केमिकल्स की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कई कंपनियों को उत्पादन कम करना पड़ सकता है या फिर मजबूरी में सप्लाई रोकनी पड़ सकती है, जिसे इंडस्ट्री की भाषा में फोर्स मेज्योर कहा जाता है। यानी कंपनियां अपने कॉन्ट्रैक्ट पूरे करने में भी दिक्कत महसूस कर सकती हैं।
नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, कीमतों में बढ़ोतरी एक के बाद एक कई केमिकल्स में फैलती जा रही है। शुरुआत सोडा ऐश और कॉस्टिक सोडा से हुई, जहां लॉजिस्टिक्स की वजह से दिक्कत आई। इसके बाद यह असर मेथनॉल, पीवीसी, नाइट्रिक एसिड, अमोनिया और सल्फर जैसे केमिकल्स तक पहुंचा, जो सीधे तेल और गैस से जुड़े हैं।
अब स्थिति और गंभीर हो गई है। फिनोल, एसीटोन, एसीटिक एसिड और खासकर टीडीआई जैसे केमिकल्स में सप्लाई की भारी कमी है। कई इंटरमीडिएट केमिकल्स जैसे एच-एसिड, विनाइल सल्फोन और फ्थैलिक एनहाइड्राइड की उपलब्धता बहुत कम हो गई है। इनकी कीमतें इतनी तेजी से बदल रही हैं कि कंपनियों के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है कि बाजार कहां स्थिर होगा।
अभी के समय में कुछ कंपनियों को फायदा भी मिल रहा है, क्योंकि उनके पास पुराना सस्ता स्टॉक मौजूद है। वे इस स्टॉक को ऊंची कीमत पर बेचकर ज्यादा मुनाफा कमा सकती हैं। लेकिन यह फायदा ज्यादा समय तक नहीं रहेगा।
जैसे ही कंपनियों को महंगे कच्चे माल से उत्पादन करना पड़ेगा, उनके मार्जिन पर दबाव आने लगेगा। अगर वे अपने प्रोडक्ट की कीमतें उतनी तेजी से नहीं बढ़ा पातीं, तो मुनाफा घट सकता है। इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ी नजर इस बात पर रहेगी कि कंपनियां अपनी कीमतें कितनी बढ़ा पाती हैं।
इस पूरे संकट का सबसे ज्यादा असर उर्वरक कंपनियों पर पड़ रहा है। भारत अमोनिया और सल्फर के लिए काफी हद तक मिडिल ईस्ट पर निर्भर है। इन दोनों कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और सप्लाई भी प्रभावित हुई है।
फिलहाल बाजार में खाद का स्टॉक ठीक-ठाक है, लेकिन अगर कच्चे माल की कमी बनी रहती है, तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है। सरकार सब्सिडी बढ़ाकर कुछ राहत जरूर दे सकती है, लेकिन इससे असली समस्या यानी कच्चे माल की उपलब्धता पूरी तरह हल नहीं होगी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सभी केमिकल्स पर एक जैसा असर नहीं है। कुछ सेगमेंट ऐसे हैं जो इस संकट से काफी हद तक सुरक्षित हैं। जैसे कॉस्टिक सोडा, सोडा ऐश और ब्रोमीन।
इनका उत्पादन सीधे तेल या गैस पर निर्भर नहीं है। कॉस्टिक सोडा बिजली से बनता है, जबकि सोडा ऐश प्राकृतिक या सिंथेटिक तरीके से बनता है और ब्रोमीन समुद्र के पानी से निकाला जाता है। इसलिए इन पर कच्चे माल की कमी का असर कम है, हालांकि इनमें भी ऊर्जा लागत का असर जरूर पड़ता है।
आने वाले समय में इस सेक्टर की दिशा कई चीजों पर निर्भर करेगी। सबसे अहम है कच्चे माल की उपलब्धता और उसकी कीमतें। अगर सप्लाई सुधरती है, तो कीमतें धीरे-धीरे सामान्य हो सकती हैं। लेकिन अगर संकट बना रहता है, तो कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
इसके अलावा कंपनियों की कीमत बढ़ाने की क्षमता और मांग की स्थिति भी अहम होगी। अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डाल पाती हैं, तो उनका मुनाफा बच सकता है, वरना दबाव बढ़ेगा।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)