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भारतीय कंपनियां अब विदेशों में खरीद रहीं बड़ी कंपनियां, Sun Pharma की डील बनी सबसे बड़ा संकेत

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दुनिया में आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट के बावजूद भारत में 200 अरब डॉलर के सौदों की रफ्तार कायम

Last Updated- May 11, 2026 | 8:26 AM IST
mergers and acquisitions

भू-राजनीतिक परिदृश्य में असामान्य उथल-पुथल के बावजूद भारत का विलय और अधिग्रहण बाजार अपनी पकड़ कायम रखे हुए है। सौदों की गतिविधियां करीब 200 अरब डॉलर की सालाना रफ्तार से बरकरार रहने की उम्मीद है। यह देश में और विदेशी कंपनियों के साथ किए वाले सौदों के बीच मोटे तौर पर समान रूप से बंटी होगी। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के वैश्विक सह-प्रमुख (विलय और अधिग्रहण परामर्श) राजेश सिंघी ने यह जानकारी दी है।

सिंघी ने कहा कि वैश्विक विलय और अधिग्रहण का परिदृश्य ‘दो हिस्सों की कहानी’की तरह है। अमेरिका और यूरोप में बड़े सौदे और घरेलू एकीकरण का दबदबा है। यहां रणनीतिक भागीदार धीरे-धीरे उन वित्तीय प्रायोजकों की जगह ले रहे हैं, जो हाल के वर्षों में प्रमुख ताकत थे। भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया में ऊर्जा बदलाव और बुनियादी ढांचा मुख्य शक्ति के रूप में उभर रहे हैं।

सिंघी के बताए सबसे उल्लेखनीय बदलावों में से एक था विदेश में भारतीय कंपनियों की ओर से किए जाने वाले अधिग्रहणों में तेजी। हाल में घोषित सन फार्मा के विदेशी अधिग्रहण को किसी भी भारतीय कंपनी के अब तक के सबसे बड़े अधिग्रहणों में से एक बताया जा रहा है और इसे इस नई रुचि का प्रमुख संकेत माना जा रहा है।

सिंघी के अनुसार इसे तीन कारक बढ़ावा दे रहे हैं। तेजी से विकसित हो रहे विनिर्माण और औद्योगिक परिदृश्य में प्रौद्योगिकी तक पहुंच, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन, जिसमें देश और विदेश में आंतरिक गतिविधियां अब चक्रीय के बजाय संरचनात्मक रुझान बन गई हैं। यह तथ्य कि कुछ भारतीय कंपनियां घरेलू विकास में नरमी का सामना करते हुए ऐतिहासिक विस्तार की अपनी रफ्तार बनाए रखने के लिए भारत से बाहर की ओर रुख कर रही हैं। इसके लिए उनके पास ऐसी बैलेंस शीट है, जो ‘शायद अब तक के सर्वश्रेष्ठ स्तर’ पर है। सक्रिय विदेशी सौदों में रुचि वाले क्षेत्रों में दवा, स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण सेवाएं (ईएमएस) और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) शामिल हैं।

देश के भीतर वित्तीय सेवाएं खासी विदेशी रणनीतिक रुचि को लगातार आकर्षित कर रही हैं। सिंघी ने एमिरेट्स एनबीडी-आरबीएल बैंक सौदे को रणनीतिक कदम बताया, जो आम तौर पर सॉवरिन वेल्थ फंडों के पोर्टफोलियो निवेश से अलग है। पश्चिम एशियाई निवेशकों के लिए भारत अक्सर अमेरिका और यूरोप के बाहर सबसे सक्रिय बाजार के रूप में शुमार होता है। वे भारत में लगातार बड़े निवेशक रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘अगर आप किसी देश में निवेश पर विचार कर रहे हैं, तो वित्तीय सेवाएं शायद ऐसा सबसे अच्छा विकल्प हैं, जिससे आप जीडीपी वृद्धि हासिल कर सकते हैं।’

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First Published - May 11, 2026 | 8:26 AM IST

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