वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल के बीच सरकार देश के दवा एवं चिकित्सा उपकरण उद्योग को ताकत देने की योजना पर तेजी से कदम बढ़ा रही है। औषधि (फार्मा) विभाग के सचिव मनोज जोशी ने मूल्य से जुड़ी चिंता, नई समर्थन योजनाओं, बायोफार्मा विनिर्माण, नवाचार के लिए जरूरी रकम और नियामकीय प्राथमिकताएं आदि से जुड़े विषयों पर सरकार के कदमों का विस्तार से जिक्र किया। बिज़नेस स्टैंडर्ड के संकेत कौल ने उनसे बात की। पेश हैं साक्षात्कार के मुख्य अंश :
भारत के दवा क्षेत्र की सेहत बिल्कुल ठीक है। उत्पादन और भंडार पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। उद्योग को शुरुआती दौर में आपूर्ति संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ा, खासकर एपीआई की आपूर्ति के मोर्चे पर मगर सरकार इन समस्याओं का समाधान करने और आपूर्ति बहाल करने में सक्षम रही। आइसोप्रोपिल अल्कोहल तैयार करने के लिए जरूरी मेथनॉल, अमोनिया और प्रोपलीन जैसे प्रमुख विलायकों की आपूर्ति भी सामान्य हो गई है। कच्चा तेल और पेट्रो-रसायन के दाम में बढ़ोतरी से दवा तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर खर्च बढ़ गया है।
फिलहाल ऐसे किसी बड़े कदम पर विचार नहीं किया जा रहा है। हालांकि, सरकार कुछ ऐसे मामलों से जरूर वाकिफ है जिनमें पिछले कुछ वर्षों में कीमतों में असामान्य वृद्धि देखी गई है।
हम एपीआई की खोज एवं उनके विकास के लिए नई व्यापक समर्थन योजना पर काम कर रहे हैं। इस योजना के तहत उद्योग को कारखाने स्थापित करने के लिए अधिक समय दिया जाएगा। उत्पाद अनुसंधान एवं विकास के लिए सरकारी सहायता अधिक लचीली बनाई जाएगी।
इस मिशन के लिए अगले पांच वर्षों में इस्तेमाल हेतु 10,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। भारत में अब मधुमेह, कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसी गैर-संक्रामक बीमारियां बढ़ रही हैं। भारत पहले से ही जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में अग्रणी है और इस मिशन के साथ यह वैश्विक बायोफार्मा विनिर्माण केंद्र बन सकता है।
हमने सरकारी निकायों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, स्टार्टअप इकाइयों और सीआरडीएमओ उद्योग सहित सभी हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा की है। व्यय वित्त समिति (ईएफसी) और मंत्रिमंडल सहित सभी आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद योजना लागू की जाएगी। इस योजना प्रस्ताव में तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान का निर्माण और सात मौजूदा संस्थानों का उन्नयन भी शामिल है।
योजना के घटक ‘बी’ के तहत, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और स्टार्टअप इकाइयां 9 करोड़ रुपये तक की लागत वाली परियोजनाओं के लिए 5 करोड़ रुपये मूल्य की सहायता प्राप्त कर सकती हैं। 285 करोड़ रुपये तक की लागत वाली परियोजनाओं के लिए अधिकतम 100 करोड़ रुपये की सहायता दी जाती है। पीआरआईपी योजना का व्यापक दायरा है और इसमें उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।
पहले चरण में योजना को विभिन्न उप-श्रेणियों में 710 प्रस्ताव प्राप्त हुए। हम चरणों में आवेदनों का मूल्यांकन कर रहे हैं। आवेदनों की बहु-स्तरीय समीक्षा की जा रही है जिसमें वैज्ञानिक , नियामक, वाणिज्यिक और लागत संबंधी आकलन शामिल हैं, साथ ही कई स्तरों पर विशेषज्ञ जांच भी की जा रही है।
अब तक 22 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है और लगभग 720 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता स्वीकृत की जा चुकी है। हमारा लक्ष्य अगले दो महीनों में पहले चरण की मूल्यांकन प्रक्रिया पूरा करनी है। जल्द शुरू होने वाले अगले चरण के लिए हम एक अलग समीक्षा ढांचा तैयार करने पर काम कर रहे हैं जिसमें प्रक्रियाओं को परियोजनाओं के पैमाने और परिपक्वता के अनुरूप ढाला जाएगा।