भारत की फैक्ट्रियों में एक बड़ी खामोश क्रांति शुरू हो चुकी है। यह बदलाव सिर्फ मशीनों का नहीं, सोच का है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सरकार की नीतियां मिलकर मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया को बदल रही हैं। लक्ष्य साफ है, भारत को सिर्फ असेंबली वाला देश नहीं बल्कि दुनिया के लिए हाई वैल्यू प्रोडक्ट बनाने वाला केंद्र बनाना।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने साफ कहा है कि PLI योजना का फायदा तभी मिलेगा जब कंपनियां देश में ज्यादा उत्पादन करें। मोबाइल में लोकल हिस्सेदारी को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 से 40 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स में 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक ले जाना लक्ष्य है।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञ मानते हैं कि अब भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति बदल रही है। डेकी इलेक्ट्रॉनिक्स के MD और CII की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कमेटी के चेयरमैन विनोद शर्मा कहते हैं कि भारत अब लो वैल्यू असेंबली से हाई वैल्यू प्रिसीजन इंजीनियरिंग की ओर बढ़ रहा है। उनके अनुसार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कंपनियों को ऑटोमेशन, प्रोसेस कंट्रोल और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम में निवेश करना ही होगा।
कैशिफाई के सह संस्थापक नकुल कुमार बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में बहुत छोटे पार्ट्स होते हैं, जहां मामूली गलती भी बड़ा नुकसान कर सकती है। उनके मुताबिक अब कंप्यूटर विजन सिस्टम सेकंडों में बाल जैसी दरार, गलत फिटिंग या सोल्डरिंग की गलती पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं कि AI यह भी बता देता है कि मशीन कब खराब होने वाली है, जिससे समय रहते सुधार हो सकता है।
गोबोल्ट के सह संस्थापक वरुण गुप्ता मानते हैं कि AI मैन्युफैक्चरिंग की पूरी सोच बदल रहा है। उनके अनुसार अब फोकस मजदूरी लागत से हटकर मशीन इंटेलिजेंस पर आ गया है। वे कहते हैं कि भविष्य में वही कंपनियां आगे रहेंगी जो पूरे वैल्यू चेन में AI को शामिल करेंगी।
परसेप्टाइन रोबोट्स के सीईओ रवितेजा चिवुकुला के अनुसार भविष्य की फैक्ट्रियां पूरी तरह कनेक्टेड और इंटेलिजेंट होंगी, जहां रोबोटिक्स, IoT और AI एक साथ रियल टाइम में काम करेंगे। वे इसे फिजिकल इंटेलिजेंस बताते हैं, जहां मशीनें खुद समझकर और हालात के अनुसार फैसला लेकर काम करती हैं।
इंडस्ट्री के अनुसार भारत में पूरी तरह ऑटोमेटेड फैक्ट्री फिलहाल महंगी साबित हो सकती है। सिरमा SGS के MD जेएस गुर्जाल कहते हैं कि इंसानी आंख कुछ समय बाद थक जाती है और गलती पकड़ना मुश्किल हो जाता है, जबकि AI सिस्टम लगातार और ज्यादा सटीक काम कर सकते हैं। इसलिए अभी भारत में हाइब्रिड मॉडल ज्यादा व्यावहारिक रहेगा, जहां इंसान और मशीन दोनों मिलकर काम करेंगे।
ऑप्टीमस इन्फ्राकॉम के डायरेक्टर अशोक गुप्ता बताते हैं कि भारत ने असेंबली से आगे बढ़कर कुछ हद तक लोकल वैल्यू एडिशन शुरू किया है, लेकिन अभी भी 70 से 75 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स विदेश से आते हैं। उनके अनुसार PCB निर्माण, इन हाउस टेस्टिंग और सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन जैसे क्षेत्रों में प्रगति हो रही है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
स्पेशल इन्वेस्ट के फाउंडिंग पार्टनर विशेश राजाराम का मानना है कि भारत के पास इंजीनियरिंग क्षमता और मांग दोनों हैं, जिससे वह फिजिकल AI में सिर्फ यूजर नहीं बल्कि निर्माता भी बन सकता है। वे कहते हैं कि स्टार्टअप अब इस दिशा में नई तकनीक विकसित कर रहे हैं और इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार AI लागू करना आसान नहीं है। इसके लिए भारी निवेश, सिस्टम अपग्रेड और कर्मचारियों को नई स्किल सिखाने की जरूरत है। अब काम करने वाले लोगों को मशीन चलाने के साथ साथ डेटा समझना और विश्लेषण करना भी सीखना होगा।
आने वाले समय में फैक्ट्रियां स्मार्ट, कनेक्टेड और ऑटोमेटेड होंगी। रोबोट दोहराने वाले काम करेंगे और इंसान निगरानी, विश्लेषण और फैसले लेने का काम करेंगे। जैसा कि रवितेजा चिवुकुला कहते हैं, भविष्य का मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम ऐसा होगा जहां AI, रोबोटिक्स और IoT मिलकर काम करेंगे और इंसान उच्च स्तर के निर्णय लेने पर ध्यान देगा। यानी यह बदलाव नौकरियां खत्म नहीं करेगा, बल्कि उन्हें एक नए रूप में बदल देगा।