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ऑनलाइन शॉपिंग का बड़ा खेल! ‘डार्क पैटर्न’ से हर साल 28,000 करोड़ रुपये गंवा रहे भारतीय ग्राहक

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रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल हो रहे 'डार्क पैटर्न' भारतीय ग्राहकों को हर साल 25,000 से 28,000 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा रहे हैं।

Last Updated- June 10, 2026 | 9:21 AM IST
Indian online buyers lose up to ₹28,000 cr yearly to dark patterns: Report
Representative image

भारत का तेजी से बढ़ता डिजिटल कारोबार (कॉमर्स) तंत्र चकमा देने वाले इंटरफेस डिजाइन के कारण भारी वित्तीय नुकसान से गुजर रहा है। ऐसे चकमा देने वाले तौर-तरीके ‘डार्क पैटर्न’ कहे जाते हैं। डेटम इंटेलिजेंस की ‘डार्क पैटर्न्स इन इंडियाज ऑनलाइन मार्केटप्लेस’ नाम की रिपोर्ट के मुताबिक ‘डार्क पैटर्न’की वजह से भारतीय ग्राहकों को हर साल अनुमानित 25,000 से 28,000 करोड़ रुपये नुकसान हो रहा है। देश में ऑनलाइन माध्यम से खरीदारी करने वाले 30.4 करोड़ लोगों में 88 प्रतिशत को हर महीने अनुमानित 78 से 87 रुपये का नुकसान हो रहा है। सीधे नुकसान के अलावा बेमतलब के शुल्क थोपने वाले ये तरीके ग्राहकों के व्यवहार में भी बड़े बदलाव ला रहे हैं। इससे 55,000 करोड़ रुपये से अधिक के सकल उत्पाद मूल्य (जीएमवी) जोखिम में पड़ गए हैं क्योंकि उपयोगकर्ता खर्च कम कर रहे हैं या अपने लिए बेहद ठोस विकल्प की तलाश कर रहे हैं।

इन खतरों के बावजूद रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऑनलाइन खरीदारी का चलन कम नहीं होने जा रहा। रिपोर्ट से पता चलता है कि अब 63 प्रतिशत ऑनलाइन भुगतान उपभोक्ता डिजिटल लेनदेन के दौरान छिपे हुए चार्ज या ‘ड्रिप प्राइसिंग’का सामना करते हैं। यह वर्ष 2024 में बताए गए 52 प्रतिशत के आंकड़े से काफी अधिक है। नतीजों से पता चलता है कि मौजूदा नियामकीय हस्तक्षेप ऐसे तरीकों को रोकने में अब तक आंशिक रूप से सफल रहे हैं। ये तरीके ई-कॉमर्स, बैंकिंग, ट्रैवल, राइड-हेलिंग, बीमा, ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल उधारी प्लेटफॉर्म पर लाखों ग्राहकों को प्रभावित कर रहे हैं।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे ‘डार्क पैटर्न’ भारत के डिजिटल तंत्र में एक बड़ी समस्या बन गए हैं। मौजूदा सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि 73 प्रतिशत प्लेटफॉर्म ऐसे तरीके अपनाते हैं जिससे उपयोगकर्ता ऐसे काम करने के लिए विवश हो जाते हैं जो वे शायद कभी नहीं करते। 69 प्रतिशत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘ड्रिप प्राइसिंग’ के तरीके अपनाते हैं जिसमें अतिरिक्त फीस का पता चेकआउट के आखिरी चरण में ही चलता है। सर्वेक्षण में शामिल आधे से अधिक प्लेटफॉर्म ‘बेट-ऐंड-स्विच’तरीकों का इस्तेमाल करते पाए गए जिनमें की गई पेशकश असल उत्पाद, कीमत या ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं से काफी अलग होते हैं।

वर्ष 2026 की पहली तिमाही में की गई इस रिपोर्ट में 50 शहरों के 2,590 से ज्यादा ग्राहकों से बात की गई और क्विक कॉमर्स, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन यात्रा क्षेत्र की 12 कंपनियों का आकलन किया गया। इसमें ‘डार्क पैटर्न’से ग्राहकों पर आर्थिक असर और भरोसे में कमी का विश्लेषण किया गया। इसमें सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्लेटफॉर्म के बीच 92 अंक का अंतर सामने आया।

सीधे आर्थिक नुकसान और उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार का मिला-जुला असर यह दिखाता है कि ‘डार्क पैटर्न’ अब केवल उपभोक्ता की सुरक्षा का मामला नहीं रह गया है बल्कि यह भारत के डिजिटल कॉमर्स तंत्र की लंबे समय की स्थिरता पर असर डालने वाली एक बड़ी व्यापक आर्थिक चुनौती बन गए हैं। रिपोर्ट में भारतीय उपभोक्ताओं के बीच जानकारी और असलियत में अंतर की बात भी कही गई है। इसके अनुसार 81 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें डार्क पैटर्न के बारे में पता है, वहीं 85 प्रतिशत ने माना कि वे फिर भी इनके कारण गुमराह हुए। 74 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वे ऐसे प्लेटफॉर्म के लिए अधिक रकम देने को तैयार हैं जो सही और पारदर्शी तरीके अपनाते हैं। साथ ही, उपभोक्ता ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपना खर्च कम करने की भी योजना बना रहे हैं, खासकर ऑनलाइन यात्रा के मामले में जहां खर्च 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

रिपोर्ट में मौजूदा परिभाषाओं और इन्हें लागू करने के नियमों में अस्पष्टता को लेकर चिंता जताई गई है। चकमा देने वाले तरीकों और सही व्यावसायिक तरीके के बीच अंतर साफ नहीं होने से कारोबारी नियमों के पालन और उन्हें लागू करने की उम्मीदों को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।

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First Published - June 10, 2026 | 9:21 AM IST

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