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रत्न-आभूषणों की लौटेगी चमक: अमेरिकी टैरिफ घटने से सुस्ती के बाद निर्यात में उछाल की उम्मीद

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अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में 44.5 प्रतिशत की गिरावट आई तथा तराशे गए हीरों, सोने के जड़ाऊ व सामान्य आभूषण सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं

Last Updated- February 03, 2026 | 10:09 PM IST
Diamond
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अमेरिकी टैरिफ में नरमी ने इस पूरे क्षेत्र के मांग संबंधी भरोसे को बढ़ा दिया है और पिछले 10 महीने में हुए नुकसान की भरपाई तथा फिर से रफ्तार पकड़ने की उम्मीद जगी है। पिछले साल हीरों समेत भारतीय रत्न और आभूषणों पर लगाए गए जवाबी टैरिफ ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार की चमक बिगाड़ दी थी। अमेरिका 30 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सेदारी के साथ कीमती रत्नों का सबसे बड़ा बाजार है। इसके असर से अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में 44.5 प्रतिशत की गिरावट आई तथा तराशे गए हीरों, सोने के जड़ाऊ और सामान्य आभूषण सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

उद्योग के संगठन जेम ऐंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) ने बयान में कहा, ‘जीजेईपीसी को उम्मीद है कि भारत के व्यापार समझौते के कारण भारत से कच्चे हीरों और रंगीन रत्नों को अमेरिकी जवाबी टैरिफ सूची के एनेक्सचर 3 के तहत अमेरिका में शून्य शुल्क आयात का लाभ मिलेगा, जिससे हीरों के निर्यात को बहुत जरूरी मदद मिलेगा। इससे व्यापार बढ़ेगा, विश्वास फिर से पैदा होगा और पूरे उद्योग को जोरदार बढ़ावा मिलेगा।’

जीजेईपीसी के आंकड़ों से पता चलता है कि तराशे हीरों का निर्यात साल 2024 के 3.63 अरब डॉलर की तुलना में 60.11 प्रतिशत घटकर साल 2025 में 1.45 अरब डॉलर रह गया। सोने के जड़ाऊ गहनों के निर्यात में 24.54 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 2.11 अरब डॉलर की तुलना में घटकर 1.6 अरब डॉलर रह गया, जबकि सोने के सादे गहनों में 28.89 प्रतिशत की कमी आई और यह 25.853 करोड़ डॉलर से घटकर 18.384 करोड़ डॉलर रह गया।

इंडियन डायमंड इंस्टीट्यूट के चेयरमैन दिनेश नवाडिया ने कहा, ‘पिछले साल टैरिफ और अतिरिक्त टैरिफ लागू होने के बाद इस क्षेत्र की मांग में 45 प्रतिशत तक की कमी देखी गई थी। अब इस नई शुल्क संरचना के साथ उद्योग को उम्मीद है कि मांग फिर से बढ़ेगी। अमेरिका हमारे लिए सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है।’ उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र लैब में बने हीरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे नए बाजारों की तलाश जारी रखेगा।

एक इकाई के संचालक ने कहा कि अभी और ज्यादा जानकारी नहीं मिली है और हीरों की कम मांग का मतलब यह है कि फिलहाल कम श्रमिक हैं। अलबत्ता जब ज्यादा स्पष्टता आएगी और नए ऑर्डर आने लगेंगे तो यह स्थिति बदल सकती है। पिछले करीब 10 महीने से सूरत का उद्योग प्राकृतिक और तराशे हीरों की कम मांग से जूझ रहा है, जिससे इस क्षेत्र के कारीगरों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

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First Published - February 3, 2026 | 10:09 PM IST

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