Digital Adoption: भारत में छोटे-छोटे कारोबार देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। गली-मोहल्ले की दुकानें, छोटे कारखाने, सर्विस देने वाले काम, घर से चलने वाले बिजनेस और छोटे ट्रेडर्स- ये सभी लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार देते हैं। लेकिन इन कारोबारों की एक बड़ी दिक्कत यह रही है कि इनमें से बहुत से कारोबार अब भी बिना औपचारिक रजिस्ट्रेशन, बिना सही हिसाब-किताब और बिना बैंकिंग सिस्टम से जुड़े हुए चल रहे हैं। ऐसे में उन्हें बड़ा होने, बैंक से कर्ज लेने और नई तकनीक अपनाने में मुश्किल आती है।
अब एक नई स्टडी से पता चलता है कि अगर छोटे कारोबार डिजिटल तकनीक अपनाते हैं, तो उनकी कमाई और कामकाज दोनों में बड़ा सुधार हो सकता है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट, डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन कामकाज और दूसरी डिजिटल सुविधाओं का इस्तेमाल करने वाले कारोबार ज्यादा उत्पादक बन रहे हैं। यानी वही कारोबार कम संसाधनों में ज्यादा काम कर पा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन छोटे कारोबारों ने डिजिटल या आईसीटी तकनीक अपनाई है, उनकी लेबर प्रोडक्टिविटी यानी प्रति कर्मचारी उत्पादन क्षमता में औसतन 76 फीसदी तक बढ़ोतरी देखी गई है।
सीधे शब्दों में समझें तो अगर कोई छोटा कारोबारी इंटरनेट, डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बुककीपिंग या मोबाइल आधारित बिजनेस टूल्स का इस्तेमाल करता है, तो उसका काम पहले से तेज और बेहतर हो सकता है। इससे समय बचता है, हिसाब-किताब ठीक रहता है और ग्राहक तक पहुंच भी बढ़ती है।
डिजिटल तकनीक का फायदा सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी अगर इंटरनेट और डिजिटल पेमेंट जैसी सुविधाएं बेहतर हों, तो छोटे कारोबारियों की कमाई बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डिजिटल तकनीक अपनाने वाले कारोबारों के रजिस्ट्रेशन कराने की संभावना काफी बढ़ जाती है। यानी जो कारोबारी डिजिटल तरीके से काम करते हैं, वे धीरे-धीरे औपचारिक व्यवस्था से भी जुड़ने लगते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल तकनीक अपनाने से कारोबार के रजिस्टर्ड होने की संभावना औसतन 84 प्रतिशत अंक तक बढ़ती है। मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेड और सर्विस- तीनों सेक्टर में इसका असर साफ दिखा।
इसका मतलब यह है कि डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन रिकॉर्ड और इंटरनेट का इस्तेमाल कारोबारी को सरकार और बैंकिंग सिस्टम के करीब लाता है। इससे कारोबार की पहचान बनती है और उसे आगे सरकारी योजनाओं या कर्ज का फायदा मिल सकता है।
छोटे कारोबारियों की सबसे बड़ी परेशानी अक्सर कर्ज की होती है। कई कारोबारी बैंक से लोन नहीं ले पाते क्योंकि उनका कारोबार रजिस्टर्ड नहीं होता या उनके पास सही कागज और रिकॉर्ड नहीं होते। रिपोर्ट के मुताबिक, रजिस्टर्ड कारोबारों को गैर-रजिस्टर्ड कारोबारों के मुकाबले औपचारिक कर्ज मिलने की संभावना ज्यादा होती है। रजिस्टर्ड कारोबारों में कर्ज मिलने की संभावना 6.90 प्रतिशत अंक ज्यादा पाई गई।
आसान भाषा में कहें तो अगर कोई छोटा कारोबारी अपना कारोबार रजिस्टर कराता है, तो बैंक या वित्तीय संस्था के लिए उस पर भरोसा करना आसान हो जाता है। इससे लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
रिपोर्ट में कर्ज की रकम को लेकर भी बड़ा अंतर दिखाया गया है। गैर-रजिस्टर्ड कारोबारों को औसतन करीब 75,000 रुपये तक का लोन मिलता है, जबकि रजिस्टर्ड कारोबारों को औसतन करीब 5 लाख रुपये तक का कर्ज मिल सकता है। यह फर्क बताता है कि सिर्फ कारोबार चलाना काफी नहीं है। अगर कारोबारी अपने बिजनेस को औपचारिक रूप से रजिस्टर करता है, रिकॉर्ड रखता है और डिजिटल ट्रांजैक्शन करता है, तो बैंक से ज्यादा रकम का कर्ज मिल सकता है।
सरकार ने छोटे कारोबारों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ने के लिए उद्यम और उद्यम असिस्ट जैसे प्लेटफॉर्म शुरू किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन कराने वाले कारोबारों को कर्ज और औपचारिक कामकाज में ज्यादा फायदा मिल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि सामान्य रजिस्ट्रेशन वाले कारोबारों के मुकाबले उद्यम या उद्यम असिस्ट पर रजिस्टर्ड कारोबारों को ज्यादा कर्ज मिलने की संभावना रहती है। ऐसे कारोबारों को औसतन करीब 10 लाख रुपये तक का लोन मिल सकता है।
इससे साफ है कि सरकारी रजिस्ट्रेशन सिस्टम छोटे कारोबारों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
रिपोर्ट में महिला उद्यमियों को लेकर भी अहम बात कही गई है। महिला मालिकों वाले कारोबारों को पुरुष मालिकों वाले कारोबारों के मुकाबले औपचारिक कर्ज मिलने की संभावना अभी भी कम है। लेकिन जब महिला उद्यमी अपना कारोबार रजिस्टर कराती हैं, तो तस्वीर बदलती है। रिपोर्ट के मुताबिक, रजिस्टर्ड महिला उद्यमियों को गैर-रजिस्टर्ड महिला उद्यमियों के मुकाबले बैंक या संस्थागत कर्ज मिलने की संभावना ज्यादा होती है।
रजिस्टर्ड महिला कारोबारों को औसतन करीब 5 लाख रुपये तक का लोन मिल सकता है, जबकि बिना रजिस्ट्रेशन वाले महिला कारोबारों को औसतन करीब 75,000 रुपये तक का ही लोन मिलता है। इससे साफ है कि महिलाओं के छोटे कारोबारों को आगे बढ़ाने के लिए रजिस्ट्रेशन, डिजिटल रिकॉर्ड और बैंकिंग सिस्टम से जुड़ना बेहद जरूरी है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में गैर-कॉर्पोरेट और गैर-कृषि छोटे कारोबारों की संख्या बढ़ रही है। ASUSE 2025 के मुताबिक, ऐसे प्रतिष्ठानों की संख्या 2023-24 में 7.34 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 7.92 करोड़ हो गई। इन कारोबारों में काम करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। 2023-24 में ऐसे सेक्टर में 12.06 करोड़ कामगार थे, जो 2025 में बढ़कर 12.8 करोड़ हो गए। इससे पता चलता है कि छोटे कारोबार न सिर्फ खुद बढ़ रहे हैं, बल्कि रोजगार देने में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में भी छोटे कारोबार बढ़े हैं, लेकिन शहरी इलाकों में इनकी रफ्तार ज्यादा तेज रही है। इसका मतलब है कि शहरों में छोटे सर्विस बिजनेस, ट्रेडिंग गतिविधियां और गैर-कृषि कारोबार तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि ग्रामीण भारत में भी छोटे कारोबार बड़ी संख्या में मौजूद हैं और वहां डिजिटल सुविधा बढ़ाने से बड़ी संख्या में लोगों को फायदा हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, गैर-कॉर्पोरेट सेक्टर की कुल ग्रॉस वैल्यू ऐडेड यानी जीवीए में हिस्सेदारी 2022-23 में 9.9 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़कर 11.2 फीसदी हो गई। इसका मतलब है कि छोटे और असंगठित कारोबार देश की अर्थव्यवस्था में पहले से ज्यादा योगदान दे रहे हैं। अगर इन्हें सही डिजिटल सुविधा, रजिस्ट्रेशन सहायता और आसान कर्ज मिले, तो इनकी हिस्सेदारी और बढ़ सकती है।
छोटे गैर-कॉर्पोरेट कारोबारों में सर्विस सेक्टर का योगदान सबसे ज्यादा रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में इस सेक्टर में अन्य सेवाओं की हिस्सेदारी 42 फीसदी रही। ट्रेड यानी व्यापार की हिस्सेदारी 37 फीसदी और मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 21 फीसदी रही। यह दिखाता है कि छोटे कारोबारों में अब सर्विस आधारित गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं।
रिपोर्ट में इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर भी जानकारी दी गई है। 2025 में छोटे कारोबारों में इंटरनेट का उपयोग बढ़ा है। हिमाचल प्रदेश में ऐसे कारोबारों में इंटरनेट इस्तेमाल सबसे ज्यादा देखा गया। इसके बाद हरियाणा और असम का नंबर आता है। देशभर में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ना छोटे कारोबारों के लिए अच्छा संकेत है। इससे डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बिक्री, ग्राहक संपर्क और हिसाब-किताब आसान हो सकता है।
रिपोर्ट में सरकार के लिए कुछ अहम सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि छोटे कारोबारों के लिए सस्ता इंटरनेट, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और कॉमन सर्विस सेंटर जैसी सुविधाएं मजबूत की जानी चाहिए। इसके अलावा कारोबारियों को स्थानीय भाषा में डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बुककीपिंग, रजिस्ट्रेशन और ऑनलाइन बिक्री की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि उद्यम और जीएसटी रजिस्ट्रेशन के लिए कैंप लगाए जाएं और नए छोटे कारोबारों के लिए नियम-कायदे आसान किए जाएं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे कारोबारों को कर्ज देने के लिए सिर्फ गिरवी या संपत्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। बैंक और वित्तीय संस्थाएं डिजिटल पेमेंट हिस्ट्री और कारोबार में आने-जाने वाले पैसे के आधार पर भी लोन दे सकती हैं। इससे उन छोटे कारोबारियों को मदद मिलेगी जिनके पास संपत्ति कम है, लेकिन उनका बिजनेस ठीक चल रहा है।
रिपोर्ट में महिलाओं के कारोबार, ग्रामीण कारोबार और बहुत छोटे उद्यमों पर खास ध्यान देने की बात कही गई है। इनके लिए अलग डिजिटल और कर्ज योजनाएं लाई जा सकती हैं। अगर महिलाओं और ग्रामीण कारोबारियों को रजिस्ट्रेशन, डिजिटल ट्रेनिंग और बैंक लोन में मदद मिले, तो वे अपने कारोबार को ज्यादा तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं।