पश्चिम एशिया युद्ध से उपजे ऊर्जा संकट का असर अब धीरे-धीरे भारत की ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स आपूर्ति श्रृंखला पर दिखने लगा है। विशेषकर डीजल और एलपीजी की कमी से इन फर्मों का लॉजिस्टिक्स क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। साथ ही बुनियादी ढांचे के विस्तार में भी अड़चन आ रही है। गुजरात और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में तेल की कमी से जनरेटर पर निर्भर डार्क स्टोर चलाना मुश्किल हो रहा है। ये स्टोर समय पर डिलिवरी के लिए सबसे आवश्यक होते हैं।
उद्योग जगत के अधिकारियों ने बताया कि कई राज्यों में वाणिज्यिक डीजल उपभोक्ताओं के लिए ईंधन क्रेडिट और छूट की योजनाओं को वापस लिए जाने से दूरदराज तक डिलिवरी पहुंचाने की लागत बढ़ गई है। लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की कमी की वजह से नए पूर्ति केंद्रों के विस्तार या उन्हें संलाचित करने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर देश की डिजिटल वाणिज्यिक गतिविधियों पर पड़ रहा है।
एक अधिकारी ने कहा, ‘यह सीधे तौर पर हर आर्डर पर आने वाली लागत और उससे मिलने वाले राजस्व को प्रभावित करता है। उद्योग को एक साथ दो मोर्चों पर जूझना पड़ रहा है। एक तो प्रति ऑर्डर लागत बढ़ गई है। दूसरे, मांग में भी कमी आई है।’ दूरदराज की डिलिवरी पहुंचाने पर ईंधन सरचार्ज बढ़ रहा है, पैकेजिंग की लागत में भी लगभग 30% की वृद्धि हुई है और डार्क स्टोर के निर्माण में देरी से क्षमता विस्तार का काम धीमा पड़ गया है।
अधिकारियों ने बताया कि मोबाइल वैन के जरिए डीजल वितरण पर प्रतिबंध के कारण उत्तरी और पश्चिमी भारत में जनरेटर पर निर्भर डार्क स्टोर नेटवर्क बाधित हो रहे हैं। ये स्टोर 10 मिनट और उसी दिन डिलिवरी के लिए सबसे मजबूत स्तंभ होता है।