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पश्चिम एशिया तनाव से टायर इंडस्ट्री पर दबाव, निर्यात और लागत पर असर

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उद्योग को कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण बढ़ती उत्पादन लागत का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसकी कीमत अभी 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं।

Last Updated- March 13, 2026 | 9:39 AM IST
tyre
Representational Image

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक टकराव से निर्यात प्रभावित हो सकता है। भारत के टायर उद्योग की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव आ सकता है। इस कारण वाहन टायर निर्माताओं के संगठन (एटमा) ने सरकार से तत्काल नीतिगत समर्थन की मांग की है।
केंद्र को दिए गए पत्र में उद्योग संगठन ने चेतावनी दी कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष से टायर निर्यात पर असर आ सकता है और कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है जिससे निर्माताओं के लिए लॉजिस्टिक से जुड़ी बाधाएं हो जाएंगी।

भारत पश्चिम एशिया को सालाना लगभग 25-26 करोड़ डॉलर के टायरों का निर्यात करता है। यदि तनाव बढ़ता रहा तो इन खेप में व्यवधान आ सकता है। एटमा ने यह भी चेतावनी दी कि होर्मुज स्ट्रेट और स्वेज नहर सहित प्रमुख समुद्री मार्गों में अस्थिरता यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका को होने वाली खेपों को प्रभावित कर सकती है, जिससे माल भेजने में देरी और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।

उद्योग को कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण बढ़ती उत्पादन लागत का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसकी कीमत अभी 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं। टायर बनाने में कच्चे माल की लागत का 60-70 प्रतिशत हिस्सा कच्चे तेल के डेरिवेटिव से जुड़ा होता है। सिंथेटिक रबर, कार्बन ब्लैक, प्रोसेसिंग ऑयल और टायर कॉर्ड फैब्रिक जैसे मुख्य इनपुट कच्चे तेल से ही आते हैं, जिससे यह क्षेत्र कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से संवेदनशील हो जाता है।

एटमा के चेयरमैन अरुण मैमन ने कहा, ‘भारतीय टायर उद्योग के लिए बढ़ती उत्पादन लागत, माल ढुलाई में रुकावट और निर्यात की अनिश्चितताओं का मिला-जुला असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी क्षमता पर पड़ सकता है।’ उन्होंने कहा कि समय पर नीतिगत समर्थन बहुत जरूरी होगा क्योंकि भारत अपनी निर्यात रफ्तार को मजबूत बनाना चाहता है।

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First Published - March 13, 2026 | 9:39 AM IST

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