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सरकार का बड़ा कदम, 2 साल से कम उम्र के बच्चों को नहीं दी जाएगी खांसी की दवा

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केंद्र सरकार बच्चों के लिए कफ सिरप के इस्तेमाल पर सख्त नियम लागू करने की तैयारी में है, जिसमें दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इन दवाओं पर पूरी तरह रोक का प्रस्ताव शामिल है

Last Updated- April 11, 2026 | 3:21 PM IST
cough syrup
Representative image

केंद्र सरकार बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले कफ सिरप को लेकर नियमों को सख्त करने की तैयारी में है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को कफ और सर्दी की दवाएं लिखने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, जबकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इनके इस्तेमाल को सामान्य रूप से हतोत्साहित किया जाए।

यह प्रस्ताव भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) की ओर से जारी नेशनल फार्मुलरी ऑफ इंडिया (NFI) 2026 के ड्राफ्ट का हिस्सा है। इस दस्तावेज का मकसद दवाओं की जानकारी जैसे खुराक, उपयोग, किन परिस्थितियों में दवा नहीं देनी चाहिए और संभावित साइड इफेक्ट्स को मानकीकृत करना है, ताकि डॉक्टर और फार्मासिस्ट सुरक्षित तरीके से दवाएं लिख सकें।

ड्राफ्ट में साफ कहा गया है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को कफ और सर्दी की दवाएं न तो लिखी जाएं और न ही दी जाएं। वहीं पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में इन दवाओं का इस्तेमाल तभी किया जाए जब बेहद जरूरी हो और डॉक्टर की कड़ी निगरानी में हो।

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इस कदम के पीछे पिछले साल सामने आए उन मामलों को वजह माना जा रहा है, जिनमें कुछ कफ सिरप में मिलावट या संदूषण की आशंका के बाद बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आई थीं।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) ने दवाओं में इस्तेमाल होने वाले कुछ उच्च जोखिम वाले सहायक पदार्थों (एक्सीपिएंट्स) के लिए नए मानकों का मसौदा जारी किया है। इनमें ग्लिसरीन, प्रोपिलीन ग्लाइकोल, सोरबिटोल सॉल्यूशन और लिक्विड माल्टिटोल जैसे पदार्थ शामिल हैं, जिनमें डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) जैसी जहरीली अशुद्धियों का खतरा रहता है।

नए प्रस्ताव के तहत दवा बनाने वाली कंपनियों को अब केवल फार्माकोपियल ग्रेड सॉल्वेंट्स का उपयोग करना होगा। साथ ही हर बैच में कच्चे माल और तैयार दवाओं की सख्त जांच अनिवार्य की जाएगी। यह जांच केवल मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में ही करनी होगी और उसका पूरा रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखना होगा।

मसौदे में यह भी स्पष्ट किया गया है कि फार्मा कंपनियों को अपने स्तर पर इनपुट और फाइनल प्रोडक्ट की जांच की जिम्मेदारी लेनी होगी, ताकि पूरी सप्लाई चेन में जवाबदेही तय की जा सके। उद्योग संगठनों जैसे इंडियन ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने इस ड्राफ्ट पर अपने सुझाव देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस कदम का स्वागत किया है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश शर्मा के अनुसार छोटे बच्चों में खांसी की दवाओं का सीमित लाभ होता है और कई बार यह अनावश्यक जोखिम भी बढ़ा सकती हैं। उनका कहना है कि खांसी शरीर की एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रक्रिया है और इलाज का ध्यान इसके कारणों पर होना चाहिए, न कि सिर्फ लक्षण दबाने पर।

विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि बच्चों में दवा के बजाय पर्याप्त पानी देना, सलाइन ड्रॉप्स और एक साल से अधिक उम्र के बच्चों में शहद जैसे सुरक्षित उपाय ज्यादा बेहतर विकल्प हैं।

यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब हाल के वर्षों में कफ सिरप से जुड़े कई मामलों के बाद दवा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। सरकार और नियामक एजेंसियां अब दवा गुणवत्ता को मजबूत करने और भारत के फार्मा सेक्टर पर भरोसा बहाल करने की दिशा में कदम तेज कर रही हैं।

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First Published - April 11, 2026 | 3:21 PM IST

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