भारत के स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता क्षेत्रों के रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (इक्रियर) के अध्ययन के अनुसार इन क्षेत्रों में अगले चार वर्षों में कुल रोजगार तीन गुना बढ़कर 5,19,200 हो जाएगा।
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2029-30 तक स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार 9,05,000 और ऊर्जा दक्षता (ईई) से संबंधित क्षेत्रों में रोजगार 4,28,700 पहुंचने की उम्मीद है। यह 2021-22 की तुलना में बड़ी वृद्धि है। वर्ष 2021-22 में स्वच्छ ऊर्जा और अन्य स्वच्छ पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में 3,18,000 लोग कार्यरत थे और ईई में रोजगार 1,26,900 था।
रिपोर्ट के अनुसार ‘माना जा रहा है कि भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन की क्षमता का लक्ष्य हासिल कर सकता है। इससे संबंधित क्षेत्र में रोजगार 2021-22 के स्तर से 2.8 गुना बढ़ जाएगा।’
इसी तरह यदि देश 2030 तक 15 करोड़ टन तेल के समतुल्य ऊर्जा बचत का लक्ष्य प्राप्त कर लेता है तो ऊर्जा दक्षता से संबंधित रोजगार 3.8 गुना बढ़ जाएगा।
विश्लेषण में पाया गया कि 2022-30 की अवधि में सौर ऊर्जा से संबंधित रोजगार का हिस्सा सबसे अधिक रहेगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि सौर ऊर्जा से जुड़ी नौकरियों ने अन्य स्रोतों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन
किया है।
अध्ययन में यह भी उजागर हुआ कि वर्ष 2022-2030 के बीच गुजरात में 79,000 व राजस्थान में 77,000 अतिरिक्त नौकरियों का सृजन होगा और ये सबसे अधिक रोजगार सृजन करने वाले राज्य बनने की उम्मीद है।
पवन ऊर्जा आधारित रोजगार सृजन के मामले में तमिलनाडु और गुजरात अग्रणी हैं जबकि आंध्र प्रदेश में बड़े जलविद्युत आधारित रोजगार में सबसे अधिक हिस्सेदारी होने की उम्मीद है।
छतों पर सौर पैनल लगाने से संबंधित रोजगार के मामले में गुजरात के अग्रणी रहने की उम्मीद है जबकि जमीन पर लगाए जाने वाले सौर पैनल में सबसे अधिक अतिरिक्त रोजगार राजस्थान में मिलने की संभावना है। ऊर्जा दक्षता के रोजगार में तमिलनाडु का दबदबा है और उसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक आते हैं।