Heatwave in India: भारत में फसल बीमा की व्यवस्था अब तक सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि और पूरी फसल खराब होने जैसी घटनाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। लेकिन अब किसानों के सामने एक नई समस्या तेजी से बढ़ रही है। यह समस्या है Heatwave यानी भीषण गर्मी की। इसमें फसल खेत में खड़ी रहती है, पूरी तरह बर्बाद नहीं होती, लेकिन उसकी पैदावार और गुणवत्ता दोनों खराब हो जाती हैं। इससे किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, जबकि उन्हें बीमा का फायदा भी नहीं मिल पाता।
भारतीय मौसम विभाग यानी IMD ने चेतावनी दी है कि 2026 की गर्मियों में देश के कई हिस्सों में सामान्य से ज्यादा Heatwave वाले दिन देखने को मिल सकते हैं। पिछले कुछ हफ्तों में कई राज्यों में तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। इसका असर अब खेती पर साफ दिखाई देने लगा है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि Heatwave का असर कई बार धीरे-धीरे होता है। फसल खेत में हरी दिखाई देती है, लेकिन अंदर से उसकी गुणवत्ता और उत्पादन पर असर पड़ता है।
Knam Foods Pvt Ltd के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित गोयल का कहना है कि तेज गर्मी की वजह से फसलों पर काफी दबाव पड़ता है और कई बार उत्पादन 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो जाता है। ऊपर से सिंचाई, बिजली और देखभाल का खर्च भी बढ़ जाता है। इसके बाद जब किसान बाजार में फसल बेचने जाते हैं तो खराब गुणवत्ता की वजह से कम दाम मिलते हैं।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यानी PMFBY में मुआवजा मुख्य रूप से उत्पादन में गिरावट और बड़े स्तर पर फसल नुकसान के आधार पर दिया जाता है। वहीं, Weather Based Crop Insurance Scheme यानी WBCIS में बारिश, नमी और तापमान जैसे तय मौसम संकेतकों के आधार पर भुगतान किया जाता है। समस्या यह है कि हीटवेव का असर कई बार ‘आधिकारिक फसल नुकसान’ की श्रेणी में नहीं आता। फसल पूरी तरह नष्ट नहीं होती, इसलिए किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाता।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक PMFBY शुरू होने के बाद से 11 करोड़ से ज्यादा किसान इससे जुड़ चुके हैं और अब तक 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के क्लेम दिए जा चुके हैं।
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Two Brothers Organic Farms के सह-संस्थापक सत्यजीत हांगे का कहना है कि तेज गर्मी की वजह से फसलों में फूल झड़ने लगते हैं, पौधों में पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है और उत्पादन घट जाता है। कई बार फसल देखने में ठीक लगती है, लेकिन उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है।
झारखंड के हजारीबाग के किसान विकास कुमार बताते हैं कि हीटवेव के दौरान फसल की गुणवत्ता 14 से 18 प्रतिशत तक गिर जाती है। वहीं सिंचाई का खर्च भी काफी बढ़ जाता है। खराब गुणवत्ता की वजह से बाजार में फसल के दाम कई बार 50 प्रतिशत तक गिर जाते हैं।
बीमा विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से अब पुराने तापमान मानक काम नहीं कर रहे हैं। पहले जिन फसलों के लिए 38 डिग्री तापमान सामान्य माना जाता था, अब वही फसलें लगातार 42 से 45 डिग्री तापमान झेल रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फसल पर असर सिर्फ तापमान से नहीं, बल्कि इस बात से भी पड़ता है कि फसल किस चरण में है। अगर फूल आने या दाना बनने के समय हीटवेव आ जाए तो नुकसान ज्यादा होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हीटवेव के लिए सही बीमा मॉडल तैयार करना आसान नहीं है। इसके लिए लंबे समय का स्थानीय डेटा चाहिए, जो अभी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर अश्विनी छत्रे का कहना है कि भारत में अभी शहर स्तर पर भी हीटवेव के सटीक अनुमान मॉडल नहीं हैं। ऐसे में बीमा कंपनियों के लिए जोखिम का सही आकलन करना मुश्किल हो जाता है। ICICI Lombard के गौरव अरोड़ा के मुताबिक Heatwave का असर सिर्फ तापमान पर निर्भर नहीं करता। इसमें नमी, हवा की स्थिति और गर्मी कितने समय तक रही, ये सभी चीजें मायने रखती हैं।
किसानों का कहना है कि अब फसल बचाने के लिए ज्यादा सिंचाई करनी पड़ रही है। इससे पानी, बिजली और मजदूरी का खर्च बढ़ गया है। कई जगहों पर किसान भूजल का ज्यादा इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। अमित गोयल का कहना है कि कई किसान सिर्फ फसल को जिंदा रखने के लिए 20 से 40 प्रतिशत ज्यादा खर्च कर रहे हैं। लेकिन बाद में उन्हें कम कीमत मिलती है और बीमा से भी कोई मदद नहीं मिलती।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब फसल बीमा को सिर्फ फसल पूरी तरह खराब होने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। बीमा कंपनियों और सरकार को किसानों की घटती आय, गुणवत्ता में गिरावट और बढ़ती लागत को भी ध्यान में रखना होगा। कई विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में फसल बीमा को सिर्फ नुकसान के बाद मुआवजा देने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि जलवायु संकट से बचाने वाली व्यापक सुरक्षा प्रणाली बनाना पड़ेगा।