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Milk Price Hike: 2,000 किलोमीटर दूर का युद्ध कैसे महंगा कर रहा है आपकी घर की चाय?

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हाल ही में अमूल और मदर डेयरी ने 14 मई 2026 से दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की है

Last Updated- May 17, 2026 | 8:25 AM IST
Tea
Representational Image

भारत में दूध एक ऐसी चीज है जो लगभग हर घर की रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा है। सुबह की चाय से लेकर बच्चों के नाश्ते तक, दूध के बिना दिन की शुरुआत अधूरी मानी जाती है। लेकिन अब यही दूध लगातार महंगा होता जा रहा है। अमूल और मदर डेयरी ने 14 मई 2026 से दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि दूध महंगा होने की वजह सिर्फ डेयरी सेक्टर, किसानों की लागत या पशुओं के चारे का खर्च होता है। लेकिन इस बार मामला इससे कहीं बड़ा है।

केडिया एडवाइजरी के अजय केडिया के मुताबिक, करीब 2000 किलोमीटर दूर चल रहा अमेरिका और ईरान का तनाव अब भारत के घरों की रसोई तक असर दिखा रहा है। इसकी वजह है कच्चा तेल।

अमेरिका-ईरान तनाव और तेल बाजार की चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया के तेल बाजार में चिंता बढ़ा दी है। इसकी सबसे बड़ी वजह है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। यह दुनिया का सबसे अहम तेल सप्लाई रूट माना जाता है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। अगर इस इलाके में तनाव बढ़ता है या सप्लाई बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। भारत के लिए यह चिंता और बड़ी हो जाती है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल महंगा होते ही उसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

दूध और कच्चे तेल का क्या है संबंध?

पहली नजर में दूध और कच्चे तेल का कोई सीधा संबंध नजर नहीं आता। लेकिन असल में दूध की पूरी सप्लाई चेन तेल पर निर्भर करती है। गांवों से शहरों तक दूध पहुंचाने वाले टैंकर डीजल से चलते हैं। जैसे ही डीजल महंगा होता है, ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ जाती है। दूध को खराब होने से बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज और चिलिंग प्लांट की जरूरत होती है। इन प्लांट्स में बिजली और ईंधन की भारी खपत होती है। ऊर्जा महंगी होते ही डेयरी कंपनियों की लागत बढ़ने लगती है। दूध के पैकेट बनाने में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक भी पेट्रोलियम उत्पादों से बनता है। इसलिए तेल महंगा होने पर पैकेजिंग का खर्च भी बढ़ जाता है।

दूध की कीमत बढ़ाने वाले बड़े कारण

1. ट्रांसपोर्ट का बढ़ता खर्च

दूध हर दिन गांवों से शहरों तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए हजारों टैंकर और डिलीवरी वाहन इस्तेमाल होते हैं। डीजल महंगा होने से इन वाहनों का खर्च तेजी से बढ़ता है।

2. कोल्ड स्टोरेज और बिजली की लागत

दूध को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए लगातार ठंडे तापमान में रखना जरूरी होता है। इसके लिए डेयरी कंपनियों को भारी बिजली खर्च उठाना पड़ता है। ऊर्जा महंगी होने से यह लागत भी बढ़ रही है।

3. पैकेजिंग महंगी होना

दूध के पाउच और पैकेजिंग सामग्री पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक से बनती है। कच्चा तेल महंगा होते ही पैकेजिंग कंपनियों की लागत बढ़ जाती है।

4. पशुओं के चारे का खर्च

पशुओं के लिए चारा और फीड अलग-अलग राज्यों से ट्रांसपोर्ट होकर आता है। तेल महंगा होने से चारा पहुंचाने की लागत भी बढ़ती है। इसका असर सीधे किसानों पर पड़ता है।

5. शहरों में डिलीवरी का खर्च

शहरों में घर-घर दूध पहुंचाने वाले डिस्ट्रीब्यूटर्स और सप्लाई नेटवर्क को भी ज्यादा ईंधन खर्च उठाना पड़ता है। इससे रिटेल कीमतों पर दबाव बढ़ता है।

डेयरी सेक्टर पहले से दबाव में

भारत का डेयरी सेक्टर पिछले कुछ वर्षों से कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। लंपी स्किन बीमारी की वजह से कई राज्यों में पशुओं की उत्पादकता प्रभावित हुई। इससे दूध उत्पादन पर असर पड़ा। इसके अलावा, खराब मानसून और मौसम की अनिश्चितता के कारण पशुओं के चारे की कीमतें भी बढ़ीं। दूसरी तरफ देश में दूध की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। 2023-24 में देश में लगभग 239.3 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ। हर भारतीय औसतन रोज लगभग 470 से 485 ग्राम दूध का इस्तेमाल करता है। इसलिए दूध की कीमत में छोटा बदलाव भी करोड़ों परिवारों के बजट पर असर डालता है।

क्या सिर्फ दूध ही महंगा होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ शुरुआत है। कच्चा तेल सिर्फ ईंधन नहीं है, बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी लागत बन चुका है। तेल महंगा होने का असर ट्रांसपोर्ट, खाद, एफएमसीजी पैकेजिंग, फूड डिलीवरी, रेस्टोरेंट, खेती और रोजमर्रा की कई जरूरी चीजों पर पड़ता है। यानी आने वाले समय में सिर्फ दूध ही नहीं, बल्कि कई खाद्य और उपभोक्ता वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।

क्या है ‘सेकंड राउंड महंगाई’?

अर्थशास्त्र में इसे ‘सेकंड राउंड इंफ्लेशन’ कहा जाता है। सबसे पहले कच्चा तेल महंगा होता है। इसके बाद ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ती है। आखिर में इसका बोझ आम उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। यानी पश्चिम एशिया में चल रहा तनाव अब सीधे भारत के घरों की रसोई तक असर दिखा रहा है। आपकी रोज की चाय अब सिर्फ दूध या चीनी पर निर्भर नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति और कच्चे तेल के बाजार से भी जुड़ चुकी है।

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First Published - May 17, 2026 | 8:25 AM IST

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