Defence Spending: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की अप्रैल की विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में मौजूदा वैश्विक संघर्षों के बीच वैश्विक रक्षा खर्च में हो रही वृद्धि को उजागर किया गया है। इसमें अमेरिका और इजरायल का ईरान के के साथ जारी युद्ध भी शामिल है जहां फिलहाल दो सप्ताह का युद्धविराम है। मगर शुरुआती शांति वार्ता के विफल होने के कारण स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है।
‘वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक इन द शैडो ऑफ वार’ यानी युद्ध की छाया में विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण रक्षा खर्च और बढ़ सकता है जो पहले से ही शीत युद्ध (1991 में समाप्त) के बाद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। आईएमएफ सरकारों को रक्षा खर्च में उछाल की स्थिति में आर्थिक असंतुलन के प्रति आगाह करता है।
यह रिपोर्ट भारत के लिए भी प्रासंगिक है। भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला विकासशील देश है जो रक्षा आयात एवं खर्च के लिहाज से दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शामिल है। भारत फिलहाल रक्षा मद में अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2 फीसदी से कम यानी 4 लाख करोड़ डॉलर से अधिक खर्च करता है। यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से बेहद निचले पायदान पर मौजूद है। भारत की सामाजिक वास्तविकताएं विकसित देशों से अलग हैं। साथ ही उसे अपने पड़ोसियों के साथ काफी अहम रणनीतिक चुनौतियों से जूझना पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक रक्षा खर्च में दशकों की गिरावट के बाद बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम और लगातार सैन्य संघर्ष के कारण दुनिया के तमाम देश फिलहाल एक महत्त्वपूर्ण मोड़ खड़े हैं जहां वे रक्षा खर्च बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब खर्च का दबाव पहले से ही काफी अधिक है। ऐसे में रक्षा मद में खर्च करते समय नीति निर्माताओं को कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं। इस प्रकार यह आगाह करता है कि रक्षा खर्च में उछाल अक्सर राजकोषीय और बाहरी संतुलन को कमजोर कर देती है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘युद्ध के दौरान होने वाली वृद्धि के बाद सार्वजनिक ऋण में भारी वृद्धि दिखती है और सामाजिक खर्च में काफी कमी आती है। इसके विपरीत शांति काल में होने वाली आर्थिक तेजी से उत्पादन बढ़ता है। ऐसे में न तो कर्ज की स्थिति बिगड़ती है और न ही सामाजिक खर्च में कटौती करनी पड़ती है। बाहरी मोर्चे पर देखा जाए तो बढ़ी हुई मांग और कुछ हद तक विदेशी सैन्य उपकरणों की खरीद के कारण आयात में वृद्धि चालू खाते की स्थिति को बिगाड़ देती है।
मौजूदा रक्षा विस्तार का व्यापक आर्थिक प्रभाव पहले के मुकाबले अलग हो सकता है क्योंकि रक्षा व्यय अब तेजी से अधिक पूंजी लागत और अनुसंधान पर केंद्रित होता जा रहा है। ऐसा उन अर्थव्यवस्थाओं में हो रहा है जो बेहद एकीकृत होने के साथ-साथ काफी ऋणग्रस्त भी हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध (1945) की समाप्ति के बाद 164 देशों के नमूने पर आधारित इस रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि सरकारों ने अक्सर बड़े पैमाने पर खर्च में बढ़ोतरी की है। ऐसा आम तौर पर उधारी के जरिये किया गया है। एक क्षेत्र विशेष के लिए मांग झटके के रूप में काम करते हुए शांति काल के दौरान रक्षा तैयारियों में बढ़ोतरी से थोड़े समय के लिए उत्पादन और कीमतों में इजाफा होता है। ऐसा खास तौर पर तब दिखता है जब रक्षा खर्च में वृद्धि स्थायी होती है। ऐसे में उच्च पूंजी भंडार और संभवतः उत्पादकता लाभ के जरिये मध्यावधि में वृद्धि को रफ्तार मिलती है।
इस रिपोर्ट में नीति निर्माताओं से कुछ उपायों पर विचार करने का आग्रह किया गया है, जैसे रक्षा तैयारी को विश्वसनीय मध्यावधि राजकोषीय ढांचे के तहत एकीकृत किया जाए, अधिक लागत बोझ से निपटने के लिए व्यापक आर्थिक स्थितियों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन किया जाए और निर्माण की गति को सुचारू बनाया जाए ताकि बाधाओं को कम करने में मदद मिल सके, खास तौर पर संसाधनों को नए सिरे से वितरित करने के मामले में।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा व्यय ‘बड़े अल्पकालिक मल्टीप्लायर’ तैयार करता है जबकि पूंजीगत व्यय को अगर अनुसंधान एवं विकास पर होने वाले खर्च की ओर निर्देशित किया जाता है जो गैर-रक्षा उत्पाद वाले निवेश को बाधित नहीं करता है। इस प्रकार लंबी अवधि में यह उत्पादकता को सहारा दे सकता है। यह मिश्रण मुख्य रूप से सुरक्षा जरूरतों से तय होता है। देशों को वृहद आर्थिक बाधाओं को समझना चाहिए कि रक्षा निवेश को बढ़ाने के लिए आम तौर पर बड़ी शुरुआती प्रतिबद्धता और लगातार खर्च करने की आवश्यकता होती है। ऐसे में यह राजकोषीय तौर पर मौजूदा व्यय में वृद्धि के मुकाबले अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
भारत अपने रक्षा बजट (वित्त वर्ष 2027 में 7.85 लाख करोड़ रुपये) का 5 से 6 फीसदी अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह देश की सैन्य स्थिति के अनुरूप नहीं है। नई दिल्ली के थिंक टैंक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के रिसर्च फेलो कर्नल (सेवानिवृत्त) रजनीश सिंह ने कहा कि रक्षा व्यय के मामले में पारंपरिक तौर पर भारत की एक विवेकपूर्ण नीति रही है। मगर सरकारों ने आवश्यकता पड़ने पर बजट बढ़ाने का इरादा भी दिखाया है।