भारत अब अपनी चिप (सेमीकंडक्टर) की जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अनुमानों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2035 तक भारत अपनी कुल सेमीकंडक्टर मांग का आधा हिस्सा (50 फीसदी) खुद देश में ही तैयार करने लगेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि कुछ फैक्ट्रियों में तो इसी साल से उत्पादन भी शुरू होने जा रहा है।
इस कदम से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा। आंकड़ों पर नजर डालें तो सेमीकंडक्टर आयात का बिल लगातार बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2019 में जहां यह आयात 11.9 अरब डॉलर का था, वहीं वित्त वर्ष 2023 में बढ़कर 19.3 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2025 में 30.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ की प्रोत्साहन योजना के तहत अब तक 12 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से कम से कम चार प्रोजेक्ट्स में इसी साल से कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा।
फिलहाल भारत अपनी सेमीकंडक्टर जरूरतों का 90 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है। देश में जैसे-जैसे घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, इसकी मांग भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में वित्त वर्ष 2030 तक 500 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2035 तक 750 अरब डॉलर का उत्पादन हासिल करने का बड़ा लक्ष्य रखा है।
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नीति आयोग के अनुमानों के अनुसार, साल 2017 से 2025 के बीच भारत ने कुल 150 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर उत्पादों का आयात किया है। इस दौरान आयात में हर साल 23 फीसदी की चक्रवृद्घि दर (CAGR) से बढ़ोतरी हुई है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो साल 2035 तक देश को 240 अरब डॉलर के सेमीकंडक्टर आयात करने पड़ सकते हैं। हालांकि, घरेलू स्तर पर तैयारी भी पूरी है।
नीति आयोग का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में भारत की सेमीकंडक्टर मांग करीब 44 अरब डॉलर रहेगी, जो 2035 तक पांच गुना बढ़कर 206 अरब डॉलर पर पहुंच जाएगी।
इस पूरे इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए सरकार ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ लेकर आ रही है, जिसका बजट 1,00,000 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है। इसमें सिर्फ चिप बनाना ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े केमिकल, मशीनें और गैसें तैयार करने का पूरा ढांचा शामिल होगा। नीति आयोग का मानना है कि साल 2035 तक भारत करीब 120 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम खड़ा कर लेगा, जिसमें मैच्योर नोड्स, लॉजिक, स्पेशलिटी एनालॉग और कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स बनाने वाले फैब प्लांट्स शामिल होंगे।
शुरुआती दौर में टाटा ग्रुप, सीजी पावर और कायन्स (Kaynes) के तीन प्लांट इसी साल चालू हो जाएंगे, जो मिलकर हर दिन करीब 6.9 करोड़ (69 मिलियन) चिप बनाएंगे। इसके अलावा, देश में माइक्रो-एलईडी तकनीक लाने के प्रोजेक्ट को भी मंजूरी मिल गई है। अगले 22 महीनों में देश के पहले माइक्रो-एलईडी चिप बनकर तैयार हो जाएंगे, जिनका साइज 30 माइक्रोन से 125 माइक्रोन के बीच होगा।
इस मामले में अगर दुनिया के बाकी देशों को देखें, तो चीन साल 2030 तक अपनी आत्मनिर्भरता दर को 20 फीसदी से बढ़ाकर 50-60 फीसदी करने की योजना पर काम कर रहा है, जबकि जर्मनी भी इसी अवधि तक 20 फीसदी आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए अपने उत्पादन को तीन गुना बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करना चाहता है।