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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से ऑटो कंपोनेंट सेक्टर को मिली राहत, निर्यात में जबरदस्त तेजी की उम्मीद

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भारत हर साल अमेरिका को करीब 6.5 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट्स भेजता है। ये अमेरिका को हमारा सबसे बड़ा बाजार बनाता है

Last Updated- February 07, 2026 | 3:28 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम व्यापार समझौते ने भारतीय ऑटो और ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों को थोड़ी सुकून की सांस दी है। लेकिन अभी भी कई छोटी-मोटी बातें साफ नहीं हुई हैं। इस समझौते से असली फायदा कितना होगा, ये देखना अभी बाकी है। दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में व्यापार में आने वाली रुकावटों को कम करने और बाजार में पहुंच आसान बनाने की बात कही गई है। फिर भी, इंडस्ट्री वाले लोग कह रहे हैं कि अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी नियमों के तहत लगने वाले टैरिफ्स पर पूरी जानकारी मिलनी चाहिए, तभी सही अंदाजा लगेगा।

भारत हर साल अमेरिका को करीब 6.5 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट्स भेजता है। ये अमेरिका को हमारा सबसे बड़ा बाजार बनाता है। इनमें से आधे हिस्से पर सेक्शन 232 के तहत 25 फीसदी ड्यूटी लगती है, जो सिक्योरिटी के नाम पर है। बाकी हिस्से पर पहले जवाबी टैरिफ्स लगते थे, जो 50 फीसदी तक पहुंच गए थे। पिछले साल अक्टूबर में अमेरिका ने साफ किया कि सभी ऑटो पार्ट्स पर एक समान 25 फीसदी ड्यूटी होगी।

अब इस नए बयान में जवाबी टैरिफ्स को घटाकर 18 फीसदी करने की बात है। साथ ही, सेक्शन 232 के तहत ऑटोमोटिव पार्ट्स के लिए स्पेशल टैरिफ रेट कोटा देने का जिक्र है। लेकिन ये 18 फीसदी रेट सिर्फ जवाबी हिस्से पर लगेगा या सेक्शन 232 वाले सामान पर भी, ये अभी साफ नहीं है।

Also Read: भारत-अमेरिका के बीच $500 अरब का महा-समझौता, अगले 5 साल में ऊर्जा और तकनीक से बदलेगी तस्वीर

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का क्या है कहना 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि बयान की भाषा तो पॉजेटिव है, भले ही सब कुछ स्पष्ट न हो। प्राइमस पार्टनर्स के सलाहकार अनुराग सिंह कहते हैं कि सेक्शन 232 के तहत स्पेशल कोटा का जिक्र भारतीय ऑटो पार्ट्स बनाने वालों के लिए अच्छा संकेत है। 

उन्होंने कहा, “25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने का प्रस्ताव भारत को वियतनाम के 20 फीसदी और थाईलैंड के 19 फीसदी से थोड़ा बेहतर जगह देता है। महीनों की अनिश्चितता के बाद ये कंपनियों के प्लानिंग में विश्वास लौटाएगा।”

ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) ने भी इस अंतरिम समझौते का स्वागत किया है। एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और जेके फेनर (इंडिया) के वाइस चेयरमैन विक्रमपति सिंहानिया ने इसे दोनों देशों के बीच मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने का संकेत बताया। 

उन्होंने कहा, “ऑटोमोटिव पार्ट्स के लिए स्पेशल टैरिफ कोटा, चुनिंदा इनपुट्स से सेक्शन 232 टैरिफ्स हटाना और प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत टैरिफ्स को तर्कसंगत बनाने का रास्ता इंडस्ट्री के लिए सही कदम हैं।”

सिंहानिया ने आगे जोड़ा कि ये कदम निर्यात में प्रतिस्पर्धा बढ़ाएंगे, तकनीकी सहयोग को गहरा करेंगे और वैश्विक ऑटो सप्लाई चेन में भारत को भरोसेमंद साथी बनाएंगे। ACMA दोनों सरकारों से आगे भी बातचीत जारी रखने की उम्मीद कर रही है, ताकि बाजार पहुंच संतुलित हो और लंबे समय की नीति में स्थिरता आए।

गौरतलब है कि अमेरिका धीरे-धीरे भारत के ऑटो कंपोनेंट्स का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। वित्त वर्ष 2021 में हमारा एक्सपोर्ट 3.6 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 6.2 अरब डॉलर हो गया। वहीं, अमेरिका से भारत को आने वाला सामान सिर्फ 1.5 अरब डॉलर का है, जिससे इस सेक्टर में भारत का व्यापार सरप्लस साफ नजर आता है। 

ACMA के मुताबिक, 2025 में भारतीय ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री का कुल टर्नओवर 80.2 अरब डॉलर रहा, जिसमें एक्सपोर्ट 22.9 अरब डॉलर और ट्रेड सरप्लस 500 मिलियन डॉलर रहा।

कुछ लोग सावधानी बरत रहे हैं कि असली फायदा अमेरिका की चल रही सेक्शन 232 जांचों के नतीजे पर टिका है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि भारतीय ऑटो पार्ट्स की एक तय मात्रा को कम या शायद जीरो टैरिफ पर एंट्री मिल सकती है, जैसे अमेरिका ने यूरोपीय यूनियन जैसे दूसरे पार्टनर्स के साथ किया है।

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First Published - February 7, 2026 | 3:08 PM IST

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