Data Center Sector: भारत में डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ रहा है, उससे डेटा को सुरक्षित रखने, प्रोसेस करने और तुरंत उपलब्ध कराने की जरूरत भी तेजी से बढ़ी है। ऑनलाइन पेमेंट, ई-कॉमर्स, ओटीटी, क्लाउड सर्विसेज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सरकारी डिजिटल सेवाओं ने डेटा सेंटर को देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना दिया है।
पीएल कैपिटल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजारों में शामिल हो रहा है। देश में डेटा सेंटर की स्थापित क्षमता 2025 में करीब 1,350 मेगावाट थी, जो 2030 तक बढ़कर करीब 4,500 मेगावाट पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि अगले पांच साल में इस सेक्टर में करीब 27 प्रतिशत सालाना दर से वृद्धि हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के डेटा सेंटर सेक्टर में अगले 5 से 6 साल में 20 से 25 अरब डॉलर का निवेश आने की उम्मीद है। वहीं अगले दशक में कुल निवेश 130 से 145 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह निवेश जमीन खरीद, डेटा सेंटर निर्माण, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड रीजन और एआई कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने पर होगा।
अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ओरेकल जैसी बड़ी क्लाउड कंपनियों को हाइपरस्केलर कहा जाता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि भारतीय डेटा सेंटर बाजार में इनकी हिस्सेदारी 2025 में करीब 33 प्रतिशत से बढ़कर 2030 तक करीब 66 प्रतिशत हो सकती है। हाइपरस्केलर क्षमता 2025 में 437 मेगावाट से बढ़कर 2030 तक 2.9 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है।
देशवार Data Center की संख्या (2025)
| देश | डेटा सेंटरों की संख्या |
|---|---|
| अमेरिका | 5,427 |
| जर्मनी | 529 |
| यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) | 523 |
| चीन | 449 |
| कनाडा | 337 |
| फ्रांस | 322 |
| ऑस्ट्रेलिया | 314 |
| नीदरलैंड्स | 298 |
| रूस | 251 |
| जापान | 222 |
| भारत | 153 |
स्रोत: कार्गोसन, उद्योग आंकड़े, पीएल कैपिटल
भारत में डेटा सेंटर क्षमता का बड़ा हिस्सा मुंबई में है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में मुंबई की क्षमता 610 मेगावाट थी, जो कुल क्षमता का 46 प्रतिशत है। इसके बाद चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहर अहम केंद्र बन रहे हैं। नोएडा, विशाखापत्तनम और कोलकाता में भी निवेश बढ़ रहा है।
| देश | डेटा सेंटर निर्माण लागत (मिलियन अमेरिकी डॉलर/मेगावाट) |
|---|---|
| भारत | 6.5 |
| चीन | 9.5 |
| जर्मनी | 10.0 |
| अमेरिका | 11.5 |
| सिंगापुर | 13.5 |
| जापान | 16.0 |
स्रोत: पीएल कैपिटल
भारत में डेटा सेंटर निर्माण की लागत करीब 6.5 मिलियन डॉलर प्रति मेगावाट बताई गई है। यह अमेरिका, जापान, सिंगापुर और कई यूरोपीय देशों की तुलना में कम है। सस्ता श्रम, कम निर्माण लागत, बेहतर बिजली ढांचा और बड़े शहरों में बढ़ते क्लस्टर भारत को डेटा सेंटर निवेश के लिए आकर्षक बना रहे हैं।
भारत में इंटरनेट यूजर बेस तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक देश में इंटरनेट यूजर्स करीब 1 अरब के आसपास पहुंच रहे हैं। मोबाइल डेटा की कीमत भारत में कई देशों के मुकाबले बेहद कम है। सस्ता डेटा, स्मार्टफोन का इस्तेमाल, 4जी और 5जी नेटवर्क, डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी ने डेटा खपत को तेजी से बढ़ाया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कंपनियां तेजी से अपने पुराने ऑन-प्रिमाइस सिस्टम से क्लाउड की ओर जा रही हैं। 2024 में क्लाउड का इस्तेमाल करीब 44 प्रतिशत था, जो 2030 तक 75 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। कंपनियों को क्लाउड में ज्यादा लचीलापन, कम लागत, बेहतर सुरक्षा और आसानी से विस्तार की सुविधा मिलती है।
रिपोर्ट में ऑन-प्रिमाइस और क्लाउड लागत की तुलना भी दी गई है। ऑन-प्रिमाइस सिस्टम में शुरुआती सेटअप, बिजली, कूलिंग, आईटी स्टाफ और रखरखाव पर भारी खर्च होता है। वहीं क्लाउड में पे-एज-यू-गो मॉडल होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, तीन साल में ऑन-प्रिमाइस खर्च 85 से 90 लाख रुपये तक हो सकता है, जबकि क्लाउड खर्च 25 से 30 लाख रुपये तक रह सकता है।
डेटा सेंटर बढ़ने से सिर्फ इमारतें और सर्वर नहीं बनेंगे, बल्कि उनके साथ कई सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी। इनमें क्लाउड मैनेजमेंट, साइबर सुरक्षा, नेटवर्क मॉनिटरिंग, डेटा बैकअप, डिजास्टर रिकवरी, एआई ऑपरेशंस और इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का क्लाउड मैनेज्ड सर्विसेज बाजार 2034 तक करीब 7.3 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसमें 2025 से 2034 के बीच 14.3 प्रतिशत सालाना वृद्धि की उम्मीद है।
जैसे-जैसे कंपनियां क्लाउड और डेटा सेंटर पर निर्भर होंगी, साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डेटा ब्रीच की औसत लागत 2025 में 220 मिलियन रुपये रही। इसलिए बैंकिंग, बीमा, ई-कॉमर्स, हेल्थकेयर, टेलीकॉम और सरकारी सेवाओं में साइबर सुरक्षा पर खर्च बढ़ेगा। भारतीय साइबर सुरक्षा बाजार 2025 में करीब 11.3 अरब डॉलर से बढ़कर 2034 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
भारत में कई सेक्टरों में डेटा को देश के भीतर रखने पर जोर बढ़ रहा है। बैंकिंग में पेमेंट सिस्टम से जुड़ा डेटा भारत में रखना जरूरी है। बीमा कंपनियों को पॉलिसी और क्लेम से जुड़े रिकॉर्ड भारत में रखने होते हैं। सरकारी कंपनियों को सरकार द्वारा मान्य क्लाउड सेवाओं का इस्तेमाल करना होता है। रक्षा क्षेत्र में संवेदनशील डेटा भारत में ही रखने की जरूरत है। इससे स्थानीय डेटा सेंटर की मांग और बढ़ेगी।
भारत में ई-कॉमर्स की पहुंच अभी भी अमेरिका और चीन की तुलना में कम है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ई-कॉमर्स पेनिट्रेशन 2025 में करीब 18 प्रतिशत है, जो 2030 तक 26 प्रतिशत हो सकता है। जैसे-जैसे ऑनलाइन खरीदारी, डिजिटल पेमेंट, लॉजिस्टिक्स और ग्राहक डेटा बढ़ेगा, क्लाउड और डेटा सेंटर की जरूरत भी बढ़ेगी।
भारत का सास बाजार तेजी से बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का सास बाजार 2030 तक 50 अरब डॉलर सालाना आवर्ती आय तक पहुंच सकता है। सास, पास और आईएएस बाजारों में अगले पांच साल में क्रमशः 25 प्रतिशत, 28 प्रतिशत और 23 प्रतिशत सालाना वृद्धि का अनुमान है। इससे जोहो, फ्रेशवर्क्स, चार्जबी, ब्राउजरस्टैक, ड्रुवा जैसी कंपनियों और अन्य भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों को फायदा मिल सकता है।
एआई आधारित सेवाओं के लिए ज्यादा कंप्यूटिंग पावर, जीपीयू, तेज नेटवर्क और बड़े डेटा स्टोरेज की जरूरत होती है। रिपोर्ट के अनुसार, एआई अपनाने से क्लाउड और डेटा सेंटर की मांग और तेज हो सकती है। कंपनियां एआई कोपायलट, ऑटोमेशन, डेटा एनालिटिक्स, एआई सुरक्षा और स्मार्ट वर्कफ्लो जैसे समाधान अपनाने लगी हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय आईटी कंपनियों के लिए घरेलू डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर एक नया लंबी अवधि वाला अवसर बन सकता है। पहले भारतीय आईटी कंपनियों की कमाई ज्यादा तर अमेरिका और यूरोप की आउटसोर्सिंग मांग पर निर्भर थी, लेकिन अब भारत में क्लाउड, सरकारी डिजिटलीकरण, साइबर सुरक्षा, टेलीकॉम आधुनिकीकरण और एआई से नया बाजार बन रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन कंपनियों की भारत में ज्यादा कमाई है और जिनकी क्षमता क्लाउड, साइबर सुरक्षा, टेलीकॉम, एआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूत है, उन्हें ज्यादा फायदा मिल सकता है। इनमें तेजस नेटवर्क्स, एसटीएल नेटवर्क्स, टेक महिंद्रा, एलटीटीएस, टाटा एलेक्सी, न्यूजेन सॉफ्टवेयर और टानला प्लेटफॉर्म्स जैसी कंपनियां शामिल हैं। बड़े आईटी नामों में टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएलटेक और विप्रो भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय आईटी कंपनियां गूगल क्लाउड, अमेजन वेब सर्विसेज, माइक्रोसॉफ्ट और एनविडिया जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ा रही हैं। टीसीएस ने गूगल क्लाउड के साथ एआई आधारित समाधान बढ़ाए हैं। इन्फोसिस ने अमेजन के साथ जेनरेटिव एआई पर काम किया है। माइक्रोसॉफ्ट ने टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो और कॉग्निजेंट के साथ एआई अपनाने के लिए साझेदारी की है। टेक महिंद्रा और विप्रो ने एनविडिया के साथ एआई और डेटा सेंटर समाधान पर काम शुरू किया है।
भारतीय आईटी कंपनियों को देश में बड़े डिजिटल प्रोजेक्ट भी मिल रहे हैं। इन्फोसिस को एलआईसी का नेक्स्ट जेन डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का काम मिला है। एलटीटीएस को महाराष्ट्र साइबर विभाग से साइबर सुरक्षा प्रोजेक्ट मिला है। एलटीआईमाइंडट्री को पैन 2.0 और टैक्स एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म जैसे प्रोजेक्ट मिले हैं। टीसीएस को बीएसएनएल के 4जी नेटवर्क और सॉवरेन क्लाउड से जुड़े काम मिले हैं।
रिपोर्ट का मुख्य संकेत यह है कि डेटा सेंटर को सिर्फ जमीन, सर्वर और बिजली की कहानी नहीं समझना चाहिए। इसके आसपास क्लाउड माइग्रेशन, एआई, साइबर सुरक्षा, सॉफ्टवेयर, मैनेज्ड सर्विसेज, सरकारी डिजिटल सिस्टम, डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स और डेटा लोकलाइजेशन का बड़ा बाजार बनेगा।
अगर अनुमान सही साबित होते हैं, तो भारत अगले दशक में डेटा सेंटर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा वैश्विक केंद्र बन सकता है। कम लागत, बड़ा इंटरनेट यूजर बेस, सस्ता डेटा, बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, सरकारी नीतियां और वैश्विक क्लाउड कंपनियों का निवेश इस ग्रोथ को सहारा दे सकते हैं। इससे आईटी कंपनियों, सॉफ्टवेयर कंपनियों, साइबर सुरक्षा कंपनियों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए लंबे समय तक नए अवसर खुल सकते हैं।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)