पश्चिम एशिया संकट की मार भारत के प्लास्टिक पैकेजिंग उद्योग को झेलनी पड़ रही है। इस संकट के कारण कच्चा तेल महंगा हो गया है। इससे प्लास्टिक पैकेजिंग उद्योग के मार्जिन में गिरावट आ सकती है। यह गिरावट विशेष रूप से लचीली पैकेजिंग, पीईटी बोतलें, एफएमसीजी और खाद्य व पेय उत्पादों में उपयोग होने प्लास्टिक पैकेजिंग उत्पादों पर ज्यादा दिख सकती है क्योंकि इन क्षेत्रों में प्लास्टिक का इस्तेमाल अधिक है और लागत में वृद्धि को ग्राहकों तक पहुंचाने में समय लगता है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) द्वारा कच्चे तेल का प्लास्टिक पैकेजिंग पर प्रभाव के संदर्भ में जारी रिपोर्ट में कहा गया कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर सीधे तौर पर कच्चे तेल आधारित पॉलिमर जैसे पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलीएथीलीन (PE) और PET पर पड़ता है, जिनका उपयोग पैकेजिंग उद्योग में प्रमुख रूप से होता है। इन पॉलिमरों की कीमतें बढ़ने से पैकेजिंग कंपनियों के लिए कच्चे माल की लागत में वृद्धि होती है।
इसके अलावा बढ़ती ऊर्जा लागत, लंबी शिपिंग मार्ग और उच्च बीमा लागतों के कारण पैकेजिंग आपूर्ति श्रृंखला भी महंगी और अप्रत्याशित हो गई है। केयरएज एडवाइजरी के सहायक निदेशक सागर देसाई के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमतें 5 से 10% तक और बढ़ती हैं तो प्लास्टिक पैकेजिंग कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में वित्त वर्ष 27 की पहली छमाही तक 3 से 5% की गिरावट आ सकती है।
Also Read: महिला आरक्षण विधेयक: लोकसभा में बोले पीएम मोदी- ‘राजनीति से ऊपर उठकर लें फैसला’
भारतीय पैकेजिंग बाजार तेजी से बढ़ रहा है और अब यह उद्योगों की मांग को आगे बढ़ाने वाला बड़ा कारक बन चुका है। पैकेज्ड फूड, संगठित रिटेल, लॉजिस्टिक्स और ई-कॉमर्स की बढ़ती गतिविधियों से इस क्षेत्र को मजबूती मिल रही है। केयरएज की इस रिपोर्ट के अनुसार पैकेजिंग उद्योग में प्लास्टिक की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा करीब 46% है। इसकी वजह कम लागत, बहुउपयोगिता और खाद्य पदार्थ, एफएमसीजी व फार्मा सेक्टर में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल है।
अब इस सेगमेंट में धीरे-धीरे बदलाव भी आ रहा है। कंपनियां दोबारा इस्तेमाल होने वाली (रीयूजेबल) और ज्यादा रीसाइकिल सामग्री वाले प्लास्टिक की ओर बढ़ रही हैं। इसकी वजह सख्त नियम, पर्यावरण को लेकर प्रतिबद्धता और बेहतर रीसाइक्लिंग व्यवस्था है। फिर भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है कि उद्योग अब भी कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है क्योंकि देश में प्रमुख पॉलिमर की आपूर्ति मांग के मुताबिक नहीं है। पश्चिम एशिया भारत के लिए कच्चा माल लाने का प्रमुख स्रोत है, जहां से सस्ता और बड़े पैमाने पर सप्लाई मिलती है। लेकिन यह क्षेत्र शिपिंग रूट, कच्चे तेल की कीमतों और गैस आपूर्ति में रुकावट जैसी समस्याओं से प्रभावित हो सकता है।
प्लास्टिक पैकेजिंग उद्योग लगातार बढ़ रहा है। केयरएज के मुताबिक मूल्य के हिसाब से भी प्लास्टिक पैकेजिंग सबसे बड़ा सेगमेंट है। 2025 में इसका बाजार आकार लगभग 3,558 अरब रुपये रहने का अनुमान है, जो 2030 तक बढ़कर 5,169 अरब रुपये तक पहुंच सकता है। यानी इस अवधि में यह क्षेत्र करीब 7.5% सालाना दर से बढ़ेगा। निकट अवधि में पैकेजिंग उद्योग के सामने मांग की कमी नहीं, बल्कि लागत का दबाव बड़ी चुनौती रहेगा।
Also Read: Wipro का ₹15,000 करोड़ का शेयर बायबैक ऐलान, चेक करें प्राइस, रिकॉर्ड डेट समेत पूरी डिटेल
केयरएज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर हो जाती हैं, तो कुछ समय बाद पॉलिमर की लागत भी नरम पड़ सकती है। जिससे मार्जिन में धीरे-धीरे सुधार संभव है। लेकिन यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या और बढ़ती हैं तो इनपुट लागत लगातार ऊंची रहेगी। ऐसे में कंपनियों के लिए ग्राहकों से कीमत बढ़ाने पर सहमति बनाना कठिन हो जाएगा। इसका सबसे ज्यादा असर फ्लेक्सिबल पैकेजिंग, पीईटी और मल्टीलेयर पैकेजिंग पर पड़ेगा। हालांकि पैकेजिंग की मांग स्थिर रहने की उम्मीद है। लेकिन मुनाफा इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को कितनी जल्दी ग्राहकों तक पहुंचा पाती हैं और अपने स्टॉक को कितनी कुशलता से संभालती हैं।
केयरएज के मुताबिक लंबी अवधि में कच्चे माल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव कंपनियों को अपनी सोर्सिंग के स्रोत बढ़ाने, ज्यादा रीसाइकिल सामग्री अपनाने और हल्के वजन वाली पैकेजिंग विकसित करने की दिशा में प्रेरित करेगा ताकि पॉलिमर का उपयोग कम हो सके। बड़ी और एकीकृत (इंटीग्रेटेड) कंपनियां, जिनके पास लंबी अवधि के अनुबंध हैं, ऐसी परिस्थितियों से बेहतर तरीके से निपट सकती हैं। वहीं छोटी कंपनियां, जो स्पॉट मार्केट पर निर्भर हैं, ज्यादा जोखिम में रहेंगी। कुल मिलाकर उद्योग में मांग मजबूत बनी रहेगी। लेकिन यह अब भी कच्चे माल की कीमतों में झटकों के प्रति संवेदनशील रहेगा।