एक तरफ खेतों में हरियाली है, बुवाई बढ़ी है, जलाशय लबालब हैं और फसल की तस्वीर उम्मीद जगाती है, लेकिन दूसरी तरफ एग्रोकेमिकल सेक्टर की हालत उतनी उजली नहीं दिख रही। Nuvama Institutional Equities की रिपोर्ट एक ऐसी कहानी बयां करती है जहां अच्छी खेती के बावजूद कंपनियों के सामने मुश्किलें खड़ी होती नजर आ रही हैं।
रबी सीजन ने इस बार उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है। गेहूं और तिलहन की बुवाई बढ़ी है और कुल रकबा 661 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। ऊपर से जलाशयों का स्तर सामान्य से 26 प्रतिशत ज्यादा है, यानी सिंचाई की कोई कमी नहीं। लेकिन इस मजबूत तस्वीर के बावजूद बाजार में एक अजीब ठहराव दिख रहा है। मांग भले बनी हुई है, लेकिन कंपनियों के पास पहले से ही ज्यादा स्टॉक जमा हो गया है, जो नई बिक्री को धीमा कर रहा है।
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रिपोर्ट साफ कहती है कि चौथी तिमाही में सेक्टर का प्रदर्शन उत्साहजनक नहीं रहेगा। कुछ कंपनियां जैसे शारदा क्रॉपकेम बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं, लेकिन ज्यादातर घरेलू एग्रोकेमिकल कंपनियों के लिए तस्वीर कमजोर ही दिख रही है। UPL का प्रदर्शन स्थिर रह सकता है, जबकि धनुका, रैलिस और सुमितोमो जैसी कंपनियां दबाव में रह सकती हैं। पीआई इंडस्ट्रीज के लिए भी हालात आसान नहीं दिखते।
वैश्विक तनाव के कारण कच्चे माल की कीमतें बढ़ रही हैं और कंपनियां कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। मार्च में डिस्ट्रीब्यूटर्स ने पहले से ज्यादा खरीदारी की, लेकिन इसका फायदा अभी सीमित है। असली असर तब दिखेगा जब कंपनियां नई कीमतों को बाजार में लागू करेंगी, यानी आने वाले महीनों में।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि चुनौतियां यहीं खत्म नहीं होतीं। चीन में ज्यादा उत्पादन, वैश्विक मांग की कमजोरी और संभावित एल नीनो का खतरा मिलकर सेक्टर पर और दबाव बना सकते हैं। यानी आने वाला समय आसान नहीं है।
सबसे ज्यादा चिंता खाद कंपनियों को लेकर है। कच्चे माल की कमी, खासकर सल्फर और अमोनिया की, इनके लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में सरकार की सब्सिडी नीति पर नजरें टिकी रहेंगी।