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पहले टैरिफ और अब युद्ध, मंद पड़ी सूरत के हीरे की चमक

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अमेरिकी टैरिफ, पश्चिम एशिया के युद्ध और बदलती मांग के कारण सूरत का हीरा उद्योग दबाव में है।

Last Updated- March 13, 2026 | 9:07 AM IST
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Representational Image

जिस तरह 1940 के दशक में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान देश के रत्न-पॉलिशिंग क्षेत्र ने अपना रूप बदला था, आज वही स्थिति पुन: दिख रही है। कारोबार को गति देने के लिए पॉलिशिंग कारीगरों ने पारंपरिक रूप से हीरे तराशने के बजाय लैब का रुख कर लिया है।
विश्व युद्ध की स्थिति से बदले हीरा कारोबार के स्वरूप पर सैम डेलरिम्पल ने अपनी पुस्तक ‘शैटर्ड लैंड्स: फाइव पार्टिशन्स ऐंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न एशिया’ में लिखा है कि युद्ध अर्थव्यवस्था में तेजी आने और कारखानों के रोजगार में एक तिहाई की वृद्धि होने के साथ कीमती पत्थरों को चमकाने में लगे कारीगरों ने पाया कि इसी कौशल का उपयोग तो स्नाइपर-स्कोप लेंस बनाने में भी किया जा सकता है। और, चीजें बदल गईं। ठीक उसी तरह की स्थिति लगभग आठ दशक के लंबे अर्से बाद आज हीरा पॉलिशिंग कारोबार में है।
इस क्षेत्र में भारत का प्रभुत्व है और गुजरात का सूरत शहर इस काम का गढ़ बन चुका है। आज देशभर में तराशे जाने वाले 10 हीरों में 9 पर सूरत की मुहर होती है। लेकिन पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध और अमेरिकी टैरिफ के आर्थिक हमले ने द्वितीय विश्व युद्ध की यादें ताजा कर दी हैं और कारिगरों के समक्ष फिर वही चुनौती आ खड़ी हुई है। उद्योग इस समय एक संरचनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

अब हीरे लैब में अधिक तैयार किए जा रहे हैं, जो प्राकृतिक महंगे पत्थरों हीरो का सस्ता विकल्प बन कर उभर रहे हैं। इस पर आम तौर पर छोटे आधार मूल्य के कारण कम टैरिफ लगता है। सूरत में हीरा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का अनुमान है कि हीरे की पॉलिशिंग का लगभग 80 प्रतिशत काम अब लैब में हो रहा है। लैब में कारोबार सिमटने का व्यापक असर भी हुआ है। इससे बड़े स्तर पर लोगों की नौकरियां चली गईं। कार्यशील पूंजी की किल्लत हो गई और नतीजतन ऑर्डर कम मिलने लगे हैं।

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने हीरा कारोबारियों में अलग तरह की बेचैनी पैदा कर दी है। वैश्विक स्तर पर हीरा व्यापार के प्रमुख केंद्र संयुक्त अरब अमीरात ने चालू वित्त वर्ष में 7.67 अरब डॉलर के भारतीय हीरों का आयात किया है। यह इस वर्ष सबसे बड़ा निर्यात केंद्र बन कर उभरा है, लेकिन सैन्य संघर्ष से निर्यातकों की चिंता बढ़ रही है।

जमीनी हकीकत क्या है

परेशभाई पटेल (अनुरोध पर बदला गया नाम) वर्षों से घड़ी की सुई की तरह पूरे अनुशासन के साथ अपनी छोटी हीरा-पॉलिशिंग इकाई चला रहे हैं। उनकी यूनट में 50 श्रमिक काम करते हैं और वह हमेशा मुंबई स्थित एक ही निर्यातक को माल आपूर्ति कर रहे हैं, लेकिन हाल ही में उनकी यह कार्यशाला अचानक शांत हो गई।

मार्कीज-कट पत्थर एक कार्यकर्ता के हाथ से फिसलकर पूरे फर्श पर बिखर गया और उछलकर धूल में गायब हो गया। मिनटों में लगभग दो दर्जन आदमी कंक्रीट के फर्श को इंच-इंच कर स्कैन करते हुए घुटनों के बल बैठे थे, ताकि हीरा मिल जाए।

फर्श से गायब हुए लैब में बने हीरे की कीमत उद्योग मानकों के अनुसार मुश्किल से 40,000 रुपये होगी। अब सवाल उठता है कि हीरा तलाशने का काम तो शिफ्ट के अंत में भी किया जा सकता था, क्यों वक्त बरबाद किया, लेकिन ऑर्डर कम होने और कर्मचारियों के तेजी से खाली होते जाने से समय की कीमत पत्थर से कम हो गई है।

दिखने लगा है असर

पटेल बताते हैं, ‘उम्मीद थी कि दीवाली के बाद सीजन बेहतर चलेगा। मैं अमूमन अपने कर्मचारियों को काम से निकालता नहीं हूं, क्योंकि दोबारा कुशल कारीगर ढूंढना मुश्किल होता है। अब कोई बैंक मदद करने को तैयार नहीं है। मुझे निर्यातक-साझेदार को भुगतान करना है। साथ ही कर्मचारियों को वेतन देना है। यदि मैं उन्हें पैसा नहीं देता हूं तो उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं रहेगा। पटेल की कहानी सूरत में फैले इस हीरा उद्योग की स्थिति की एक झलक भर है। रत्न, हीरे और आभूषण जैसे भारतीय निर्यात पर टैरिफ लगाए जाने के बाद से इस क्षेत्र को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। जेम ऐंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका को भारत के रत्न और आभूषणों का निर्यात 44.42 प्रतिशत गिर गया है, जो 8.69 अरब डॉलर से घटकर 3.86 अरब डॉलर पर आ गया है।

बदलाव की सख्त जरूरत

शुल्क लगाने के लगभग छह महीने बाद बीते फरवरी में अमेरिका ने कहा कि वह भारत पर शुल्क में ढील देगा। रत्नों और आभूषणों पर प्रभावी टैरिफ लगभग 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो जाने की उम्मीद थी जबकि आभूषणों में नहीं गढ़े गए ढीले हीरों पर टैरिफ शून्य तक गिरने की उम्मीद थी।
इंडियन डायमंड इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष दिनेश नावडिया ने कहा, ‘एक साल पहले की तुलना में अब कारोबार करना निश्चित रूप से आसान होगा। टैरिफ की 15 या 18 प्रतिशत की दर 50 प्रतिशत से तो काफी कम है। टैरिफ कम होने से प्राकृतिक हीरों की मांग भी बढ़ेगी।’

निर्यातक और पॉलिशर अब यह इंतजार कर रहे हैं कि पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध और टैरिफ अनिश्चितता के कारण उद्योग क्या रुख लेता है। अनुभवी निर्यातक उद्योग से जुड़े लोगों से आग्रह कर रहे हैं कि वे फौरी तौर पर होने वाले नुकसान को वहन करें और मार्जिन बढ़ने से पहले ही इन्वेंट्री निकाल दें। शहर के एक अनुभवी हीरा निर्यातक कीर्तिलाल शाह ने कहा, ‘बाजार में अस्थिरता के कारण स्थानीय कारोबार लगभग 80 प्रतिशत तक ठप हो गया है। आज कोई ऑपरेटर खेप पर 10 प्रतिशत की घटौती के डर से माल नहीं बेच सकता। यह बहुत जरूरी है कि किसी न किसी तरह माल बेचकर नुकसान की भरपाई हो जाए। कारोबार जारी रखने के लिए कम से कम कुछ पूंजी तो आएगी।’

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First Published - March 13, 2026 | 9:07 AM IST

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