पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का सीधा असर भारतीय उद्योगों पर पड़ रहा है। खासकर पंजाब के हैंडटूल क्लस्टर और दूसरे एक्सपोर्ट वाले कारोबारियों को कई मोर्चों पर दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं। मजदूरों की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, गैस की कमी और शिपिंग-बीमा की महंगाई ने उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। कंपनियां बस यही उम्मीद कर रही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच घोषित 15 दिन के सीजफायर से लड़ाई थम जाए और हालात सुधरें।
लुधियाना एक्सपोर्ट क्लस्टर में काम करने वाली हैंडटूल कंपनियों में अभी मजदूरों की भारी कमी है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन्स (FIEO) के अध्यक्ष एस सी रल्हान, जो खुद लुधियाना में हैंडटूल यूनिट चलाते हैं, बताते हैं कि होली मनाने उत्तर प्रदेश और बिहार गए मजदूर अभी तक वापस नहीं लौटे। कंपनियां उनसे फोन पर संपर्क कर रही हैं, लेकिन रिवर्स माइग्रेशन की वजह से काम रुक रहा है।
उन्होंने कहा, “मजदूरों को चिंता है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण LPG सिलेंडर मिलने में भी दिक्कत आ सकती है, जिसके चलते उन्हें यहां खाने-पीने लकी दिक्कत हो सकती है।”
रल्हान कहते हैं कि कंपनियां खुद मजदूरों के लिए हाउसिंग बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सरकार की मदद बहुत जरूरी है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि यूनिट्स को इस काम में सपोर्ट मिले तो बहुत फायदा होगा।
केवल मजदूर ही नहीं, कच्चे माल की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। ईस्टमैन कास्ट एंड फॉर्ज लिमिटेड के हैंडटूल यूनिट के हेड संजू तंडन बताते हैं कि स्टील, पैकिंग मटेरियल और निकेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। स्टील तो 10-15 प्रतिशत महंगा हो चुका है। मार्च में इनपुट की महंगाई और फ्रेट बढ़ने की वजह से निर्यात 5-10 प्रतिशत तक घट गया। गैस की सप्लाई ठीक से नहीं मिल रही, इसलिए कंपनी फर्नेस ऑयल जैसे अल्टरनेटिव ईंधन का इस्तेमाल कर रही है। तंडन कहते हैं कि कीमतें जल्दी कम होने वाली नहीं लगतीं।
Also Read: LPG की किल्लत और कच्चे माल के बढ़ते दाम: दक्षिण एशिया के सबसे बड़े लघु उद्योग हब में मंदी की आहट
हीरो इकोटेक लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर गौरव मुंजल भी यही दिक्कत बता रहे हैं। उनके मुताबिक इंडस्ट्रियल गैस बिल्कुल नहीं मिल रही, इसलिए डीजल का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। प्लास्टिक और रबर की कीमतें बढ़ने से प्रोडक्शन कॉस्ट 10-15 प्रतिशत तक चढ़ गई है। सामान्य गर्मियों में भी कीमतें थोड़ी बढ़ती हैं, लेकिन इस बार उसमें अतिरिक्त 4-5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर संयुक्त हमले के बाद पश्चिम एशिया का रास्ता बिल्कुल बाधित हो गया। शिपिंग फ्रेट, एयर ट्रांसपोर्ट और बीमा की लागत आसमान छू रही है। कंटेनर बंदरगाहों पर फंस गए हैं या समुद्र में ही अटके पड़े हैं। तंडन कहते हैं कि हैंडटूल के कुल निर्यात में करीब 10 प्रतिशत हिस्सा UAE का है, लेकिन मार्च में मिडिल ईस्ट इलाके में एक भी शिपमेंट नहीं गया। दुबई से अफ्रीका जैसे इलाकों में री-एक्सपोर्ट होता था, वो भी प्रभावित हो गया।
बासमती राइस एक्सपोर्ट करने वाली DRRK फूड्स के असिस्टेंट डायरेक्टर (सेल्स एंड मार्केटिंग) विरेन मरवा कहते हैं कि मार्च में UAE, कतर और ओमान जैसे बड़े बाजारों में निर्यात पूरी तरह रुक गया। शिपिंग कंपनियां उस इलाके के लिए सर्विस ही नहीं दे रही हैं। नतीजा, शिपमेंट में 20-25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई। हालांकि उनके यहां मजदूरों की कोई कमी नहीं है।
ईवलिन इंटरनेशनल के डायरेक्टर दीपक दुमरा कहते हैं कि पहले अमेरिकी टैरिफ और अब यह युद्ध, दोनों ने कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऑर्डर होल्ड पर हैं और हर तरफ अनिश्चितता का माहौल है। वे उम्मीद जता रहे हैं कि आने वाले महीनों में हालात संभल जाएंगे।
अधिक ब्याज दरें, कंटेनर की कमी और एयर फ्रेट की बढ़ी हुई लागत जैसी और समस्याएं भी निर्यातकों को परेशान कर रही हैं। कंपनियां बस सीजफायर के असर का इंतजार कर रही हैं ताकि शिपमेंट फिर से सुचारू रूप से शुरू हो सकें।
(PTI के इनपुट के साथ)