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पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलसा हावड़ा का फोर्जिंग उद्योग, निर्यात ठप; उत्पादन में 30% की गिरावट

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पश्चिम एशिया युद्ध और गैस की कमी के कारण हावड़ा के प्रसिद्ध फाउंड्री और फोर्जिंग उद्योग में उत्पादन ठप हो गया है, जिससे हजारों श्रमिकों की कमाई प्रभावित हुई है

Last Updated- April 06, 2026 | 10:40 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

करीब 75 साल के दिनेश सेकसरिया बीते गुरुवार को जल्दी उठ गए ताकि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्र के नाम संबोधन को सुन सकें। उन्हें उम्मीद थी कि ट्रंप पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष को समाप्त करने की घोषणा करेंगे। मगर दुनिया भर में इसे देख रहे कई अन्य लोगों की तरह उद्यमी सेकसरिया ने भी महसूस किया कि शांति की प्रतीक्षा अभी बहुत लंबी है और व्यापार सामान्य होना अभी दूर की कौड़ी है।

सेकसरिया दिनेश ब्रदर्स और गोविंद स्टील नाम से दो फाउंड्री के मालिक हैं। वह इस उम्मीद में हर दिन अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान को ध्यान से सुनते हैं और सोशल मीडिया अपडेट को देखते हैं कि संघर्ष के समाप्त होने का कोई संकेत मिल सके। हावड़ा के अपने कारखाने में उमस भरी दोपहर को युद्ध का प्रभाव उनके कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई दे रहा था। वह मॉनिटर की ओर इशारा करते हैं जिसमें दिखाया गया था कि पश्चिम एशिया के लिए भेजे जा रहे मैनहोल कवर वाले उनके दो कंटेनर मुंद्रा बंदरगाह लौट आए हैं जबकि एक अन्य कोलंबो में है।

उन्होंने कहा, ‘हम अभी भी उम्मीद कर रहे हैं कि चीजें कुछ हफ्तों में ठीक हो जाएंगी और हमें इस माल को कोलकाता वापस नहीं लाना पड़ेगा।’ अमेरिका और यूरोप के लिए भेजे गए माल जा रहे हैं लेकिन उसकी लागत काफी ज्यादा बढ़ गई है।

फैक्टरी के शॉप फ्लोर पर अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के हमले को कई तरह से महसूस किया जा सकता है। पश्चिम एशिया को निर्यात ठप हो गया है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट के आसपास तनाव शिपिंग मार्गों को बाधित कर रहा है जबकि गैस की कमी के कारण उत्पादन में कटौती करनी पड़ी है।

सेकसरिया कहते हैं, ‘बरसात के मौसम में इसका प्रभाव और भी बुरा होगा। उत्पादन लगभग 30 फीसदी तक गिर सकता है क्योंकि मोल्ड को सूखने में अधिक समय लगता है।’

दिनेश ब्रदर्स की इकाई फाउंड्री पार्क में है जो पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े औद्योगिक पार्कों में से एक है। यह कोलकाता से करीब 36 किलोमीटर दूर हावड़ा में रानीहाटी-अमता रोड पर 900 एकड़ से अधिक में फैला है। यहां कुछ इकाइयां चालू हैं, जबकि अन्य अभी भी बन रही हैं। यह पार्क पश्चिम बंगाल के फाउंड्री और फोर्जिंग केंद्र हावड़ा बेल्ट में स्थित है और इस उद्योग की राज्य में लगभग 500 इकाइयों में से 95 फीसदी यहीं हैं।

हावड़ा बेल्ट की लौह और इस्पात उत्पाद इकाइयां भारतीय रेलवे, घरेलू बाजार और दुनिया भर के ग्राहकों को माल की आपूर्ति करती हैं, जिनमें मैनहोल कवर उनके मुख्य उत्पादों में से एक है।

फाउंड्री पार्क से कुछ किलोमीटर आगे बनारस रोड है जहां कई वर्कशॉप हैं लेकिन यहां की कहानी भी काफी हद तक ऐसी ही है।

विदित समूह से जुड़े और फाउंड्री क्लस्टर डेवलपमेंट एसोसिएशन (एफसीडीए) के संयुक्त चेयरमैन विजय एस बेरीवाल का कहना है कि पूरा उद्योग परेशान है। एफसीडीए एक विशेष उद्देश्यीय कंपनी है जिसे इंडस्ट्री के हितधारकों ने फाउंड्री पार्क परियोजना को लागू करने के लिए बनाया है।

कुल मिलाकर हीट ट्रीटमेंट और फैब्रिकेशन के काम में लगी इकाइयां गैस की कमी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। बेरीवाल ने कहा, ‘कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और शिपिंग की ज्यादा लागत उद्योग के नुकसान को और बढ़ा रही है।’ उन्होंने कहा कि अगर यह स्थिति अगले 15 से 20 दिनों तक बनी रही तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

बेरीवाल की एक इकाई भारतीय रेलवे के लिए फैब्रिकेशन का काम करती है। उन्होंने कहा, ‘हमने अपना काम धीमा कर दिया है। गैस पर चलने वाला पाउडर कोटिंग प्लांट अब हफ्ते में तीन दिन चलता है और दो दिन बंद रहता है। उत्पादन करीब 15 से 20 फीसदी घट गया है।’

जेपीके मेटेलिक्स के कैलाश अग्रवाल ने कहा कि उत्पादन में 10 से 15 फीसदी की कटौती हुई है। उन्होंने कहा, ‘मैनुअल मोल्डिंग लाइन पर उत्पादन कम हुआ है। पश्चिम एशिया को निर्यात बंद होने की वजह से हमारा एक कंटेनर विशाखापत्तनम से वापस आ रहा है। लेकिन हमें कारखाना  चालू रखना है क्योंकि कारोबार में उतार-चढ़ाव तो होता रहता है।’

घरेलू बाजार में अपने उत्पादों की बिक्री करने वाली एक अन्य इकाई के मालिक ने बताया कि उनका काम भी धीमा पड़ गया है। उन्होंने कहा, ‘पूरी आपूर्ति श्रृंखला में सुस्ती छाई हुई है। बड़े प्लांट और कंपनियां अपने काम को पूरा करने में दिक्कतों का सामना कर रही हैं क्योंकि कटिंग और वेल्डिंग का काम कम हो गया है।’

बनारस रोड से सटे बाल्टिकुरी औद्योगिक क्षेत्र में स्थित एक हीट ट्रीटमेंट प्लांट एपटेक एंटरप्राइजेज में इसका असर साफ दिखाई देता है।

एपटेक स्टील की गैस-आधारित हार्डनिंग और टेम्परिंग करती है। कंपनी ने कहा कि उसके कारोबार में 70 से 80 फीसदी की कमी आई है। विशेषीकृत स्टील ग्रेड के ऐसे ही एक आपूर्तिकर्ता का कहना है कि उसका उत्पादन 25 से 30 फीसदी कम हो गया है, जिसका मुख्य कारण एपटेक में मंदी है। असल में एपटेक बड़े स्टील संयंत्रों को माल की आपूर्ति करती है।

बाल्टिकुरी औद्योगिक परिसर में ज्यादातर इंजीनियरिंग और फैब्रिकेशन इकाइयां हैं और गैस की कमी का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न असर महसूस किया जा रहा है। यहां के श्रमिकों पर भी इसका असर पड़ रहा है।

हावड़ा की औद्योगिक इकाइयों में बड़े पैमाने पर ठेके के श्रमिक होते हैं और उनके लिए ओवरटाइम प्रमुख लाभ है। काम धीमा होने से श्रमिकों की कमाई भी प्रभावित हो रही है।

बाल्टिकुरी के श्रमिक बताते हैं कि शिफ्ट में आम तौर पर 12 से 13 घंटे लगते हैं, जिसमें आठ घंटे के बाद ओवरटाइम शुरू होता है। अब काम के घंटे कम हो गए हैं। गैस कटाई में लगे लोगों की स्थिति तो और भी खराब है।

उद्योग के अनुमान के अनुसार हावड़ा की फाउंड्री इकाइयों द्वारा सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 40,000 से 45,000 लोगों को रोजगार मिला है। सहायक इकाइयों को मिलाकर यह संख्या 90,000 के करीब हो सकती है। फिलहाल, वे इस उम्मीद पर हैं कि बंगाली नववर्ष और विधान सभा चुनाव नजदीक होने के कारण मालिक छंटनी जैसे सख्त कदम नहीं उठाएंगे।

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First Published - April 6, 2026 | 10:07 PM IST

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