सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का राजेश एक्सपोर्ट्स में किया गया निवेश अब जांच के दायरे में आ गया है। यह स्थिति भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के उस अंतरिम आदेश के बाद पैदा हुई है, जिसमें राजेश एक्सपोर्ट्स पर बड़े पैमाने पर वित्तीय आंकड़ों की गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगा है। इस घटना से संस्थागत जांच-परख और कारोबार संचालन के मानकों को लेकर नए सवाल खड़े होते हैं।
मार्च 2026 तक राजेश एक्सपोर्ट्स में एलआईसी की 10.8 फीसदी हिस्सेदारी थी और वह कंपनी की सबसे बड़ी सार्वजनिक शेयरधारक बनी हुई है। राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर में लंबे समय से आ रही गिरावट और बढ़ती नियामकीय चिंता के बावजूद इस आभूषण निर्यातक के शेयरों में सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी का लगातार निवेश गवर्नेंस विशेषज्ञों और निवेशकों की आलोचना का कारण बना है।
इस बारे में जानकारी के लिए एलआईसी को ईमेल किया गया मगर खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।
राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर में 5 फीसदी का निचला सर्किट लगा और यह 105 रुपये पर बंद हुआ। कंपनी का मूल्यांकन अब लगभग 3,090 करोड़ रुपये है। इस साल इसका बाजार पूंजीकरण 40 फीसदी से ज्यादा घटा है और फरवरी 2023 के अपने उच्चतम स्तर से इसमें करीब 90 फीसदी की गिरावट आई है।
ये घटनाक्रम सेबी के 109 पृष्ठों के अंतरिम आदेश के बाद सामने आए हैं। अपने आदेश में बाजार नियामक ने राजेश एक्सपोर्ट्स के वित्तीय विवरणों में 15.15 लाख करोड़ रुपये की गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगाया गया है, जो कंपनी द्वारा दर्ज की गई आय का लगभग 99 फीसदी है। नियामक ने कथित गलतबयानी को ‘अभूतपूर्व’ बताया और आगे की जांच पूरी होने तक राजेश एक्सपोर्ट्स के प्रवर्तक और कार्यकारी चेयरमैन राजेश मेहता पर कंपनी की प्रतिभूतियों में खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी।
इस बीच राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के आरोपों से अपना बचाव करने की कोशिश की। मेहता ने दावा किया कि कंपनी ने बाजार नियामक को 400 जीबी से ज्यादा डेटा और जानकारी साझा की थी और इस विवाद की वजह जानकारी जमा करने को लेकर हुई ‘संवाद में कमी’ और ‘गलतफहमी’ बताई।
मेहता ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘हमने बाजार नियामक के साथ 400 जीबी से ज्यादा डेटा और जानकारी साझा की है। हमने ज्यादातर जानकारी पहले ही दे दी है लेकिन ऐसा लगता है कि बातचीत में कोई कमी या गलतफहमी है। हम सेबी के साथ इस मामले को स्पष्ट करेंगे और सभी जरूरी दस्तावेज फिर से भेजेंगे। हमें पूरा भरोसा है कि इससे यह मामला साफ हो जाएगा।’
प्रॉक्सी सलाहकार फर्मों ने कहा है कि यह घटना सार्वजनिक बचत का प्रबंधन करने वाले संस्थानों द्वारा अपनाई जाने वाली निवेश प्रक्रियाओं के बारे में सवाल उठाती है।
इनगवर्न रिसर्च सर्विसेज के संस्थापक और प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमण्यन ने कहा, ‘एलआईसी पर अपने पॉलिसीधारकों के प्रति बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। निवेश करने से पहले उसे सख्त फोरेंसिक लेखा परीक्षा और उचित जांच करनी चाहिए।’
विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थागत निवेशकों को नियामक कार्रवाई का इंतजार करने के बजाय जब भी लेखांकन में अनियमितताओं के विश्वसनीय प्रमाण सामने आएं, अपनी शेयरधारिता का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। एलआईसी के अलावा राजेश एक्सपोर्ट्स में मॉरीशस की ब्रिज इंडिया फंड की मार्च 2026 तक 8.46 फीसदी हिस्सेदारी थी।
रजनी एसोसिएट्स में मैनेजिंग पार्टनर प्रेम रजनी ने कहा, ‘सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के मामले में, जो सार्वजनिक धन का प्रबंधन करते हैं और आम तौर पर मजबूत निवेश समितियों और निरीक्षण तंत्र रखते हैं, उनसे बड़े निवेश पर अतिरिक्त सतर्कता की उम्मीद की जा सकती है।’
राजेश एक्सपोर्ट्स का तर्क है कि किसी सूचीबद्ध कंपनी के लिए मुनाफे को जस का तस रखते हुए अपनी आमदनी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का कोई खास फायदा नहीं होगा क्योंकि ऐसा करने से उसके मार्जिन पर दबाव पड़ेगा। कंपनी ने कहा कि वह सेबी के साथ सहयोग करती रहेगी और इस मामले के समाधान के लिए अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध कराएगी। कंपनी के खातों को लेकर 2023 में भी सवाल उठे थे। उस समय नैशनल स्टॉक एक्सचेंज ने कुछ निवेश और नकदी प्रवाह के बारे में कंपनी से जानकारी मांगी थी। इसके बाद 2024 में शेयरधारकों ने सेबी में शिकायतें दर्ज कराई थीं।