भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी शेयर बाजार पर अपनी पकड़ को म्युचुअल फंड उद्योग के हाथों गंवा रही है। प्राइमइन्फोबेस डॉट कॉम के अनुसार मार्च 2012 में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के पास सार्वजनिक ट्रेडिंग (फ्री-फ्लोट) के लिए उपलब्ध सभी सूचीबद्ध शेयरों के मूल्य का करीब 10वां हिस्सा था। मार्च 2026 तक यह 10.67 फीसदी हिस्सा घटकर 7.42 फीसदी रह गया है। 2012 में म्युचुअल फंड उद्योग का हिस्सा कम यानी 7.06 फीसदी रहा था, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 22.92 फीसदी हो गया। यह लगातार 5वां साल है, जब यह अंतर और बढ़ गया है।
कंपनियां नतीजों के सीजन के दौरान शेयरधारिता के पैटर्न जारी करती हैं। इस समय यह सीजन चल रहा है। किसी कंपनी में 1 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वालों के नाम इन खुलासों का हिस्सा होते हैं। एलआईसी की हिस्सेदारी वाली कंपनियों के शेयरधारिता पैटर्न इन्हीं खुलासों पर आधारित होते हैं। जाहिर है इससे सिर्फ घोषित पोर्टफ़ोलियो का पता चलता है। लेकिन इसमें ज्यादातर बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं। इसे मोटे तौर पर रुझान का संकेत माना जा सकता है। म्युचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो हर महीने घोषित किए जाते हैं।
प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया ने कहा, म्युचुअल फंडों का बढ़ता दबदबा देखते हुए कुल हिस्सेदारी कम हो गई है। जब तक खुदरा निवेशकों का पैसा आता रहेगा, तब तक यह रुझान कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। उन्होंने बताया कि भले ही म्युचुअल फंड उद्योग कुल मिलाकर काफी बड़ा हो गया हो, लेकिन एलआईसी अब भी सबसे बड़ी अकेली परिसंपत्ति प्रबंधक बनी हुई है और वह भी काफी बड़े अंतर से। उसकी इक्विटी परिसंपत्तियां सबसे बड़े म्युचुअल फंड की परिसंपत्तियों से कम से कम दोगुनी हैं।
हल्दिया ने कहा, आमतौर पर यह देखा जाता है कि जब भी कोई मुश्किल आती है तो संस्थागत निवेशक शेयरों से बाहर निकल जाते हैं। हालांकि, म्युचुअल फंडों के विपरीत एलआईसी पर रीडम्पशन का वैसा दबाव या खुलासे की वैसी बाध्यता नहीं होती। उदाहरण के लिए म्युचुअल फंडों को हर महीने अपने पूरे पोर्टफोलियो का एक-एक रुपये तक का ब्योरा सार्वजनिक करना पड़ता है। लेकिन हल्दिया के अनुसार एलआईसी के पोर्टफोलियो की जानकारी के लिए उन कंपनियों की ओर से दाखिल शेयरधारिता पैटर्न को देखना पड़ता है, जिनमें एलआईसी की हिस्सेदारी है।
उपलब्ध जानकारी के आधार पर एलआईसी की होल्डिंग्स की कुल कीमत 15.11 लाख करोड़ रुपये है। सबसे बड़ी होल्डिंग रिलायंस (1.2 लाख करोड़ रुपये) में है। इसके अलावा, भारतीय स्टेट बैंक, लार्सन ऐंड टुब्रो, आईटीसी और इन्फोसिस में भी उसकी 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की हिस्सेदारी है। दिलचस्प बात यह है कि सबसे छोटी हिस्सेदारी उन कंपनियों में है, जिनका बाजार पूंजीकरण 100 करोड़ रुपये से कम है।
इनमें सबसे छोटी कंपनी ब्लू ब्लेंड्स (इंडिया) है, जिसका बाजार पूंजीकरण 1.7 करोड़ रुपये था। इसमें एलआईसी की हिस्सेदारी कंपनी का 1.4 फीसदी यानी 3 लाख रुपये से भी कम थी। कम से कम सात ऐसी कंपनियां थीं, जिनका कुल बाजार पूजीकरण 100 करोड़ रुपये से कम था। इनमें से दो (ब्लू ब्लेंड्स और जेबीएफ इंडस्ट्रीज) को एक्सचेंजों ने नियामकीय या प्रक्रिया संबंधी नियमों का पालन न करने के कारण ट्रेडिंग से निलंबित कर दिया है। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता है कि एलआईसी बहुत फुर्तीली है।
वैल्यू रिसर्च के मुख्य कार्याधिकारी धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि एलआईसी को अपनी कई होल्डिंग से बाहर निकलने में सचमुच मुश्किल होती है। इनमें से कई शेयर इतने छोटे और इतने कम लिक्विड हैं कि उनकी कीमत में बदलाव हुए बिना उन्हें बेचना मुमकिन नहीं है। असली मुद्दा ढांचागत है। एलआईसी सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था है। पोर्टफोलियो से जुड़ा कोई भी बड़ा फ़ैसला अगर बाद में गलत साबित होता है तो उसकी जांच-पड़ताल और छानबीन हो सकती है। इसलिए, अधिकारी कोई कदम उठाने के बजाय सावधानी बरतना ज्यादा पसंद करते हैं।
निजी म्युचुअल फंडोंपर ऐसी कोई पाबंदी नहीं होती। वे लगातार सार्वजनिक खुलासों और बाजार की कड़ी निगरानी में काम करते हैं। इस कारण वे अपनी पोजीशनें ज्यादा तेज़ी से ठीक कर पाते हैं। एलआईसी 70 साल से भी ज्यादा समय से निवेश कर रही है, जो कि पूरे म्युचुअल फ़ंड उद्योग के कुल समय से भी ज्यादा है। इतने पुराने किसी परिसंपत्ति प्रबंधक के पास बहुत बड़ी संख्या में कंपनियों में छोटे-छोटे बचे हुए हिस्से धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं।
कुमार ने कहा, इनसे बाहर निकलना न तो तेज है और न ही आसान। 6 मई को एलआईसी को भेजे गए एक ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला। इस बीच, मार्च में म्युचुअल फंडों में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिये 32,087 करोड़ रुपये का निवेश आया। महामारी के बाद से म्युचुअल फंडों की परिसंपत्तियां तीन गुना बढ़कर मार्च 2026 तक 79 लाख करोड़ रुपये हो गई हैं।