Real Estate-Land deal boom: रियल एस्टेट में जमीन सौदों के मामले इस साल की शुरुआत भी अच्छी रही। पिछला साल भी इन सौदों के लिए काफी अच्छा रहा था। जमीन के सौदों में टियर-1 शहरों का दबदबा है। लेकिन उभरते शहरी केंद्र यानी टियर-2 व 3 भी तेजी से ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। जमीन सौदों में आवासीय क्षेत्र का दबदबा बना हुआ है। बिल्डरों द्वारा खरीदी गई परियोजनाओं के निर्माण में हजारों करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है।
संपत्ति सलाहकार फर्म जेएलएल के मुताबिक पिछले साल जमीन सौदों की मजबूत रफ्तार 2026 में भी जारी रही। 2026 की पहली तिमाही में प्रमुख बाजारों में लगभग 900 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ, जिसकी कीमत करीब 18,000 करोड़ रुपये आंकी गई। यह डेवलपर के मजबूत भरोसे और जमीन की सतत मांग को दर्शाता है।
जेएलएल इंडिया में सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर एवं हेड (कैपिटल मार्केट्स) लता पिल्लई ने कहा कि 2025 भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए रिकॉर्ड तोड़ वर्ष रहा है। यही रफ्तार 2026 में भी जारी है, जहां पहली तिमाही में ही प्रमुख बाजारों में लगभग 900 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हो चुका है।
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जेएलएल के अनुसार मुंबई महानगरीय क्षेत्र (एमएमआर) में 2026 की पहली तिमाही का देश का सबसे बड़ा जमीन सौदा दर्ज हुआ, जहां 11 एकड़ का भूखंड 5,400 करोड़ रुपये (करीब 490 करोड़ रुपये प्रति एकड़) में बिका। यह उच्च मूल्य वाले शहरी केंद्रों में निवेशकों की मजबूत रुचि और अगले विकास चरण को गति देने वाली क्षमता को रेखांकित करता है।
जेएलएल के मुताबिक भारत का रियल एस्टेट क्षेत्र एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया है। वर्ष 2025 में डेवलपरों ने 149 सौदों के जरिए 3,093 एकड़ से अधिक जमीन खरीदी, जिनकी कुल कीमत 54,818 करोड़ रुपये रही। यह इससे पिछले वर्ष की तुलना में 32% की वृद्धि है। जेएलएल के अनुसार इस जमीन पर अगले दो से पांच वर्षों में लगभग 22.9 करोड़ वर्गफुट निर्माण संभावित है।
वर्ष 2025 में खरीदी गई इन जमीनों के विकास के लिए अनुमानित रूप से 92,000 करोड़ रुपये से अधिक की निर्माण पूंजी की आवश्यकता होगी। इस बड़े निवेश में से मध्यम अवधि में 52,000 करोड़ रुपये से अधिक की बाहरी वित्तीय जरूरत रहने का अनुमान है। इस पूंजी आवश्यकता को पूरा करने के लिए बैंकों की फंडिंग, प्राइवेट इक्विटी और संस्थागत निवेश जैसे विविध स्रोतों के संयोजन की जरूरत होगी। ताकि विभिन्न रियल एस्टेट परिसंपत्ति वर्गों में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं को समर्थन मिल सके।
जेएलएल के अनुसार शीर्ष 7 शहर रियल एस्टेट निवेश परिदृश्य पर अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं और अनुमान है कि नई खरीदी गई जमीनों पर निर्माण के लिए आवश्यक कुल पूंजी का लगभग 89% ये शीर्ष 7 शहर ही आकर्षित करेंगे। इन प्रमुख जगहों पर धन का इतना अधिक निवेश इसलिए दिख रहा है क्योंकि यहां बनने वाली परियोजनाएं प्रीमियम श्रेणी की हैं और बड़े महानगरों में निर्माण लागत भी ज्यादा होती है।
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टियर-1 शहरों के साथ उभरते शहरी केंद्र भी तेजी से ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में वर्ष के दौरान 1,475 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ। हालांकि इन उभरते बाजारों में जमीन की बड़ी खरीद के बावजूद अनुमानित कुल निर्माण लागत में इनकी हिस्सेदारी केवल 11% है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन स्थानों पर प्रस्तावित रियल एस्टेट परियोजनाएं अपेक्षाकृत कम लागत वाली हैं। जिससे प्रमुख महानगरों की तुलना में कुल निर्माण लागत भी कम रहती है।
भूमि उपयोग के पैटर्न के अनुरूप आवासीय विकास इस समय रियल एस्टेट क्षेत्र का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बनकर उभरा है। जेएलएल के अनुसार अनुमानित कुल पूंजी आवश्यकता का लगभग 76% हिस्सा आवासीय परियोजनाओं में जाएगा। आवासीय परियोजनाओं की फंडिंग का आकार और जटिलता वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के लिए नवाचारी वित्तीय समाधान लागू करने के बड़े अवसर प्रदान करती है, खासकर फर्स्ट-माइल अधिग्रहण फंडिंग और लास्ट-माइल परियोजना पूर्णता फंडिंग जैसे ढांचे में।
जेएलएल के अनुसार डेवलपरों ने खरीदी गई कुल जमीन का 78% हिस्सा आवासीय परियोजनाओं के लिए निर्धारित किया है, जो 2,398 एकड़ में फैला है। इन परियोजनाओं के विकास के लिए अनुमानित 72,000 करोड़ रुपये से अधिक की निर्माण लागत आएगी। यह शहरीकरण की तेज रफ्तार से बढ़ती आवासीय मांग पर डेवलपरों के मजबूत भरोसे को दर्शाता है।
आवासीय के बाद ऑफिस विकास दूसरा सबसे बड़ा खंड है, जिसके लिए लगभग 8,700 करोड़ रुपये (कुल निर्माण पूंजी का करीब 10%) की आवश्यकता आंकी गई है। यह कॉरपोरेट विस्तार, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की बढ़ती मौजूदगी और प्रमुख व्यावसायिक जिलों में ग्रेड-A ऑफिस स्पेस की सतत मांग को दर्शाता है।
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जेएलएल के अनुसार भारत के भूमि आपूर्ति परिदृश्य के विश्लेषण से पता चलता है कि डेवलपरों द्वारा खरीदी गई जमीन में व्यक्तिगत भू-स्वामी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। कुल 62 सौदों में 65% क्षेत्रफल व्यक्तिगत मालिकों से खरीदा गया, जो देश के विभिन्न बाजारों में भूमि स्वामित्व के बिखरे स्वरूप को दर्शाता है। शीर्ष 7 महानगरों में जमीन बेचने वालों की प्रोफाइल में बड़ा अंतर दिखता है।
चेन्नई में सबसे अधिक 93% जमीन व्यक्तिगत मालिकों से खरीदी गई। एमएमआर, बेंगलूरु और पुणे में भी व्यक्तिगत भू-स्वामियों की प्रमुख हिस्सेदारी रही। इसके विपरीत हैदराबाद में कॉरपोरेट संस्थाएं जमीन की मुख्य विक्रेता रहीं, जो दर्शाता है कि वहां भूमि संपत्ति मुख्यतः कंपनियों के पास है। दिल्ली-एनसीआर एक अपवाद के रूप में सामने आता है, जहां 63% जमीन सरकारी निकायों से खरीदी गई।