देश में फैक्ट्रियों, गोदामों और लॉजिस्टिक्स पार्कों की मांग लगातार बढ़ रही है। जिससे औद्योगिक और वेयरहाउसिंग रियल एस्टेट बाजार रिकॉर्ड विस्तार की राह पर है। 2026 की पहली तिमाही में इस क्षेत्र ने मजबूत प्रदर्शन किया। मुंबई और पुणे जैसे शहर इस क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि दिल्ली-एनसीआर, बेंगलूरु और चेन्नई ने भी मजबूत हिस्सेदारी दर्ज की। ग्रेड-ए स्पेस में बढ़ोतरी, विनिर्माण और ई-कॉमर्स सेक्टर की मांग और लचीली रियल एस्टेट रणनीतियों ने इस क्षेत्र को वैश्विक लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं।
संपत्ति सलाहकार फर्म जेएलएल के मुताबिक पहली तिमाही में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग सेक्टर की कुल मांग सालाना आधार पर 13 फीसदी बढ़कर 183 लाख वर्ग फुट दर्ज की गई। इसमें 72 फीसदी हिस्सेदारी के साथ वेयरहाउसिंग की मांग 132 लाख वर्ग फुट रही। वेयरहाउसिंग मांग को मुख्य रूप से थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) क्षेत्र ने आगे बढ़ाया। इसके बाद ई-कॉमर्स, एफएमसीजी और रिटेल जैसे उपभोग-आधारित क्षेत्रों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वहीं कुल मांग में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत रही। विनिर्माण लेनदेन में इंजीनियरिंग क्षेत्र का दबदबा रहा, जिसकी हिस्सेदारी 47 प्रतिशत रही। वहीं ऑटोमोबाइल एवं सहायक उद्योग का योगदान 32 प्रतिशत रहा।
जेएलएल इंडिया के इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक्स के प्रबंध निदेशक योगेश शेवाडे ने कहा कि भारत का औद्योगिक और वेयरहाउसिंग बाजार लगातार विकसित हो रहा है और इसमें ग्रेड-ए स्पेस की हिस्सेदारी बढ़ रही है। यह स्पेस साल-दर-साल लगभग 20% बढ़कर 29.3 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गया है, जो अब कुल बाजार स्टॉक का 57% बन गया है। दिलचस्प बात यह है कि कंपनियां बढ़ती भूमि अधिग्रहण और निर्माण लागत जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए लचीली रियल एस्टेट रणनीतियां अपना रही हैं। लीज-टू-बाय, बिल्ट-टू-सूट लीजिंग और डेवलपमेंट मैनेजमेंट जैसे मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जो कंपनियों को रियल एस्टेट जरूरतों और पूंजी दक्षता के बीच संतुलन बनाने में मदद कर रहे हैं।
जेएलएल के अनुसार भारत के औद्योगिक रियल एस्टेट बाजार ने 2026 की पहली तिमाही में मजबूत गति दिखाई। इस दौरान मुंबई और पुणे ने कुल मांग का 43% हिस्सा अपने नाम किया। मुंबई ने 22% हिस्सेदारी के साथ बाजार में नेतृत्व किया, जबकि पुणे ने 21% हिस्सेदारी के साथ इसका पीछा किया। ये दोनों पश्चिमी शहर भारत के लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक विस्तार के प्रमुख केंद्र बन गए हैं।
उत्तर भारत में दिल्ली-एनसीआर ने 20% हिस्सेदारी के साथ अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनाए रखी। वहीं, बेंगलूरु और चेन्नई ने क्रमशः 13% और 12% हिस्सेदारी दर्ज की। इन पांच शहरों ने मिलकर देश की औद्योगिक रियल एस्टेट गतिविधियों का 88% हिस्सा संभाला, जो दर्शाता है कि मांग मुख्य रूप से स्थापित लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर में केंद्रित है।
मुंबई और पुणे का मजबूत प्रदर्शन महाराष्ट्र के औद्योगिक कॉरिडोर में निवेशकों के लगातार भरोसे को दर्शाता है, जो प्रमुख बंदरगाहों की निकटता, बेहतर कनेक्टिविटी और बढ़ती ई-कॉमर्स पूर्ति आवश्यकताओं से प्रेरित है। पुणे और चेन्नई उन शहरों के रूप में उभरे, जिन्हें उत्पादन-उन्मुख कंपनियों ने सबसे अधिक पसंद किया और इनमें विनिर्माण स्पेस की सबसे बड़ी मांग दर्ज की गई।
जेएलएल के मुताबिक देश के 8 प्रमुख शहरों में पहली तिमाही में औद्योगिक और वेयरहाउसिंग सेक्टर का कुल संचयी स्टॉक बढ़कर 51.4 करोड़ वर्ग फुट पहुंच गया है। इसके 2030 तक लगभग 85 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंचने की संभावना है। यह दर्शाता है कि भारत का औद्योगिक और वेयरहाउसिंग रियल एस्टेट बाजार लगातार मजबूत विस्तार की राह पर है। इस वृद्धि के पीछे मुख्य कारण उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के तहत विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार, ई-कॉमर्स अवसंरचना का तेजी से बढ़ना, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की रणनीतिक भूमिका और विविधीकरण है। इसके अलावा बाजार का विकास कई पहलुओं में देखा जा सकता है जैसे विभिन्न गुणवत्ता वाले स्पेस के लिए बढ़ती मांग, ग्रेड-ए स्पेस में रिक्तता के बावजूद मजबूत उपभोक्ता रुचि और विभिन्न सेक्टर्स में व्यापक भागीदारी। ये सभी कारक भारत के औद्योगिक और वेयरहाउसिंग रियल एस्टेट बाजार को इस दशक के अंत तक स्थायी और मजबूती से बढ़ने के लिए तैयार करते हैं।