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मुंबई-एनसीआर में बढ़ सकते हैं महंगे मकानों के दाम

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पश्चिम एशिया संकट और शिपिंग लागत बढ़ने से मुंबई और दिल्ली-एनसीआर के महंगे मकानों की कीमतों पर दबाव बढ़ा है

Last Updated- March 20, 2026 | 9:01 AM IST
Real Estate

पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुए अवरोध का असर मुंबई और दिल्ली में लक्जरी व अल्ट्रा-लक्जरी मकानों की कीमतों पर दिखने लगा है। कुछ आकलनों के अनुसार निकट अवधि में इनकी कीमतों में करीब 5 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। रियल एस्टेट सलाहकार फर्म एनारॉक की एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण सामग्री लेकर आने वाले जहाजों को लंबा रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जिससे निर्माण लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।

एनारॉक के कार्यकारी निदेशक और अनुसंधान व सलाहकार प्रमुख प्रशांत ठाकुर ने कहा, ‘निर्माण सामग्री लेकर आने वाले जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते घुमाकर लाना पड़ रहा है। जिससे शिपिंग समय में 10 से 20 दिन तक की देरी हो रही है और प्रति कंटेनर लागत में 1.5 लाख से 3.5 लाख रुपये तक का इजाफा हो गया है।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि मकानों की सुस्त बिक्री के बीच पश्चिम एशिया संकट ने भारतीय डेवलपरों के सामने अब और चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर दी है। हालांकि कूटनीतिक प्रयासों के कारण कुछ एलपीजी टैंकरों को होर्मुज मार्ग से गुजरने की अनुमति मिल गई है, लेकिन थोक आयात में अब 6,000 से 10,000 समुद्री मील की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। वहीं समुद्री ईंधन की कीमत करीब 1 लाख रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है।

इसका असर यह हुआ है कि स्टील की कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और इसके दाम बढ़कर 72,000 रुपये प्रति टन तक हो गए हैं। इससे मुंबई में निर्माणाधीन 10,000 से अधिक लक्जरी मकानों की लागत में प्रति वर्ग फुट करीब 50 रुपये तक का इजाफा हुआ है। गगनचुंबी इमारतों में कंक्रीट के भीतर रिब्ड स्टील रॉड का इस्तेमाल उनकी मजबूती के लिए किया जाता है। इसलिए स्टील की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर निर्माण लागत पर पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार हॉट रोल्ड कॉइल की कीमत फिलहाल 51,000 से 56,000 रुपये के बीच है, जो स्थिति में सुधार नहीं होने पर जून तक 62,000 रुपये टन तक पहुंच सकती है। इसी तरह निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाले क्रेन और मिक्सर के लिए डीजल की लागत ब्रेंट क्रूड की कीमत से जुड़ी है, जो इस समय 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक इस लागत झटके का असर मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद समेत देश के अन्य हाई-राइज शहरों के निर्माण स्थलों पर साफ दिखाई देगा।

मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (एमएमआर) पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है, जहां 300 से अधिक टावर और 5,500 से ज्यादा हाई-राइज इमारतें हैं। वर्ष 2024 में ही भारत में 59 अल्ट्रा-लक्जरी मकानों की बिक्री हुई, जिनकी कुल कीमत करीब 4,754 करोड़ रुपये रही। इसमें से लगभग 88 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले मुंबई की रही।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण मुंबई, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी), वर्ली और लोअर परेल जैसे बाजारों पर इस लागत वृद्धि का सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। हालांकि अल्ट्रा-लक्जरी सेगमेंट की मांग पर इसका सीमित प्रभाव रहने की संभावना है। मुंबई के किनारे बने पेंटहाउस और महंगे मकानों में इस्तेमाल होने वाला इटैलियन स्टैचुआरियो और कैलाकट्टा मार्बल अब जहाजों के रास्ता बदलने के कारण प्रति वर्ग फुट 50 से 150 रुपये तक महंगा हो गया है। इससे यह मार्बल लगाने के बाद कुल लागत करीब 6,000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच जाएगी। इसी तरह प्रीमियम प्लॉटेड डेवलपमेंट में आयातित फिटिंग की लागत में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहरीन और कतर में एल्युमीनियम संयंत्र के आंशिक या पूर्ण रूप से बंद होने के कारण एल्युमीनियम की कीमत करीब 3.5 लाख रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है, जो निर्माण लागत को और बढ़ा रहा है। इसका असर दिल्ली के उन ऑफिस पार्कों पर भी पड़ेगा, जहां इमारतों के बाहरी हिस्से में एल्युमीनियम और कांच की दीवारें ज्यादा इस्तेमाल होती हैं। वहां लागत में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि एनारॉक ने यह भी कहा है कि अगर क्षेत्र में तनाव कम भी हो जाता है, तब भी रियल एस्टेट की अतिरिक्त लागत तुरंत कम नहीं होगी।

रिपोर्ट के अनुसार टैंकरों की कतार कम होने में 2 से 8 हफ्ते लग सकते हैं क्योंकि शिपिंग कंपनियां पहले इस मार्ग की सुरक्षा जांचेंगी। इसी तरह पहले से किए गए अनुबंधों में फ्रेट सरचार्ज और शिपिंग बीमा की ऊंची दरें बनी रहेंगी। जिससे खासकर खाड़ी मार्ग से जुड़े कार्गो में प्रति कंटेनर 2 से 3.5 लाख रुपये तक अतिरिक्त खर्च जुड़ता रहेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक शिपिंग व्यवस्था को सामान्य होने में 1 से 3 महीने तक का समय लग सकता है और इस कारण डेवलपर के लिए मॉनसून से पहले तय समयसीमा पर परियोजनाओं को पूरा करना मुश्किल हो जाएगा।

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First Published - March 20, 2026 | 9:01 AM IST

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