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भारत में ऑफिस मांग बूम पर, लेकिन नई सप्लाई जोड़ने में पूंजी की कमी बन रही है सबसे बड़ी बाधा

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नाइट फ्रैंक इंडिया के मुताबिक भारत में ऑफिस स्पेस की मांग के मुकाबले पूंजी की कमी, उपलब्ध फंड से सिर्फ 14% मांग पूरी हो सकती है

Last Updated- May 26, 2026 | 5:51 PM IST
Office Space

Office demand boom in India: भारत के रियल एस्टेट बाजार में ऑफिस और वेयरहाउसिंग सेक्टर में मजबूत मांग बनी हुई है। लेकिन संस्थागत पूंजी की कमी के कारण नई सप्लाई तैयार करने में चुनौती बढ़ रही है क्योंकि मांग नई सप्लाई की तुलना में काफी अधिक है। संस्थागत निवेश बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधार, घरेलू संस्थागत निवेश का दायरा बढ़ाने और कर व्यवस्था को सरल करने की जरूरत है। भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर की सबसे बड़ी चुनौती अब मांग की कमी नहीं, बल्कि पर्याप्त निवेश और पूंजी की उपलब्धता है।

निवेश की रफ्तार धीमी

संपत्ति सलाहकार फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया की नवीनतम रिपोर्ट India Real Estate Investment- Alternative Investment Funds (AIF), Platforms, and the Funding Gap के अनुसार रियल एस्टेट पर केंद्रित एआईएफ (वैकल्पिक निवेश फंड) में 2021 से 2025 के बीच 14.5 अरब डॉलर निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई गई। इसमें से करीब 7.9 अरब डॉलर की रकम जुटा ली गई है और भारतीय निवेशकों ने लगभग 5.7 अरब डॉलर पहले ही रियल एस्टेट परियोजनाओं में लगा दिए हैं। दिसंबर 2025 तक करीब 2.3 अरब डॉलर की राशि निवेश के लिए अभी भी उपलब्ध है, जिसे आने वाले समय में रियल एस्टेट परियोजनाओं में लगाया जा सकता है।

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रिपोर्ट के अनुसार यदि दिसंबर 2025 तक उपलब्ध 2.3 अरब डॉलर की पूरी निवेश योग्य राशि केवल ऑफिस प्रोजेक्ट्स में लगा दी जाए, तब भी इससे लगभग 1.22 करोड़ वर्गफुट नया ऑफिस स्पेस ही तैयार हो पाएगा। यह 2025 में दर्ज भारत की कुल वार्षिक ऑफिस मांग 8.64 करोड़ वर्गफुट का केवल करीब 14% ही पूरा कर सकेगा। इससे साफ है कि ऑफिस स्पेस की मांग तेजी से बढ़ रही है, जबकि संस्थागत निवेश उसकी तुलना में कम पड़ रहा है। साथ ही, यह भी संकेत मिलता है कि भारत के रियल एस्टेट बाजार में घरेलू और वैश्विक निवेशकों के लिए अभी बड़े अवसर मौजूद हैं। हालांकि, संस्थागत निवेश की रफ्तार नई परियोजनाओं की जरूरत के मुकाबले अभी भी धीमी है। इससे मांग और भविष्य में जरूरी आपूर्ति के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है।

ऑफिस मार्केट में मांग नई सप्लाई से ज्यादा

भारत के टॉप आठ ऑफिस बाजारों में मांग नई सप्लाई से लगातार आगे निकल रही है। पिछले पांच वर्षों में इन बाजारों में कुल 30.77 करोड़ वर्गफुट ऑफिस स्पेस के सौदे हुए, जबकि इसी अवधि में केवल 23.61 करोड़ वर्गफुट नई सप्लाई बाजार में आई। पिछले एक दशक से यही रुझान बना हुआ है, जिससे प्रमुख शहरों में उपलब्ध ऑफिस स्पेस पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जिससे बाजार अब पूरी तरह मांग-आधारित चक्र में पहुंच गया है।

सप्लाई-डिमांड अनुपात 2008 में 1.40 गुना था, जो घटकर 2025 में 0.63 गुना रह गया है। यह अब तक का सबसे निचला स्तर है और बताता है कि नई सप्लाई बढ़ती मांग के मुकाबले काफी कम है। वेयरहाउसिंग सेक्टर में भी इसी तरह की स्थिति उभर रही है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर की सबसे बड़ी चुनौती अब मांग की कमी नहीं, बल्कि पर्याप्त निवेश और पूंजी की उपलब्धता है।

उपलब्ध निवेश पर्याप्त नहीं

Knight Frank India में इंटरनेशनल पार्टनर और मैनेजिंग डायरेक्टर शिशिर बैजल ने कहा कि भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां ऑफिस और वेयरहाउसिंग स्पेस की मांग, संस्थागत निवेश की उपलब्धता से तेज गति से बढ़ रही है। ऐसे में सबसे बड़ा अवसर इस पूंजी अंतर को भरने में है। भारत में एक ओर जहां ऑफिस स्पेस की मांग 8.6 करोड़ वर्गफुट से अधिक और वेयरहाउसिंग की मांग 7.2 करोड़ वर्गफुट से ज्यादा दर्ज की गई, वहीं उपलब्ध निवेश योग्य पूंजी भविष्य की जरूरतों का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा कर सकती है। यही असंतुलन भारत को वैश्विक स्तर पर रियल एस्टेट निवेश के लिए सबसे आकर्षक बाजारों में शामिल करता है। मजबूत मांग, बढ़ती पारदर्शिता और परिपक्व होती निवेश संरचनाएं दीर्घकालिक और संस्थागत स्तर की वृद्धि की मजबूत नींव तैयार कर रही हैं।

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भारतीय ऑफिस मार्केट पूंजी के मामले में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कमजोर

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का ऑफिस बाजार एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों की तुलना में अब भी पूंजी के मामले में कमजोर स्थिति में है। हालांकि भारत ऑफिस स्पेस की मांग के मामले में क्षेत्र में अग्रणी बना हुआ है, लेकिन इस मांग के मुकाबले संस्थागत निवेश की उपलब्धता अन्य एशिया-प्रशांत देशों से काफी कम है। प्रति वर्गफुट ऑफिस मांग के आधार पर भारत में उपलब्ध संस्थागत पूंजी केवल 23.2 डॉलर है, जबकि जापान में यह 604.9 डॉलर, सिंगापुर में 2,240.2 डॉलर और ऑस्ट्रेलिया में 5,711.5 डॉलर है। यह दर्शाता है कि मजबूत मांग और लंबी अवधि की विकास संभावनाओं के बावजूद भारत के ऑफिस बाजार को संस्थागत निवेश का अपेक्षाकृत सीमित समर्थन मिल रहा है।

संस्थागत निवेश बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधार जरूरी

इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट बाजार ऐसे दौर में पहुंच रहा है, जहां ऑफिस और वेयरहाउसिंग स्पेस की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन संस्थागत निवेश की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। मांग और उपलब्ध सप्लाई के बीच बढ़ता अंतर अब बाजार में अवसरों की कमी नहीं, बल्कि पूंजी की कमी को दर्शाता है।

घरेलू संस्थागत निवेश का दायरा बढ़ाने की जरूरत

नाइट फ्रैंक इंडिया की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान जैसे देशों में पेंशन फंड और बीमा कंपनियां अपनी प्रबंधित संपत्तियों (AUM) का 1% से लेकर 20% से अधिक हिस्सा रियल एस्टेट में निवेश करती हैं। इसके विपरीत, भारत में यह हिस्सा अभी 1% से भी कम है, जबकि रियल एस्टेट सेक्टर का आकार और परिपक्वता लगातार बढ़ रही है।

रिपोर्ट के अनुसार यदि घरेलू संस्थागत निवेश में मामूली बढ़ोतरी भी होती है, तो इससे रियल एस्टेट सेक्टर में पूंजी का आधार काफी मजबूत हो सकता है और विदेशी निवेश पर निर्भरता कम की जा सकती है।

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कैसे होगा सुधार?

इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में फिलहाल पांच सूचीबद्ध REITs हैं, जिनके तहत करीब 15.7 करोड़ वर्गफुट परिचालन परिसंपत्तियां आती हैं। ये मुख्य रूप से ऑफिस और रिटेल सेक्टर तक सीमित हैं। इसके मुकाबले जापान में 58 और सिंगापुर में 39 सूचीबद्ध REITs हैं, जो ऑफिस, रिटेल, लॉजिस्टिक्स, हॉस्पिटैलिटी और डेटा सेंटर जैसे कई एसेट वर्गों में फैले हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत में REITs का दायरा वेयरहाउसिंग, डेटा सेंटर और अन्य रियल एस्टेट परिसंपत्तियों तक बढ़ाया जाए, तो निवेशकों के लिए एग्जिट आसान होगा और बाजार में पूंजी का पुनः निवेश (कैपिटल रिसाइक्लिंग) तेज हो सकेगा।

कर व्यवस्था सरल होने से बढ़ सकता है विदेशी निवेश

इस रिपोर्ट के मुताबिक रियल एस्टेट एआईएफ (Alternative Investment Funds) में विदेशी निवेशकों को भुगतान पर लगने वाला टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) अभी भी एक बड़ी बाधा माना जाता है। कई मामलों में विदेशी निवेशकों की आय पर 20% से अधिक कर लग जाता है, जिससे निवेश पर मिलने वाला वास्तविक रिटर्न घट जाता है और निवेशकों की भागीदारी प्रभावित होती है। रिपोर्ट का कहना है कि कर ढांचे को सरल बनाने से टैक्स के बाद मिलने वाला रिटर्न बेहतर हो सकता है, अनुपालन संबंधी जटिलताएं कम होंगी और भारत-केंद्रित ऑनशोर एआईएफ संरचनाएं वैश्विक संस्थागत निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बन सकेंगी।

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First Published - May 26, 2026 | 4:59 PM IST

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