प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देशवासियों से अपील की कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जहां संभव हो, वहां वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की व्यवस्था पर फिर से विचार किया जाए ताकि पेट्रोल और डीजल की खपत कम हो सके। फिलहाल यह अपील ईंधन बचाने और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम करने के कदम के तौर पर देखी जा रही है, लेकिन अगर कंपनियां दोबारा बड़े स्तर पर वर्क फ्रॉम होम या हाइब्रिड मॉडल अपनाने लगती हैं, तो इसका असर भारत के रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ सकता है। खासकर ऑफिस बाजार और घरों की मांग में बदलाव देखने को मिल सकता है।
पिछले दो साल में भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर कोरोना महामारी के झटके से धीरे-धीरे उबर रहा था। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और गुरुग्राम जैसे शहरों में कंपनियों ने कर्मचारियों को फिर से ऑफिस बुलाना शुरू किया, जिससे ऑफिस स्पेस की मांग तेजी से बढ़ी।
रियल एस्टेट कंसल्टेंसी कंपनी नाइट फ्रैंक इंडिया के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में भारत के आठ बड़े शहरों में एक लाख वर्ग फुट या उससे बड़े ऑफिस स्पेस के सौदे एक करोड़ 95 लाख वर्ग फुट तक पहुंच गए। यह कुल ऑफिस लीजिंग का 65 प्रतिशत हिस्सा था और पिछले साल के मुकाबले 3 प्रतिशत ज्यादा था। अकेले बेंगलुरु में 77 लाख वर्ग फुट के बड़े सौदे हुए, जो शहर की कुल ऑफिस लीजिंग का 77 प्रतिशत हिस्सा था। वहीं जेएलएल के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में देश में ऑफिस लीजिंग 83.3 मिलियन वर्ग फुट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और मुंबई ने ऑफिस लीजिंग के मामले में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था।
प्रधानमंत्री मोदी की यह अपील मुख्य रूप से बढ़ती तेल कीमतों और पश्चिम एशिया संकट से जुड़ी हुई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अगर वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ता है और इसका असर महंगाई, रुपये की कीमत, ट्रांसपोर्ट लागत और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।
हर दिन लाखों लोग ऑफिस आने-जाने में बड़ी मात्रा में पेट्रोल और डीजल खर्च करते हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि जहां संभव हो, वहां वर्क फ्रॉम होम अपनाकर ईंधन की बचत की जाए और ट्रैफिक भी कम हो।
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अगर कंपनियां दोबारा बड़े स्तर पर वर्क फ्रॉम होम अपनाती हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर ऑफिस रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ सकता है। कोरोना महामारी के दौरान 2020 से 2022 के बीच कई कंपनियों ने ऑफिस स्पेस कम कर दिए थे, नए विस्तार रोक दिए थे और लीज दोबारा तय की थी। उस दौरान बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में खाली ऑफिस स्पेस काफी बढ़ गया था।
अब अगर वर्क फ्रॉम होम फिर से बढ़ता है, तो कंपनियां बड़े ऑफिस कैंपस लेने में देरी कर सकती हैं या फिर कम सीटों वाले ऑफिस चुन सकती हैं। कई कंपनियां लंबे समय की बड़ी लीज लेने के बजाय फ्लेक्सिबल ऑफिस और को-वर्किंग स्पेस की तरफ जा सकती हैं। इसका असर बड़े बिजनेस पार्क और कमर्शियल रियल एस्टेट डेवलपर्स पर पड़ सकता है।
ANAROCK Group के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार का कहना है कि पीएम मोदी की यह अपील फिलहाल मौजूदा संकट के दौरान तेल और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए है। उनके मुताबिक, इससे लंबे समय में ऑफिस बाजार की मूल मांग पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन फ्लेक्सिबल ऑफिस और सैटेलाइट ऑफिस की मांग जरूर बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पूरी तरह से कोरोना काल वाले वर्क फ्रॉम होम मॉडल में शायद नहीं लौटेगा। हालांकि हाइब्रिड मॉडल यानी कुछ दिन ऑफिस और कुछ दिन घर से काम करने का चलन फिर मजबूत हो सकता है। ऐसे मॉडल में कंपनियों को ऑफिस तो चाहिए होंगे, लेकिन वे छोटे, ज्यादा स्मार्ट और कर्मचारियों के घरों के करीब स्थित ऑफिस को प्राथमिकता दे सकती हैं। Stonecraft Group के फाउंडर कीर्ति चिलुकुरी का कहना है कि हैदराबाद जैसे शहरों में ऐसे इंटीग्रेटेड और नेचर-फोकस्ड प्रोजेक्ट्स की मांग बढ़ सकती है जहां बेहतर जीवनशैली के साथ वर्क फ्रॉम होम की सुविधा भी हो।
वर्क फ्रॉम होम का फायदा रेजिडेंशियल रियल एस्टेट सेक्टर को भी मिल सकता है। कोरोना महामारी के दौरान लोगों ने महसूस किया था कि अगर ज्यादा समय घर में बिताना है, तो बड़ा घर जरूरी है। इसी वजह से उस समय बड़े फ्लैट, अतिरिक्त कमरे, बालकनी, होम ऑफिस और बेहतर सुविधाओं वाले घरों की मांग तेजी से बढ़ी थी।
लोग शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों से निकलकर बाहरी इलाकों, प्लॉटेड डेवलपमेंट और इंटीग्रेटेड टाउनशिप की तरफ जाने लगे थे। अब अगर हाइब्रिड वर्क मॉडल दोबारा मजबूत होता है, तो लोग फिर से बड़े और बेहतर डिजाइन वाले घरों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
Smartworld Developers के प्रेसिडेंट आशिष जेराथ का कहना है कि कोविड के बाद से ही ग्राहक घरों में अलग वर्कस्पेस की मांग करने लगे हैं और अब ज्यादातर नए प्रोजेक्ट्स उसी हिसाब से डिजाइन किए जा रहे हैं।
वर्क फ्रॉम होम का सबसे बड़ा फायदा टियर-2 और टियर-3 शहरों को भी मिल सकता है। कोरोना के दौरान कई पेशेवर लोग महंगे महानगरों से निकलकर जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, कोच्चि और लखनऊ जैसे शहरों में रहने चले गए थे।
घर से काम करने की सुविधा मिलने के बाद लोग परिवार के करीब रह पाए, कम खर्च में बेहतर जीवन जी पाए और छोटे शहरों में घर खरीदने लगे। अगर दोबारा वर्क फ्रॉम होम का चलन बढ़ता है, तो ऐसे शहरों में घरों और जमीन की मांग फिर बढ़ सकती है।
Square Yards की एक रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में टियर-2 और टियर-3 शहरों में जमीन की कीमतें 25 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। भुवनेश्वर, कटक, वाराणसी, पुरी और विशाखापट्टनम जैसे शहर रियल एस्टेट ग्रोथ के नए केंद्र बन सकते हैं।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल केवल चर्चा शुरू होने से रियल एस्टेट बाजार पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। Liases Foras के एमडी पंकज कपूर का कहना है कि जब तक कंपनियां आधिकारिक तौर पर बड़े स्तर पर वर्क फ्रॉम होम लागू नहीं करतीं, तब तक ऑफिस बाजार और कमर्शियल रियल एस्टेट पर कोई बड़ा असर देखने को नहीं मिलेगा।
उन्होंने कहा कि कोरोना के बाद ज्यादातर कंपनियों ने महसूस किया कि लंबे समय तक घर से काम करने से कर्मचारियों की उत्पादकता, टीमवर्क और कामकाज की क्षमता प्रभावित होती है। इसी वजह से कंपनियों ने कर्मचारियों को दोबारा ऑफिस बुलाना शुरू किया।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि असली चिंता पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता है। अगर यह संकट लंबा चलता है, तो इसका असर कारोबार, नौकरियों, ऑफिस लीजिंग और महंगे घरों की मांग पर पड़ सकता है।